अक्सर हम महिलाओं को दूसरों के घर में ,ताक- झाँक की पुरानी बीमारी रहती है ,अपने घर से ज्यादा ,दूसरे के घर की जानकारी रहती है किन्तु आजकल समयाभाव के कारण ,नौकरी के कारण ,आजकल तो पता ही नहीं रहता कि पड़ोस में कौन रह रहा है, और उनके घर में क्या हो रहा है ?फिर भी कोई प्रयत्न करे भी तो ,अब पड़ोसी से वो अपनापन नहीं मिल पाता। किन्तु हम महिलाओं में ,एक बीमारी और भी मानी जाती है ,वो है ,''पेट में बात न पचना'' ,अथवा दूसरे शब्दों में ''चुगली की आदत ''भी कह सकते हैं। अब करें भी तो क्या ?आदत से मजबूर जो हैं। अब अनुपमा को ही देख लो ,नहीं समझे ,अरे !वो ही ,जो धारावाहिक हमारे घरों में टेलीविजन पर चलता रहता है। सुना है -''आजकल वो नंबर वन पर है ,इसमें 'अनुपमा' की दर्द भरी कहानी है -जो अपने परिवार और तीन बच्चों के लिए खटती रहती है। मैं पूछती हूँ ,-मैं भी तो अपने तीन बच्चों के साथ परिवार के सभी कार्य करती हूँ। अब आप कहेंगे -उसकी सास, सारा दिन झूले पर बैठे -बैठे ताने देती रहती है। इसमें भी क्या नया है ?माना कि ,मेरी सास झूले पर नहीं बैठती किन्तु वो तो बिना झूले पर बैठे ही इतना कुछ कह देती है ,मेरी जगह ''अनुपमा ''होती तो धारावाहिक छोड़कर ही भाग जाती। किन्तु मेरी कहानी तो घर की चाहरदीवारी में ही रह गयी।
अब और कहीं जाना तो मिलता ही नहीं ,सोचा ,ये ''अनुपमा ''ऐसा क्या नया करती है जो नंबर एक पर आ बैठी। सब कुछ तो हमारी ज़िंदगी जैसा ही है। हाँ !एक बात तो है इसकी कहानी में नया मोड़ तब आता है ,जब उसका पति ,उसकी बेवकूफी के कारण ,दूसरी शादी कर लेता है। अब तुम ही बताओ !जब उसे पता चल ही गया था कि उसके पति के किसी दूसरी स्त्री से संबंध हैं ,सबसे पहली बात तो ये ,उसे अपने पति पर विश्वास तो करना चाहिए किन्तु अन्धविश्वास नहीं ,माना ,पता भी चल गया ,तो क्या ?उसे अपने रिश्ते को बचाने के लिए ,अपने अधिकार के लिए लड़ना नहीं चाहिए था। उसने तो जैसे ''हथियार ही डाल'' दिए। उसकी सास के कहने पर भी ,वो नहीं लड़ी ,उसकी बेटी उसका अपमान करती है ,वैसे तो अपनी काँपती सी आवाज में ,कई दिनों तक भाषण देती रहती है किन्तु गलत करने पर अपनी बेटी को डाँटती नहीं। क्योंकि धरावाहिक में तो उसे बेचारी ,पति की ठुकराई और बच्चों के मन में ,उसके प्रति कोई सम्मान नहीं ,दिखाना था न।
अरे !मैं तो कहती हूँ -और कोई औरत होती तो ,पति का क्रोध भी बच्चों पर ही उतार देती। ऐसे में उसका ससुर उसके साथ खड़ा रहता है ,ये बात तो सराहनीय है ,किन्तु उसके हाथ में भी ,भाषण के सिवा कुछ नहीं है। क्या भाषण से पेट भरता है ?ऐसे भाषण से पेट भरता तो सभी नेता भाषण ही देते रहते ,और जो कार्य करने थे ,वो न करते। ''अनुपमा ''बाहरवीं पास ,अंग्रेजी नहीं बोल पाती ,बेचारी कितनी बेचारी..... है। अरे, ऐसी तो बहुत सी महिलाएं हैं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, किन्तु वे बेचारी नहीं बन जाती। वैसे उसमें इतना साहस है ,अपमान होने पर भी ,अपने बेटे का विवाह, उसकी इच्छानुसार ही करवाती है। जब उसके पति को पांच लाख का लाभांश मिलता है ,वो उसके लिए सोने के कड़े भी लाता है किन्तु बेटे की बहु की अंगूठी के लिए उसे अपने सम्पूर्ण आभूषण देने पड़े। तब उसने अपनी समधिन को कोई लम्बा सा भाषण नहीं दिया -कि प्रेम से पहनाई गयी, एक लाख की अंगूठी भी वो ही मान देगी। ये हमारी इच्छा पर निर्भर करता है कि हम अपनी बहु को कितने की भी अंगूठी पहनाएं ?
