अभी तक आपने पढ़ा -शैलेश रूहाना की तलाश करता है ,वो समझ नहीं पाता कि अचानक रुहाना कैसे गायब हो सकती है ?और वो दो चमकीली आँखें किसकी थीं ,क्या उन्हीं के कारण रुहाना गायब हो गयी है ?दूसरी तरफ तुषार से मिलने नंदिनी होटल में आती है किन्तु वो अपने किये पर शर्मिंदा होकर क्षमा याचना भी करती है। तब तुषार उसे बताता है -कि वो उससे प्यार करता था किन्तु नंदिनी ने उसके प्यार का मज़ाक बनाकर रख दिया। उसके जज़्बातों और भावनाओं की कोई ,क़द्र नहीं की। अब आगे -
नंदिनी रोये जा रही थी ,उसे अपनी गलतियों का एहसास हो गया था किन्तु अब क्या हो सकता था ?उसी के दंड़ स्वरूप वो आज इस हालत में ,तुषार के साथ ,होटल में है। तुषार भी अपने आँसू पौंछकर ,उसके करीब आता है। दुःख और भय के कारण ,नंदिनी की आँखें बंद हो जाती हैं किन्तु उसे कुछ नहीं होता ,तब वो पहले अपनी एक आँख खोलकर देखती है ,आश्वस्त होकर दूसरी आँख खोलती है और खिड़की के पास खड़े तुषार की तरफ देखती है।
अब तुम घर जा ,सकती हो उसका जबाब आया।
क्या तुम सच कह रहे हो ?नंदिनी प्रसन्न होते हुए बोली।
हाँ.....
मेरी वो तस्वीरें.....
वो तो मेरे पास रहेंगी ,तुम्हारी स्मृति में, मेरे दिल में ,फ़ोन से तो मैंने कब की हटा दीं ?जब तुम यहाँ के लिए चली थीं ,तभी हटा दी थीं। किन्तु मेरे संस्कार ऐसे नहीं ,कि मैं किसी की मजबूरी का का लाभ उठाऊँ ,बस तुम्हें एहसास दिलाना चाहता था। किसी की इज्जत ,मान -सम्मान इतना सस्ता नहीं होता।
भगवान को धन्यवाद कर ,नंदिनी बाहर आ गयी।और शीघ्र अति शीघ्र अपने घर के लिए ,प्रस्थान करने लगी। तभी उसने अपने ऊपर से उड़ते एक साये को देखा ,उसकी गति इतनी तीव्र थी कि वो समझ ही नहीं पाई कि वो जो साया गया कोई पंछी था या कुछ और ,उसे तो बस जाने की जल्दी थी।
अगले दिन उसने ,समाचार में सुना -''भवदीय ''होटल में किसी जानवर ने ,एक व्यक्ति का खून पीकर उसे मार डाला। वो जानवर है ,या कोई पिशाच.... ये अभी पता नहीं चल पाया है। लोगों में काना -फूसी हो रही है कि किसी पिशाच या पिशाचिनी का ही कार्य हो सकता है। किन्तु आज के समय में साइंस इन चीजों को पूर्णतः नकारता है।
जब नंदिनी ने ,''भवदीय ''होटल का नाम सुना तो चौंक गयी ,कल वो उसी होटल में ही तो थी। उसकी उत्सुकता बढ़ी कि वो कौन हो सकता है ?जिसका उसने ख़ून पीया ,उसने स्वयं भी तो किसी को तेज़ गति से उड़ते महसूस किया था ,क्या वो पिशाच था ?सोचकर ही वो सिहर उठी। तभी उसने ,तुषार को फोन लगाया ,जब उधर से आवाज आई -हैलो... हैलो.... तब उसने एक ठंडी सास ली और फोन काट दिया।
उधर से फिर ,वापस से नंदिनी के नंबर पर तुषार ने फोन किया ,नंदिनी ने उठाया -हैलो !
क्या तुमने सोचा होगा ?कहीं उस मरे हुए व्यक्ति में, मैं तो नहीं ,इसीलिए फोन करके निश्चित किया।
नहीं ,ऐसा कुछ भी नहीं ,फिर भी मन नहीं माना तो पूछ लिया क्योंकि उस जीव की परछाई को मैंने देखा था। कोई था तो, अवश्य ! जो मेरे ऊपर से निकल गया।
अच्छा... तुषार आश्चर्य से बोला।
यही खबर ,शैलेश ने भी ,सुनी भी पढ़ी भी ,किन्तु उसने कोई दिलचस्पी नहीं दिखलाई ,उसे तो रुहाना की चिंता हो रही थी।
उसकी मम्मी को शैलेश की उन्होंने कहा - आजकल तू देरी से आने लगा है ,अब शीघ्र आया कर ,पता नहीं कोई पिशाचिनी ही घूम रही हो।
मम्मी की बात सुनकर ,शैलेश को लगा ,कहीं वो पिशाच ही तो ,रुहाना को ले तो नहीं गया ,उस समय मैं भी कुछ समझ नहीं पाया था। ये बात मन में आते ही उसका दिल' धक 'से बैठ सा गया। वो परेशान हो उठा ,उसे वो चमकीली आँखों वाला शैतान ही ले गया और मैं देखता रह गया। मुझे रुहाना को गाड़ी से उतारना ही नहीं चाहिए था ,उसके घर ही छोड़कर आता ,यही बातें सोचते हुए ,उसकी नजरें रुहाना को ढूँढ रही थीं।उसके लिए तो वो जैसे पागल सा हुआ जा रहा था। किसी भी कार्य में मन नहीं लग रहा था। उससे मिलते ही ,उसके जीवन में जैसे बहार आ गयी थी। और अब जैसे चहुँ ओर अँधेरा ही नज़र आ रहा था। उसके आने से जैसे सूखे तालाब में प्रेम जल भर गया था और अब वही अमृत समान जल सूखता नजर आ रहा था। वो तो स्वयं ही नहीं समझ पा रहा था कि वो एक चिकित्सक होकर ,कैसे बीमार हो सकता है ?लौटते समय भी ,उसकी नजरें रुहाना को ही तलाश रही थीं।
आज बेटे का उदास चेहरा देखकर ,माँ परेशान हो उठी ,इस तरह तो आज तक वो कभी नहीं मुरझाया ,उसकी आँखें भी ,खोई -खोई सी जैसे किसी को तलाश रही थीं। कविता को लगा ,अवश्य ही मेरे बेटे को किसी की बुरी नज़र लग गयी है। माँ ने मिर्ची और नमक से उसकी नज़र उतारी। शायद ये सुबह तक ठीक हो जाये ,यही सोचकर ,माँ निश्चिन्त होकर सो गयी।
शैलेश भी ,काफी देर तक शून्य में निहारता रहा ,तभी उसे एहसास हुआ ,जैसे कोई खिड़की से बाहर है। उसने खिड़की खोल दी ,ये देखने के लिए ,कि कौन है ?तभी उसे रुहाना दिखी ,उसे देखकर ,जैसे सूखते पुष्प में ताजगी आ गयी ,उस पर जैसे ओस की बूंदें गिरने लगीं। वो तो जैसे खिल उठा और बोला -तुम यहाँ ...... !उसके तो जैसे आश्चर्य का कोई ठिकाना ही नहीं रह गया था। उसकी निराशा तो जैसे उड़नछू हो चुकी थी।

