झिलमिलाते सपने ,एक नहीं अनंत होते हैं।
जो इन नयनों में ,झिलमिलाते हैं।
सपने तो सपने हैं ,कितने पूरे हो पाते हैं ?
हम फिर भी, इन्हें नहीं छोड़ पाते हैं।
बचपन में कुछ सपने, अठखेलियाँ सी करते हैं।
ऊँची से ऊँची ,उड़ान भरते जाते हैं।
वक्त के संग सपने भी बदल जाते है।
नवीन स्वप्न ,अपना दांव आजमाता है।
ज़िंदगी से जोड़ ,पूर्व स्वप्न आगे बढ़ जाता है।
एक सपना जो हक़ीकत और मेहनत से बनता है।
मिटटी से उभरकर ,आसमाँ में चमकता है।
मैंने भी देखा ,'एक सपना, झिलमिलाता सा ',
कुछ झिझका ,कुछ आगे बढ़ता जाता सा।
मेरी एक खूबसूरत पहचान दिलाता सा।
ग़ैरों में ही नहीं ,अपनों की याद दिलाता सा।
