देखा जाये तो केतकी,सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ,बढ़ -चढ़कर हिस्सा लेती है। किताबी ज्ञान उसे भले ही कम हो , व्यवहारिक ज्ञान अच्छा रखती है। सभी तीज - त्यौहारों में खूब मौज -मस्ती करती है उनका आनंद उठाती है ,वो जीवन को अच्छे से जीना चाहती है। तीज -त्यौहार हो ,या फिर पारिवारिक उत्सव सभी को मनाने का, उनमें बखूबी सही तरीक़े से काम करने का ठेका जैसे केतकी ने ही लिया है।
सावन पर भी सहेलियों संग खूब झूला, झूली। बहनों की ससुराल, उनसे मिलने भी गयी। उनका रहन -सहन देख ,उसने मुँह बिचकाया और बोली -तुम्हें तो ठीक से रहने -सहने का तरीक़ा भी नहीं आता। उनकी सासुओं और अपनी बहनों को समझाकर आई ,उन्हें कैसे रहना चाहिए ? उस फ़िल्म में हीरोइन ने कैसे कपड़े पहने हैं ? कैसा ब्लाउज़ सिलवाया है ? सब बताकर आई।
उसकी बहनें अपनी छोटी बहन की बातों को सुनकर बड़ी हंसी और बोलीं -तू, तो बड़ी समझदार हो गयी है।
होंगी ,क्यों नहीं ? छठी कक्षा में पढ़ रही हूँ ,मैं अनपढ़ थोड़े ही हूँ ,हालाँकि वो पढ़ना ही नहीं चाहती किन्तु आज उसे अपनी शिक्षा पर गर्व महसूस हो रहा था। उसकी ऐसी बातें सुनकर, उससे मिलकर दोनों बहनें बहुत खुश हुईं।
धीरे -धीरे समय ने कब उसे परीक्षा के लिए विद्यालय के प्रांगण में ला खड़ा किया ,तभी उसे होश आया। किन्तु पिता के कहने पर, तीनों भाइयों ने, बारी -बारी से उसे पढ़ाया था। अब उसे कितना स्मरण रहा ?ये तो परीक्षा परिणाम ही बतलायेगा। इम्तिहान हो चुके थे ,किन्तु वो पास हो जाएगी ,इस बात पर तो केतकी को भी शक़ था। अभी परिक्षा परिणाम आना बाकि था।
तब एक दिन,केतकी छत पर बैठी हुई ,गन्ना चूस रही थी ,तब केतकी ने देखा,उसकी सहेली नहा - धोकर कहीं जा रही थी।
निर्मला !सुन तो कहाँ जा रही है ?कहते हुए ,उसने छत से नीचे की तरफ दौड़ लगा दी।
निर्मला रुकी और बोली -मंदिर जा रही हूँ।
क्यों ?
आज मैंने सोमवार का व्रत रक्खा है।
व्रत क्यों ?उसके साथ चलते हुए केतकी ने पूछा।
क्या, तुझे इतना भी नहीं पता है ?' सोलह सोमवार' का व्रत करने से मन की इच्छा पूर्ण होती है।
''चाहे कोई भी इच्छा हो ',उसने अपने शब्दों पर दबाव बनाया।
हाँ कोई भी...कहकर वो आगे बढ़ चली।
तेरी क्या इच्छा है ,मेरा मतलब है ,तूने भगवान से क्या माँगा ?
चल,ऐसे इच्छा बताते थोड़े ही हैं ,जब पूरी होती है ,तब पता चलता है।
केतकी मन ही मन सोचने लगी, पता नहीं, मेरे पेपर कैसे गए हैं ? फेल हो गयी तो दुबारा उसी कक्षा में जाना पड़ेगा। बेइज्जती हो जाएगी ,पापा मारेंगे, सो अलग... अब तो यह भगवान ही मेरी नैया पार लगवाएंगे। यह सोचकर उसने भी निश्चय किया, कि वह भी व्रत रखेंगी। तब निर्मला से पूछा- क्या मैं भी व्रत रख लूं ?
तेरी मर्ज़ी ,मुझे क्या ? वैसे भी, अभी तू व्रत कैसे रख सकती है ? तू नहाई भी नहीं है और तूने कुछ न कुछ तो खाया भी होगा।
नाराज होते हुए केतकी बोली - यह बात तूने, मुझे पहले क्यों नहीं बताई ? तू चाहती है, कि तेरी ही इच्छा पूरी हो, मेरी इच्छा पूरी न हो। अब मैं, कैसे व्रत रखूंगी ? केतकी परेशान हो गयी।
फालतू की बात मत कर....मुझे क्या पता था ? तुझे भी व्रत रखना है। अब तू कह रही है ,तो अगले सोमवार को रख लेना।
खुश होते हुए ,केतकी ने पूछा -क्या सच में ?
