मैं जानती हूँ , बेटियां अपने पापा की लाड़ली ,दुलारी होती हैं , घर की रौनक होती हैं ,उनकी किलकारियाँ सू ने आँगन को जगमगा देती हैं। अपने पापा की परी जो हैं ,किन्तु एक पापा की परी तो ,तुम्हारे अपने घर में है ,जिस पर तुमने कभी ध्यान ही नहीं दिया। उसका तुम्हारे जीवन में कितना महत्व है ?ये घर के प्रत्येक सदस्यों की आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। उसका होना ही हमारे ,होने का सबब है। वो पापा की परी कोई और नहीं तुम्हारी अपनी' माँ 'ही तो है। उस घर के मुखिया की पत्नि और उस घर की नींव। जो अपना घर छोड़कर ,तुम्हारे घर को संवारने आई। हर परिस्थिति में ,अपने पति और परिवार का सहयोग किया। उसने न जाने कितने अरमान ,कितनी रातें ?तुम लोगों और इस घर को दीं।
अब ये परिवार, कहने को तो ,उसका अपना है ,किन्तु इस परिवार में ,उसका वो सम्म्मान है ,उसे सम्मान की भी चिंता नहीं होती ,बस एक परवाह चाहती है ,अपने परिवार ,अपने लोगों से ,और यही वो अपनी बेटी से भी चाहती है। भले ही वो ,'पापा की परी ''हो किन्तु ये परिवार ,एक निश्चित समय पर ,अपना होते हुए भी 'पराया ''हो जाना है ,क्यों भरम पाले रखना है। बेटी वहां अपना ख़्याल रखने के साथ ही उस परिवार के लोगों को भी वही प्यार अपनापन दे जो उसने यहाँ पाया। और उस नए परिवार के लोग भी ,प्यार ,अपनापन बाँट सकें।
एक विश्वास ही तो है ,जो वे लोग अपना बेटा देने के साथ -साथ ,,अपने घर की बाग़डोर भी तुम्हें थमा देते हैं ,उस विश्वास को कभी हिलने मत देना। माना कि ,ये तुम्हें पैदा करने वाले तुम्हारे ''जन्मदाता '' हैं ,ये सही है किन्तु वे भी तो माता -पिता ही हैं। यदि तुम्हारी माँ ,तुम्हारे दादी -दादा को और परिवार को न अपनाती तो ,क्या आज ये ख़ुशहाल परिवार ऐसा होता। उन्हें भी अपने परिवार की तरह ही प्रेम देना ,अब ये परिवार ही तुम्हारा अपना है ,इसमें ही तुम्हारा भविष्य है।
माना कि ,जहाँ तुम पैदा हुईं ,पली -बढ़ीं ,जो तुम्हारी जड़ें हैं ,उन्हें भुला पाना सम्भव नहीं ,उनसे ये जुड़ाव ,अपनापन स्वाभाविक है किन्तु इस रिश्ते के लिए ,उन माता -पिता को सम्मान न देना तो ठीक नहीं। बार -बार अपना घर छोड़कर ,अपने मायके पर अधिक घ्यान देने से तो तुम ,उन रिश्तों के प्रति न्याय नहीं कर पाओगी ,अब तो ये जिम्मेदारी तुम्हारी भाभियों की बनती है। जिस तरह वे इस घर की बहु ,लक्ष्मी हैं ,उसी तरह ,तुम भी तो किसी के घर की लक्ष्मी हो।
माना कि ,बेटियों को माता -पिता का अधिक ख्याल रहता है ,तब वही बेटी बहु बनकर ,कैसे अन्याय कर सकती है ?जो बेटी दहेज़ के लिए ,अपने ससुराल वालों से लड़ बैठती है ,अपने माता -पिता को कष्ट में नहीं देख सकती ,वही बेटी ससुराल में ,कैसे ज़मीन -जायदाद अपने नाम कराने के लिए अड़ जाती है ?अथवा अधिकार जताती है। माना कि, तुम्हारा अधिकार बनता है किन्तु बहुओं के कुछ कर्त्तव्य भी हैं। हर बेटी यदि अपनी ससुराल में रहकर ही ,अपने दूसरे माता -पिता का ख़्याल रखे तो उसे बार -बार अपने मायके आकर परेशान नहीं होना पड़ेगा बल्कि ख़ुशी -ख़ुशी मिलने आये।
जब जमीन -जायदाद ,भाई -भाभी की होती है ,तो ज़िम्मेदारियाँ बेटी क्यों निभाए ,एक बहु क्यों नहीं ?हर रूप में एक बेटी ''पापा की परी ''ही होती है। इन सबमें एक पहलू तो छूट ही जाता है ,वो है सास का ,परी तो वो भी है किन्तु सास का जो अधिकार उसे मिलता है ,उसका दुरूपयोग न करके ,बल्कि उस रिश्ते का मान बढ़ाये ताकि आने वाली बेटी को अपने माता -पिता की याद न सताये।

