उलझ गयी यूँ ज़िंदगी ,कल की तलाश में ,
उलझनें बढ़ती गयीं ,अनागत की आस में।
ये न सोचा ,जो करना हैं ,आजकर ,अभी कर ,
न जाने ,कब फिर आये कल ?
कल की, किसको है खबर ,
न जाने कब ?ज़िंदगी की शाम हो जाये।
न जाने किस ?तमन्ना में ,ये रुसवा हो जाये।
न जाने ,ये कल क्या -क्या दे गया ?
कुछ उल्लास ,कुछ जीने की आस ,कुछ ग़म भी दे गया।
कल आया ,सो बीत गया ,
आया नहीं ,कभी कल ,
उलझनों को अपनी ,'अभी 'सुलझा के चल।
क्यों ?इस ज़िंदगी में मचा रखी है ,हलचल।
