Barsat ki wo raat [part 15 ]

अभी तक  आपने पढ़ा -शैलेश ,रुहाना से उसके परिवार के विषय में जानना चाहता है ,उससे पहले ही ,रुहाना उससे उस लड़की के विषय में ,जानना चाहती है ,जिसे उसका परिवार पसंद करके आया। उसकी बात सुनकर ,शैलेश को आश्चर्य होता है -कि इसे कैसे मालूम ?वो हंसती है ,तभी नंदिनी की आँखें भी खुल जाती हैं। नंदिनी रुहाना को शैलेश के कमरे की दीवार पर चलते देख डर जाती है अब आगे -


उन दोनों बहन-भाइयों की बातें सुनकर कविता को भय सताने लगता है ,कहीं ये साया वही तो नहीं, जो इसके जीवन में ,संकट बनकर छाने वाला है।

ये तुम क्या कह रही हो ?कविता ने नंदिनी से पूछा। 

हाँ मम्मी  ! मैं झूठ नहीं बोल रही , मैंने रात्रि में किसी को भाई के कमरे की खिड़की के समीप चलते देखा। 

ऐसा कैसे हो सकता है ?तेरे भाई  के कमरे की खिड़की कितनी ऊँची है ?वहां तक तो कोई जा नहीं सकता।फिर तूने किसे देख लिया ?

वो  ही तो ,मम्मी !इसीलिए ही तो मैं ,समाचार पत्र देख रही थी ,कहीं वो ही तो नहीं ,जो आजकल किसी का भी खून पीकर ग़ायब हो जाता है। हमारे घर के आस -पास ही तो , कोई कांड तो नहीं हुआ। शायद उसे भाई का रक्त पसंद न आया हो और कहीं से पी  गयी हो कहकर मुस्कुरा दी।  

नंदिनी के शब्द ,कविता के दिल को चुभे ,ये क्या अनाप -शनाप बोलती रहती है ?नंदिनी को डांटते हुए बोली -भला अपने भाई के विषय में भी ऐसे कोई बोलता है। उसका दिल अंदर तक काँप  गया। 

माँ की हालत और उनकी बात को सुनकर ,नंदिनी को अपनी गलती का एहसास हुआ -कि उसने मज़ाक में भाई से न जाने, क्या -क्या कह दिया ?

माँ -बेटी की बातें सुनकर ,एक बारगी शैलेश के दिमाग में भी आया ,ये बात तो माँ सही कह रही हैं  ,मेरे कमरे की खिड़की ,इतनी ऊँची है ,तब रुहाना कैसे अंदर  आ गयी ?पहले दिन तो ,मैंने ही उसे हाथ पकड़कर खिंचा था अब तो स्वयं ही आ जाती है। मैं उसके प्रेम में सब कुछ भुला बैठा हूँ , किन्तु रुहाना  तो इतनी प्यारी और सुंदर है ,वो कहाँ किसी का खून पी पायेगी ?यदि वो ऐसी होती ,तो क्या मुझे ,यूँ ही छोड़ देती ?मेरा तो आज तक किसी ने खून नहीं पिया , किन्तु आज तो उसके  परिवार से मिलना ही होगा। किन्तु अब तो वो यहीं आ जाती है। 

दूर  पहाड़ियों के पीछे की तरफ ,कोई व्यक्ति जाता था ,तो कभी वापस नहीं आता था। जो भी उधर गया वापिस नहीं आया किन्तु अब तो लोग उन पहाड़ियों में ,जाने से डरने लगे। लगभग कोई इक्का -दुक्का ,वक़्त का मारा चला भी गया फिर वापिस नहीं आया। उन्हीं  लोगों के खून से ही तो ,उन पिशाचों की क्षुधा  शांत होती थी। पिशाचों का परिवार वहीं निवास करता था। दुनिया से अलग -थलग उनकी अलग ही दुनिया थी। वे लोग रात्रि में निकलते थे। उनका भी अपना परिवार था ,वैसे ये शांति प्रिय जीव थे किन्तु इनकी एक कमजोरी भी तो थी।जीते -जागते  आदमी का गर्मागर्म खून उसे पीकर ही ,ये कई सौ वर्षों  तक जीवित रहते थे। किन्तु जब से लोगों ने इधर आना बंद कर दिया ,ये लोग खून के लिए तरस गए। कुछ दिनों तक तो जानवरों के खून पर भी जीवित रहे। उनके परिवार के ,बड़े तो अपने को संभाल भी लेते किन्तु बच्चों को तो ,इस दुनिया से आगे जाने की इच्छा होती। 