हाँ ,सोमवार तो हर सप्ताह आता है, अगले सप्ताह रख लेना, इसमें परेशानी की कोई बात नहीं है।
क्या, मैं अभी तेरे साथ चल सकती हूं ? केतकी देखना चाह रही थी, कि वह पूजा कैसे करती है ?
हां, चल तो सकती है, किंतु तुझे मंदिर के बाहर ही खड़ा होना होगा। तू नहाई जो नहीं है।
तू ,थोड़ी देर मेरे लिए रुक जा ! मैं अभी नहाकर आती हूं।
नहीं, मुझे देर हो रही है अब मैं चलती हूं, अगले सोमवार को मिलेंगे ! तब तू तैयार रहना, कहकर वह चली गई।
केतकी घर के अंदर आकर बोली -मम्मी ! आपने मुझे बताया नहीं, व्रत रखने से सारी इच्छा पूर्ण हो जाती हैं। मैं भी व्रत रख लेती ,बड़े रहस्य्मयी अंदाज़ में बोली - मुझे आज पता चला, निर्मला क्यों पास होती है ?
क्यों पास होती है ?
आपको पता है, वो सोमवार के व्रत रखती है,तभी मैं सोचूं ये पढ़ने में इतनी होशियार कैसे है ?
यह सुनकर चिंता हंसी, और बेटी के भोलेपन पर रीझ गई ,तब बोली -तुझे व्रत रखना है तो तू भी रख लेना। किन्तु देख लेना, उसमें कुछ भी खाना नहीं है ,साथ ही चेतावनी भी दी।
यह तो मुझे निर्मला ने बताया ही नहीं, सोचते हुए बोली।
मन में दुविधा उत्पन्न हो गई, कुछ भी नहीं खाना है, तो' मैं' कैसे बिना खाए रह सकती हूं, 'मैं' मर नहीं जाऊंगी।
बेटी को परेशानी में देखकर चिंता बोली -परेशान होने की बात नहीं है, फल और दूध पी सकते हैं , रोटी नहीं खानी है ,अन्न का त्याग करना है।
अच्छा, फिर तो ठीक है खुश होते हुए, केतकी ने कहा और अगले सप्ताह की प्रतीक्षा करने लगी। जब अगला सोमवार आया, उसने अपनी मां से पूछ -पूछकर सारी तैयारी कर ली और निर्मला की प्रतीक्षा में खड़ी हो गई।
इस तरह उसने सोमवार के व्रत आरंभ किया, जब परीक्षा का परिणाम आया, अंक ज्यादा तो नहीं थे किंतु केतकी पास हो गई थी। उसे लगा, यह सब ईश्वर की कृपा से हुआ है, भगवान ने खुश होकर, उसे पास कर दिया है। इस तरह से उसकी भगवान में आस्था बढ़ गई।
अभी तो मैंने चार व्रत की पूरे किए थे और मैं पास हो गई, अब वो सोचने लगी, अभी बाकी के व्रत और करने हैं , उसके लिए भगवान से क्या मांगू ? अपनी यह समस्या उसने अपनी सहेली को बताई।
निर्मला ने उसका समाधान तुरंत ही कर दिया, वह बोली -परिणाम कभी भी आए, किंतु तुम्हें सोलह व्रत तो पूरे ही करने हैं, इससे पहले तू दूसरी इच्छा नहीं मांग सकती।
पास होते ही वह बोली -अब मैं आगे नहीं पढ़ूंगी, मैंने छठी पास कर लिया है ,कौन सा मुझे नौकरी करनी है ?
उसकी बात सुनकर,उसके पिता को क्रोध आया, और आपकी पत्नी चिंता से बोले -पता नहीं, इस लड़की के दिमाग में क्या चल रहा है ? हमने तो अपनी तरफ से बहुत ही प्रयास किया है।
पिता की बात केतकी ने सुन ली थी और वह अपनी मां से कहती है -आप मेरी फिक्र ना करो ! मैं अपने तरीके से सब कर लूंगी।
पिता ने उससे पहले ही कहा था -'अगर यह पढ़ती नहीं है तो मैं, इसे खेती के काम में लगा दूंगा ,उनका सोचना था। अगर यह कठिन परिश्रम देखेगी और करेगी तो, यह पढ़ने पर विवश हो जाएगी।
क्या केशवदास जी का सोचना सही है ?क्या केतकी अपना न पढ़ने का इरादा बदल देगी ?जानने के लिए चलिए आगे बढ़ते हैं।
