Svrnim kaal

जीवन के चार पड़ाव होते हैं ,यानि हमारा सम्पूर्ण जीवन चार भागों में विभक्त हो जाता है। पहला बाल्यकाल दूसरा किशोरावस्था ,तीसरा युवावस्था और चौथा या अंतिम पड़ाव है, वृद्धावस्था।

 हमारे सबसे पहले पड़ाव ',बाल्यावस्था 'की सभी चाह रखते हैं ,इसी से नए जीवन का आरम्भ होता है,इस अवस्था में ,माता -पिता अपने बच्चे के माध्यम से ,अपने  सपने साकार करने के साथ -साथ उसके भविष्य को   सजाते हैं ,भविष्य की उड़ान भरते हैं। किन्तु जिसका बाल्यकाल होता है -वो एक नन्ही, कोमल  ,नाजुक सी जान ,नए जीवन को समझने का प्रयास करती है ,नई दुनिया को अपने भोलेपन से निहारती है। उसके लिए तो वो दुनिया सपनों और अपनों से ज्यादा कुछ नहीं।

 
दूसरी अवस्था है ,'किशोरावस्था '-इसमें बालक ,घर से बाहर निकलकर , बाहरी समाज में निकलता है और उसे समझने का प्रयास करता है। समाज के नियम ,बाहरी लोगों का व्यवहार, उन सबको समझने का प्रयास करता है। उसे बाहरी दुनिया में एक नया  रिश्ता भी मिलता है ,और वो रिश्ता है दोस्ती का। दोस्तों के साथ वो अपने कुछ पल ऐसे भी बांटता है, जो वो अपने परिवार के साथ नहीं बाँट सकता। ये रिश्ता इस उम्र में उसके लिए 'सर्वोपरी' हो जाता है और वो अपने जीवन को सफल बनाने के लिए सीढियाँ चढ़ता जाता है।इस उम्र में कई बार भटक भी जाता है और कई बार सम्भलता भी है। और उसके रिश्तों का दायरा भी बढ़ता जाता है।
 
तीसरी अवस्था है ,'युवावस्था '-इस अवस्था में ,उसका दायरा और विस्तृत हो जाता है ,इस दायरे में उसके परिवार के लोग और दोस्त ही नहीं ,वरन वो लोग भी जुड़ते हैं- जिस कारण वो ,विद्या ग्रहण करता है यानि किसी व्यापार से अथवा उसके रोजी -रोटी से जुड़े लोग। जिनके कारण उसका घर चलेगा और घर बनता है नारी से, तो एक नारी अथवा पुरुष भी ,उसकी इस ज़िंदगी के पड़ाव में शामिल हो जाते हैं, जिनके माध्यम से वो एक परिवार की रचना करता है। जिस अवस्था में वो मातृऋण -पितृऋण और देव ऋण से मुक्त होता है। और साथ  में होते हैं -अनेक अनुभव, जिनसे वो सुख -दुःख का अनुभव करता है और अपने -पराये लोगों को उनके विचारों को उनके व्यवहार को समझने का प्रयास करता है। 


चौथा और अंतिम पड़ाव है ,'वृद्धावस्था 'अथवा [स्वर्णिम काल ] जी हाँ ,ये व्यक्ति के जीवन का वो पड़ाव है ,जो कुछ लोगों के लिए तो, निराशा थकान भरा हो सकता है किन्तु कुछ के लिए तो यही ''स्वर्णिम काल ''है ,इस पड़ाव में ,वो ज़िंदगी के अनुभव भी ले चुका होता है ,समाज और जीवन की अच्छाई -बुराई से भी परिचित रहता है। न ही अब उसे आगे बढ़ने की फ़िक्र ,न ही कुछ पाने की चाह। एक मंजिल पाकर ,अब वो  शांतिपूर्वक जीवन  जीना चाहता है। हालाँकि जीवन के थपेड़ों की ,अब उसे कोई चिंता भी नहीं बल्कि अब उसके पास अपनी ज़िंदगी के नए -नए अनुभव हैं ,अपने परिवार की आने वाली पीढ़ी के लिए। कुछ लोग इस अंतिम पड़ाव का बुझे दिल से स्वागत करते हैं ,सोचते हैं -अब जीवन में करने को कुछ रहा ही नहीं किन्तु आज भी कुछ लोग ,पूरे मनोयोग से उसका स्वागत करते हैं। ये अंतिम पड़ाव ही तो पहले पड़ाव को  रोचक बनाता है और सुरक्षा का एहसास दिलाता है।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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