Main or tum

 ज़िंदगी तो उलझनों से भरी रही ,ज़िंदगी को समझने में, न जाने कितने बरस बीत गए ?बचपन में तो दोस्त रहे ,बचपन के खेल थे। बड़े होने पर जिम्मेदारियों का बोझ ढ़ो रहे थे। कभी स्मरण ही नहीं रहा कि ये ज़िंदगी हमारी अपनी है ,हम इसे क्यों बोझ बना रहे हैं ?ऐसे लगता जैसे ,सब कुछ हमारे हाथ में है ,हमारे लिए है। दोस्त गए ,तो परिवार आ गया। बच्चे भी आ गए ,सारा जहां एक ही स्थान पर बस गया। दुनिया ही इतनी छोटी थी ,उनकी इच्छाएं ,उनके कार्य ,आवश्यकताएं पूर्ण करते ,लगता ,हमारे लिए क्या असम्भव है ?हम वो वृक्ष हैं , जो मजबूती से खड़ा रहता है, जिसे अपने ऊपर पड़ने वाली वर्षा ,धूप ,आंधी से कोई फ़र्क नहीं पड़ता वरन जो उसकी छाया में पल रहे हैं ,उनके  लिए सोचता है। वृक्ष का काम लेना नहीं देना है और बदले में वो पाता है उनका सामीप्य ,अपनापन ,स्नेह ,जो भूलवश वो समझ लेता है।


 

पंछी तो बड़े होकर उड़ान भरते और उड़ जाते हैं और वो वृक्ष सूना हो जाता है। उसके पत्ते भी झड़ने लगते हैं ,असहाय  होकर भी ,सब झेलता है। मैं भी तो उस तरु की तरह ही हूँ ,अपने आँचल में ,सभी को संजोया -संवारा किन्तु अब तो आँचल कमजोर पड़ने लगा। फिर भी उस आँचल में ,कुछ तो शीतलता अभी बाक़ी है। उस आँचल में अभी भी स्नेह है किन्तु अब वो छोटा पड़ने लगा है किन्तु अपनों का सामीप्य चाहता है। अब तू ही बता -ए मेरी डायरी !क्या मेरी ये इच्छा व्यर्थ है ?पंछी अपने -अपने नए घोसलों में चले गए किन्तु मेरा आँचल आज भी सरसराता है। मैंने तो जिंदगी के इतने उतार -चढ़ाव देखे किन्तु तुझे कभी हाथ नहीं लगाया। तू एक कोने में पड़ी ,मुझे निहारती रहती किन्तु मैंने एक पल के लिए भी तेरे विषय में नहीं सोचा। तुझे नजरअंदाज करती रही। अपनी व्यस्त जिंदगी में से, कुछ पल तो तेरे लिए निकाल ही सकती थी किन्तु मैंने तो प्रयास भी नहीं किया, कि ज़िंदगी के कुछ ख़ुशनुमा लम्हें तेरे संग बाँट सकूँ ,कुछ ग़म भी बाँट लेती जिन्हें मैं अकेली ओटती रही। आज तू मेरी कुछ गलतियाँ ,कुछ अच्छाईयाँ तो बाँट लेती लेकिन मुझे अपने पर इतना विश्वास था कि मैंने तुझे ये मौक़ा दिया ही नहीं। 


चलो !अच्छा ही हुआ ,उन लम्हों को स्मरण कर ,आज मैं कभी ख़ुश होती ,कभी दुःखी। तेरे संग नहीं होती ,अब सभी पंछी ,अपनी -अपनी उड़ान भर रहे हैं और आज' मैं और तुम' दोनों संग हैं। आज 'तुम ही 'मेरी मित्र -सखा ,हमदर्द और हमसफ़र हो। आज इस बाक़ी बचे जीवन की मंज़िल हो 'तुम ''


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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