''एक खास एहसास '' मुझे आज भी स्मरण हो आता है- जब तुम ,मेरे अंदर बीज़ रूप में पल्ल्वित होते रहे। मैं तुम्हें ,अपने अंदर सींचती रही ,तुम्हें अनदेखे ही ,अपना प्रेम लुटाती रही। तुमसे बातें करती ,तुम्हारे आने की चाह में ,मेरा दर्द ,मेरी परेशानी बाधक न थी क्योंकि तुम मेरे लिए ख़ास जो थे। तुमने मुझे भी ,मेरे ख़ास होने का एहसास कराया।
मेरे अंदर तुम पल्ल्वित होते ,अपना रूप और आकार ले रहे थे ,तुम्हारे आने की प्रसन्नता, मेरी हर परेशानी को छोटा महसूस कराती। तुम प्रतिदिन मेरे बढ़ते शरीर के संग बढ़ रहे थे। मैं सपनों में ,तुम्हारे उस स्पर्श का सोच रोमांचित हो जाती। अब मैं पूर्णता को जो प्राप्त करने वाली थी ,मेरा अल्हड़पन ,तुम्हारे संग ही कहीं छिपा तुम्हारी प्रतीक्षा में जो था।
तुम्हारा आगमन ही मुझे ज़िम्मेदार बना रहा था ,तुम्हारी नाजुक़ ,कोमल ,नन्हीं अँगुलियों का स्पर्श !तुम्हारा बंद नेत्रों से ही ,मुझे महसूस करना। मेरे ह्रदय से उबल आये ,मेरे ममत्व का तुम पान करते ,वो सब मेरे लिए ,''एक खास एहसास'' ही तो था।