खून की प्यास ,एक दिन रुहाना को इसी सड़क पर ले आई ,जिससे शैलेश की गाड़ी प्रतिदिन गुजरती है। एक दिन रुहाना शैलेश को इसी तरह ,एक ''बरसात की रात ''को मिली किन्तु उसका दिल शैलेश पर आ गया। उसके बदले किसी और की जान उस रात गयी किन्तु रुहाना उसकी ज़िंदगी में आ गयी। वो रुहाना जो लोगों का लहु पीकर जीवित रहती है किन्तु उसका दिल अपने चिकित्सक शैलेश पर आ गया।ऐसा नहीं कि प्रेम इक तरफा ही था , दोनों तरफ ही बराबर की आग लगी थी। किन्तु दोनों ही विपरीत प्रकृति  के थे ,एक पिशाचिनी दूसरा इंसान। वो पिशाचिनी जिसका जीवन ही किसी के रक्त पीने पर ही टिका है। शैलेश डॉक्टर होकर भी उसको नहीं पहचान पा  रहा था क्योंकि रुहाना नहीं चाहती थी कि शैलेश को उसकी असलियत के विषय में पता चले। वो तो उसे अपने प्रेम में जकड़ लेना चाहती थी किन्तु शैलेश भी उसके बिना अपने को बेबस ,महसूस करता। 

माँ ने उसके लिए लड़की भी पसंद कर ली किन्तु उसे उस लड़की से जैसे कोई मतलब ही नहीं ,उसका शैलेश की ज़िंदगी में आना ,जैसे कोई मायने ही नहीं रखता। किन्तु सुनेहा तो अब डाक्टर के करीब आना चाहती उसे जानना चाहती। एक दिन तो ,उसके क्लीनिक पर ही पहुंच गयी किन्तु शैलेश को उसका इस तरह वहां आना अच्छा नहीं लगा , उसने अपनी व्यस्तता जाहिर की। 

इस बात को सोहम ने भी महसूस किया ,उसने पूछा भी -क्या आपको भाभी पसंद नहीं ?इस तरह का व्यवहार तो ठीक नहीं किन्तु शैलेश ने उसे समझाया -ये मेरे काम करने की जगह है ,यहाँ काम पर ही ध्यान देना होगा।


सुनेहा जितना भी शैलेश के क़रीब जाती वो उतना ही उससे छिटककर दूर हो जाता। वो उसे अपने समीप आने ही नहीं देना चाहता था क्योंकि वो तो रुहाना के प्रेम में गिरफ़्तार हो चुका था ,उसके इर्द -गिर्द उसे रुहाना ही नजर आती ,उसका सम्मोहन ही ऐसा था ,उसे अपने आस -पास कुछ नजर नहीं आता था किन्तु साथ ही उसका इ दुश्मन भी बन गया था। वो था ,रुहाना का प्रेमी ,जो उस दिन भी ,चमकीली आँखें दिखा रहा था और उसी को देखकर रुहाना डर गयी थी और उसी दिन वही रुहाना को शैलेश के सामने से लेकर गया था।

वो जानना चाहता था ,उसके सामने  शिकार था तब भी उसने उसका रक़्त वहीं क्यों नहीं पी  लिया ,इस बात का जबाब उस समय रुहाना भी दे पाई ,वो तो उसका रक्त पीने की लालसा से ही तो वहां गयी थी उसकी गाड़ी में भी बैठी किन्तु उसने शैलेश के मन के विचार ,जो उसके प्रति थे पढ़ लिए थे। वो उसे प्रेम भरी नजरों से देख रहा था ,अपनी भावी जीवन साथी के रूप में उसे देख रहा था। तब वो कैसे उसका खून पी सकती थी। कैसे उसे अपना विकराल ,खौफ़नाक रूप दिखाती ?   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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