गुरु ब्रह्मा ,गुरु विष्णु ,गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु रेव परम् ब्रह्म ,तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
गुरु बिन ज्ञान नहीं ,गुरु को ही ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश माना गया है ,गुरु ही परम ब्रह्म है। गुरु की महिमा अपार है। हमारे जीवन में ,सर्वप्रथम गुरु तो ''माता -पिता ''ही हैं ,दूसरे गुरु हमारे शिक्षक होते हैं। जो हमें सामाजिक ,ज्ञान देते हैं ,तीसरे गुरु हमारे आध्यात्मिक गुरु होते हैं। जो हमें जीवन को सही दिशा में ले जाते हैं। मेरा तो मानना है ,हमारे जीवन में ,अनेक लोग आते हैं ,जीवन में कुछ न कुछ अवश्य ही सीखा जाते हैं। कुछ जीवन की सीख सीखा जाते हैं।वे भी गुरु का दर्जा पाते हैं। संत कबीरदास जी ने भी गुरु को महत्व देते हुए लिखा है -
गुरु -गोविन्द दोउ खड़े ,काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने ,जिन गोविन्द दियो बताय।।
पहले समय में गुरु दक्षिणा की रीत थी ,गुरु दक्षिणा में ,गुरु का अधिकार होता था कि वे अपने शिष्य से गुरु दक्षिणा में कुछ भी मांग सकते थे। इसका सबसे बड़ा जीता -जागता उदाहरण -एकलव्य था, जिसने गुरु''द्रोणाचार्य '' की मूर्ति को ही ,गुरु के रूप में धारण कर शिक्षा ग्रहण की और जब गुरु ने दक्षिणा मांगी ,तब हँसते -हँसते अपने हाथ का अंगूठा काटकर दे दिया।
''गुरु दक्षिणा ''का ही एक उदाहरण ''श्री कृष्ण ''थे जिन्होंने अपने गुरु ''संदीपनी ''ऋषि ,के पुत्र को यमराज से छुड़ाया था।'' गुरु दक्षिणा ''कोई शुल्क नहीं ,वरन ये तो गुरु के प्रति समर्पण भाव और सम्मान को दर्शाता है।
आज भी संघ में ,''गुरु दक्षिणा ''का महत्व है ,इसमें गुरु कोई इंसान या व्यक्ति नहीं वरन ''ध्वज ''को ही गुरु माना गया है क्योंकि कोई भी इंसान बुराइयों से परे नहीं हो सकता ,एक गुरु शिक्षा देता है ,किन्तु उसमें भी कुछ बुराइयां हो सकती है। इसीलिए इंसान से परे ''ध्वज ''को ही गुरु माना गया है। उसी के प्रति समर्पण भाव दिखाना है।
गुरु ही तो हमें ,हमारे परमात्मा के पास जाने का मार्ग दिखलाता है ,जीवन का लक्ष्य ही ''मोक्ष ''प्राप्त करना है। आज के समय में जो गुरु की दी हुई ,सीख़ को ग्रहण करें उसका सम्मान करे ,उनके बताये मार्ग पर चलें ,यही उनके लिए ''गुरु दक्षिणा ''होती है।
