''जहाँ ,डाल -डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं ,बसेरा वो भारत देश है ,मेरा। ''
हमने कभी नहीं देखा , सिर्फ सुना है - कि हमारा देश ,पहले कभी ''सोने की चिड़िया ''था।इतिहास में हमने पढ़ा - हमारे देश में अनेक विदेशी ताकतें आईं और शासन भी किया ,जैसे - अफ़गानों में मुगल शासक ,यूनानी और अंग्रेज़ अनेक विदेशी ताकतें भारत आईं और भारत पर वर्षों शासन करती रहीं । हमारा देश लगभग दो सौ वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा और उसे आज़ाद कराने के लिए ,अनेक' स्वतंत्रता सेनानियों 'ने बलिदान दिए।
जितने लोगों से भी सुना ,कहते -तुम लोग तो ,ख़ुशनसीब हो ,-तुमने स्वतंत्र देश में ,आजादी से साँस ली ,वरना इस देश की हालत तो बुरी थी ,न जाने ,कैसे -कैसे ,कितने बलिदानों से ये देश स्वतंत्र हुआ ?हम भी कोई ,किसी राजा -महाराजा की संतान तो नहीं थे, किन्तु सुना था -हमारे दादा -नाना जमींदार थे ,उच्च और ख़ानदानी घरानों की संतानें हैं हम। उस समय उनका बहुत ही रुआब था ,वे लोग , अपने रुआब और रुतबे को अपने साथ लेकर चले गए ,उनके पीछे रह गए ,-''स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक ''उन्हीं में से हम भी एक थे ,थे नहीं ,हैं।
हम स्वतंत्र हुए ,तो हमारी सोच भी, आजादी की हवा में साँस लेने लगी। हमारे धार्मिक विचार ,शिक्षा ,हमारे संस्कार ,हमारा रहन -सहन भी आजादी की मांग करने लगा। कुछ पुरानी परिपाठियों का भी विरोध हो उनको परिस्कृत किया जाने लगा। यहां तक कि महिलाओं की शिक्षा ,उनकी उन्नति इत्यादि कार्यों पर भी जोर दिया जाने लगा। हर ओर आज़ादी की लहर दौड़ रही थी। उन सबमें सबसे पहले आजाद हुई महंगाई !इसने तो जैसे आज़ाद होते ही दौड़ लगा दी।
पहले सुनने में आता था ,कि हर चीज सस्ती थी ,एक आने में ढ़ेर सारी वस्तुएं आ जाती थीं ,किन्तु महंगाई को तो आजादी की ऐसी लत लगी ,अब तो वो किसी के रोके भी नहीं रुक रही। इतनी उन्नति तो हमारे देश की महिलाएं भी नहीं कर पाईं, जितनी उन्नति इस सौतन कहूँ या डायन [ये ही शब्द इसके लिए अक्सर सुनने को मिलते ]ये कर गयी। महंगाई को लेकर आज लोग जी रहे हैं। हर जगह इससे बचने के लिए होड़ लगी है ,इंसान रात -दिन एक कर रहा है। पैसे कमाने की तो जैसे होड़ लगी है किन्तु पैसे हैं कि आगे -आगे ,उसके पीछे आदमी ,आदमी के पीछे महंगाई ''हाथ धोकर ,पीछे पड़ी है। ''
इस महंगाई के चक्कर में ,इंसान ही इंसान का नहीं रहा और रिश्ते तो दूर हैं। अब लगता है ,-अंग्रेज़ चले गए ,देश आजाद भी हुआ किन्तु वे अपने संग धन ही नहीं ,हमारी सद्भावना ,प्रेम ,धैर्य ,अपनापन ,सहयोग सभी अपने साथ ले गए। लोग'' सद्भावना दिवस ''मनाते हैं किन्तु ''भावना ''बची ही कहाँ है ?वो तो ज़िंदगी की इस भगदौड़ में कहीं ग़ुम हो गयी है ?अब तो हालात देखते हुए लगता है, कि -''हमारा देश सोने की चिड़िया नहीं ,महंगाई की चिड़िया ''हो गया है। ये सबके ऊपर उड़ती नजर आती है ,सब इससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं किन्तु ये है ,कि किसी न किसी रूप में आकर लिपट ही जाती है।

