उसने ,इशारों -इशारों में ,कुछ कह दिया।
हम तो ,उन आँखों की भाषा पढ़ गए ,
और हाज़िरजबाब ,मुस्कुराहट से दिया।
हमने भी इशारों में,इज़हार कर दिया।
जाते -जाते ,हमारे दिल की धड़कने बढ़ा गए।
इशारों ही इशारों में ,मोेहब्बत बढ़ने लगी ,
जैसे ,चंदा की चाँदनी बढ़ने लगी।
मोेहब्बत परवान चढ़ने लगी।
कभी हाथों से इशारे ,कभी आँखों के इशारे ,
इशारों ही इशारों में ,बात बढ़ने लगी।
मूक दर्शक बन रह गए हम ,
जब 'करवा चौथ ''पर वो ,
चाँद को जल चढ़ाने लगी।
तन्हा थे ,तन्हा रह गए ,
जब ''टाटा ''कर वो जाने लगी।