बेटे के विवाह के लिए ,अपनी समधिन के सामने गिड़गिड़ाती भी है ,चलो वो तो मान लिया- बेटे के प्रेम के कारण, उसने ये सब किया। इन सबमें ,ये बात तो अच्छी हुई ,कि जहाँ उसके अपने दो बच्चे माँ से प्रेम नहीं करते ,वहां बहु तो उसे समझने वाली मिली वरना और कोई बहु होती तो वो भी उन लोगो में शामिल हो, अपनी सास का अनादर कर सकती थी। ये जो उसने अपने बेटे के लिए ,कदम उठाया ,क्या वो अपने लिए नहीं उठा सकती थी ?इन सबमें भी एक बात तो माननी पड़ेगी ,-इतनी परेशानी और भागदौड़ में भी [जब वो किसी विद्यालय में बच्चों को खाना पकाना सिखाती है ]उसके तन की स्फूर्ति कम नहीं होती और चेहरे की चमक भी जस की तस रहती है। और सिवाल ,साधारण महिला होती तो उसका ''ब्लड़ प्रेशर ''कभी उच्च होता कभी निम्न और चेहरे पर झाइयाँ अथवा झुर्रियां आ गयी होतीं। और शरीर थका -थका सा रहता। फिर भी वो थकती नहीं ,बल्कि नृत्य भी सिखाने लगती है, और भाषण देने के लिए तो सदैव तत्पर रहती है।
इसका एक दूसरा पहलू ये भी तो देखिये -पति की दूसरी पत्नी जो इतनी पढ़ी -लिखी है और सुंदर भी ,वो भी अनुपमा के आगे मात खा जाती है ,उसकी छवि भी धूमिल पड़ जाती है ,और देर -सवेर उसकी हरकतें उसके पति को एहसास दिलाती हैं कि कहीं उसने कोई गलती तो नहीं कर दी। उसके ससुर तो उसकी ही तरह महान हैं -जो उसे बेटी मान अपनी मेहनत के बनाये मकान में उसे हिस्सा दे देते हैं। वरना जब बेटे से ही कोई मतलब नहीं तो ,सास ससुर भी नहीं पूछते। ''अनुपमा ''के हटते ही उनके बुरे दिन आ जाते हैं ,बलराज की इतने दिनों की लगी -लगाई नौकरी छूट जाती है , जिसका वो दम भरता था।और तो और जिस उम्र में महिलायें ,कैल्शियम ,घुटने के दर्द की दवाई और पीठ दर्द की गोली खाती हैं ,उस उम्र में ये नृत्य सिखाती है। जिसे कभी खाखरा -फाफड़ा और ढोकले के सिवा कुछ नहीं आता था वो बेटी के विद्यालय में प्रतियोगिता भी जीतती है और पति की नौकरी छूटने पर ,उसके यहाँ ऐसा व्यंजन बनाती है जो शैफ भी नहीं बना पाते। जो सालों की पढ़ाई करके सीखकर खाना बनाते हैं उन्हें भी इसने मात दे दी। इसका पति तो इतना बेबस कहूँ या विवश हो गया ,इसके बिना तो उसका ''रेस्टोरेंट ''भी नहीं चल पा रहा था।
ये ऐसी ''अनुपमा '' है जो दूसरों को सही -गलत की शिक्षा देती है ,उनके लिए लड़ती भी है किन्तु अपने लिए खड़ी नहीं हो पाती। अपने व्यवहार और कार्यों से अपने पति को एहसास दिलाती है कि वो कहीं न कहीं गलत था।इस उम्र में पांच हजार की आमदनी के लिए ,बाहर निकलती है ,उसका बेटा ,जो हमेशा उसका समर्थन करता है ,उससे कुछ नहीं कहती- कि घर में परेशानी चल रही है ,वो भी कुछ कमाकर लाये। सम्पूर्ण कार्य अपने ऊपर ओटती है ,यहां तक कि अपनी कामवाली को भी छुट्टी दे देती है ,उसके प्रति भी उसका व्यवहार कठोर नहीं होता उसकी जीवटता तो देखिये ,बाहर- घर सभी कार्य संभालती है। और अब आपसे क्या बताऊं ?उसका स्कूल का दोस्त भी उसे मिल जाता है जो उससे उसी समय से प्रेम करता है और अपना विवाह भी नहीं करता। उससे सभी तरह की सहायता ले लेती है किन्तु उस रिश्ते को सिर्फ 'दोस्ती' का नाम ही देती है। किन्तु परिस्थितियाँ ऐसी बनाई जाती हैं और फिर वही भाषण क्या एक ''दादी शादी ''नहीं कर सकती ?
सोचो तो भला !उधर तो बहु को बच्चा होने वाला है और इस अनुपमा का प्रेम प्रस्फुटित हो ही जाता है। आखिर ,ये लोग भी मान ही गए ,कि आदमी और औरत कितना भी दोस्ती का ढिंढ़ोरा पीट लें अंत में वो नज़दीक आ ही जाते हैं किन्तु इस बात को स्वीकार करने में ,इन्होंने 'कई दिन लगा दिए। भई लगाएं भी क्यों न ?जब ये नंबर एक पर जो चल रहा है। मैंने तो अपनी चाय समाप्त कर ली, क्या आप अभी तक पी रहीं हैं। भई ,एक बात तो है ,चाय की चुस्कियों संग ,थोड़ी गपशप भी अच्छी लगती है। अब मुझे ही देख लो मैं जाती तो कहीं नहीं हूँ ,चाय की चुस्की संग अपनी कहानी और लेख लिख लेती हूँ ,अब हमारे पतिदेव को ही देख लो ,कहते हैं -श्रीमती जी लिख रही हैं, तो हम भला कैसे टोक सकते हैं ?इनकी 'पगार 'जो आने वाली है ,अब तो तभी खाना मिलेगा ,तब तक हम ''चाय की चुस्कियों ''से ही काम चला लेते हैं। वैसे तो मुझे किसी से कुछ ज्यादा कहने -सुनने की आदत तो नहीं है किन्तु यदि आप लोगों की चाय अभी बाक़ी हो तो इस लेख पर अपनी -अपनी टिप्पणी भी दे देना ,मुझे सुकून मिलेगा। धन्यवाद !

