Rakshk

मोहित का विवाह हुआ ,वो आराम से अपने काम पर आता और काम भी सुचारु रूप से करता और प्रसन्न भी रहता। हम सभी दोस्तों का विवाह हुआ और हम सभी अपनी -अपनी गृहस्थी में रम गए। कुछ समय कहो या कुछ माह , धीरे -धीरे उस वैवाहिक जीवन की ,परेशानियाँ भी सताने लगीं। घर की ज़िम्मेदारियाँ और बच्चों की परेशानियां ,धीरे -धीरे थकावट होने लगी।  ज़िंदगी सबक सीखा रही थी। एक पल को भी चैन नहीं, कभी बच्चे बीमार ,कभी विद्यालय की मीटिंग में जाना। कभी वार्षिकोत्स्व में जाना ,एक पल को भी चेेन नहीं। 


मोहित है ,कि आराम  से आता ,उसे जैसे किसी भी बात की फिक्र चिंता नहीं। उसके साथ ,दफ़्तर के लोग उससे उसकी प्रसन्नता का कारण पूछते, किन्तु वो कहता -मम्मी ,सब संभाल लेंगी। कुछ वर्षों पश्चात मोहित के पिता चले गए ,मोहित बहुत रोया और बोला - मैं अनाथ हो गया। अब उसके चेहरे की मुस्कुराहट थोड़ी कम हो गयी। अब तो अक्सर ,वो भी हमारी तरह ही कहने लगा -आज बेटा बीमार था ,उसे लेकर डॉक्टर के पास गया।आज घर के सामान के कारण ,सारा दिन व्यर्थ गया ,हमें थोड़ी तसल्ली थी  कि ये हमारी श्रेणी में आ रहा है। उसके पिता के जाने के पश्चात ,उसकी मम्मी भी सालभर के अंदर चली गयीं। तब भी बहुत रोया किन्तु उसने अपने को अनाथ नहीं ,वरन  उसने कहा -मेरा ''रक्षक ''चला गया। हम उसकी बात  का सार नहीं समझ सके किन्तु ये समय ,उससे इस तरह की बातें करने का नहीं था।

कुछ दिनों पश्चात ,एक दिन मोहित से ,हमने इस  विषय में पूछ ही लिया ,जब तुम्हारे पिता गए तो तुम बोले -मैं अनाथ हो गया और जब तुम्हारी माताजी गयीं ,तो तुम बोले - मेरा रक्षक चला गया। हम कुछ समझ नहीं पाए। अब तक मोहित अपने माता -पिता की मौत से उबर चुका था ,तब वो बोला -जब मेरा विवाह हुआ तो माँ सब संभाल लेती थी। मेरी पत्नी सुंदर तो थी ही ,उसमें अल्हड़पन भी था। हो भी क्यों न ,उम्र का तकाज़ा था।सारा दिन माँ दीपाली के संग रहतीं ,उससे बातें करतीं ,उसके स्वभाव को समझतीं ,उसे अच्छे -बुरे की पहचान समझातीं ,मैं उनके रहने पर निश्चिन्त रहता। यहां तक कि उसका जन्मदिन होता ,तो वो चुपके से पापा से उसके लिए उपहार मँगा लेतीं और मुझसे  बतातीं -आज दीपाली का जन्मदिन है ,इससे पहले कि मुझे अपनी भूल ,गलती का एहसास होता ,मेरे हाथों में उपहार  देतीं और कहतीं - जा बहु को दे आ। 

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जब बच्चे हुए तो ,पापा -मम्मी अपने अनुभव से सब संभाल लेते ,कभी भी मैं अपने बच्चों के लिए परेशान नहीं हुआ ,बीमार  होते तो उनकी दवाई -गोली पापा लाते और मम्मी सब संभाल लेतीं। मुझे अपने मम्मी -पापा के रहते ,कभी अपनी पत्नी और बच्चों की फिक्र नहीं हुई। ये भी नौकरी करने लगी ,तो बच्चे कब विद्यालय से आये ,कब कपड़े बदले ,कब खाना खाया ?हम दोनों ही निश्चिन्त थे। वे दीपाली से ज्यादा अच्छी देखरेख करते। घर की साग  -सब्जी और बाहर के सामान तो पापा ही ले आते। दोनों ही ,मेरे परिवार के रक्षक थे ,उनकी छत्र -छाया में ,मैं निश्चिन्त था कभी भी ,अपने बच्चों की चिंता नहीं हुई। पापा तो मेरे पिता थे ही उनके रहते ,मैंने कभी अपने को ज़िम्मेदार  नहीं माना ,अब तक भी, मैं उनके आदेश का पालन करता ,उनकी तरफ देखता ,शायद कुछ कहें -किन्तु माँ जो हमेशा ,एक रक्षक की तरह ,मेरी ढ़ाल बनकर खड़ी रहतीं ,उनकी  छाया में, मैं अपने को सुरक्षित महसूस करता इसीलिए उन्हें रक्षक कहा। ये जो आप लोग मेरा व्यवस्थित घर और बच्चे देख रहे हैं ,इसमें एक -एक हिस्से में उनकी छवि है उनके संस्कार और उनकी मेहनत है ,मैं कैसे न कहूँ ?अनाथ हो गया।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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