lashon pr tiki zindgi

शर्माजी सुबह -सुबह घूमने चल दिए ,साथ में उनके एक नए मित्र भी जाते हैं,पता नहीं आज क्यों नहीं आये? थोड़ा इंतजार करके, वो अकेले ही घूमने चल दिए। आधे से ज्यादा शहर सोया था, क्योंकि ज्यादातर लोग देर रात तक जागते रहते हैं। रात में इस शहर की रौनक देखते ही बनती है। मुंबई शहर की चकाचौंध सबको अपनी ओर खींचती है। इस सपनों की महानगरी में न जाने कितने लोग आते हैं ?ये सबको अपने में समा लेती है। न जाने यहाँ आकर कितनों के सपने पूरे होते हैं ,न जाने कितनों के अस्तित्व का पता ही नहीं चल पाता, कि कहाँ हैं ?कहाँ गए ?फिर भी लोगों में इसका आकर्षण बना हुआ है। यहाँ अपनी क़िस्मत आजमाने आते ही रहते हैं। ये ऊँची -ऊँची इमारतें किसी के लिए भी आकर्षण का केंद्र हो सकती हैं। इनमें छोटे छोटे फ्लैट देखने में लगता है कि लोग कैसे रहते होंगे ?ये भी तभी नसीब होते हैं ,जब किसी की जीवनभर की पूँजी अपने में समाहित कर लेते हैं। यहाँ आकर आदमी चाहे 'खोली 'में रहे पर यहाँ आने का, क़िस्मत आज़माने का, मोह त्याग नहीं पाता। ये शहर  न जाने कितने सपनों को जीता  हैं ?न जाने कितनों के अरमानों की लाश पर टिका  हैं ?न जाने कितने अरमान ,सपने इस शहर में पलते हैं ?न जाने कितने अरमानों की लाश ढ़ोता है ये शहर। 
                  शर्मा जी ,सोचते जा रहे थे -ये महानगरी लोगों की भावनाओं से खेलने में माहिर है ,यहाँ की पत्थर  इमारतों की तरह यहाँ लोगों के दिल भी पत्थर हो गए हैं ,जिनका भावनाओं हमदर्दी या अपनेपन से कोई मतलब नहीं ,शायद भावनायें हैं ही नहीं। कोई इक्का -दुक्का भावनायें रखता भी है, तो ठगा जाता है। यहाँ तो भावनाओं का इस्तेमाल भी , पैसा बटोरने में किया जाता है ,इस शहर को  तो बस पैसे से मतलब ,यहाँ तो भावनाओं का ही व्यापार होता है। लोगों को तो पैसे से ही मतलब ,जिससे भी या जैसे भी पैसा बने। पैसे के बिना तो यहाँ आदमी अपने -आप को भी नहीं ढूंढ़ पायेगा। टहलते -टहलते सागर किनारे पहुंचे ,उसकी ठंडी लहरें मन को सुकून दे रहीं थीं, वैसे तो घर की खिड़की से भी ये नज़ारा देखने को मिल जाता हैं लेकिन पास से देखना ,उसे महसूस करने का आनंद ही अलग है। 
              धीरे -धीरे इक्का -दुक्का लोग भी नजर आने लगे थे ,एक जगह कुछ लोग ज्यादा नजर आये ,शर्मा जी के क़दम उधर ही चल दिए। किसी से पूछा -क्या हुआ ?उसने बताया एक अधेड़ उम्र के सज्जन हैं, पता नहीं कौन ?कैसे ?शर्माजी ने  प्रश्न किया। पता नहीं ,कहकर वो चला  गया। किसी की  आवाज़ आई -हार्टअटैक या डूबकर। शर्माजी समझ नहीं पाये कि ये पूछ रहा है या अंदाजा लगा  रहा है। तब तक वो उस व्यक्ति के नज़दीक पहुँच चुके थे और देखकर हतप्रभ रह गए। लगा जैसे वहीं गिर पड़ेंगे ,हाथ में छाता था उसी को ज़मीन में टिका सहारा लिया ,कुछ सुझा ही नहीं ,चलते हुए भीड़ से दूर एक पत्थर पर बैठ गए। वे अपने को यकीन नहीं दिला पा  रहे थे कि श्रीवास्तव जी नहीं रहे। और वो जो लाश देखी, श्रीवास्तव जी की ही थी। वो अभी कुछ दिनों पहले ही तो अपने बहु -बेटे के पास आये थे। पार्क में घूमते हुए ,वहीं उनसे मुलाक़ात हुई थी। बड़े ही सीधे इंसान लगे थे ,सच्चे भी थे। बता रहे थे -किस -किस तरह से बेटे को पढ़ाया -लिखाया ,कामयाब बनाया। बेटे के कारण ही किराये पर शहर में मकान लिया। गाँव में साईकिल से खेती करने जाता था ,फिर शहर में घर -घर जाकर ट्यूशन पढ़ाने जाता था। शाम को यदि चाय की इच्छा होती ,दूध ख़त्म हो जाता तो काली चाय पीकर ही काम चला लेते थे। बेटे के लिए अलग से दूध रखा जाता था कि वो पढ़ाई कर रहा है ,पत्नी कहती भी कि अजित के दूध में से लेकर चाय बना दूँ तो मैं मना कर देता नहीं रहने दो ,वो पढ़ाई में मेहनत कर रहा है ,उसके लिए दूध आवश्यक है। 
                 बेटे ने भी उन दिनों में साथ निभाया ,उसने पढ़ाई में  मेहनत की और क़ामयाब भी हुआ। अब हम सोच रहे थे कि दुःख परेशानियों के दिन गए ,बेटी का विवाह करके बहु -बेटे के साथ रहेंगे। हमारा भी कौन था इसके सिवा। सोचा बुढ़ापे में अपने पोते -पोतियों को खिलायेंगे बच्चों की मदद भी हो जाएगी ,हमारा बुढ़ापा भी कट जायेगा। बेटी के विवाह के बाद ,सोचा बेटा कहेगा -मम्मी -डैडी सामान बाँधो सब साथ रहेंगे लेकिन तीन दिनों तक भी उसने कुछ नहीं कहा। फिर एक दिन हमने पूछ ही लिया कि बेटे अब कब चलेंगे ?बेटे ने कहा -आप लोग कहाँ जा रहे हैं ?मैंने मकान के लिए ज़मीन ली है ,यहाँ रहकर मकान बनवाना और खेती भी देखना। हमारी इच्छा तो उसने पूछी ही नहीं ,कि हम यहाँ रहना चाहते हैं या उसके साथ जाना। उसने तो झूठे को भी नहीं कहा ,कि हमारे साथ चलकर रहना या मम्मी -डैडी !हमारे साथ मुंबई  घूमने चलो। हमने सोचा था ,अपनी सारी चिंताएं त्यागकर आराम से ,शांति से दिन गुजारना चाहते थे लेकिन उसने हमारी इच्छाओं पर ,हमारी ममता पर पानी फेर दिया। 
                हम पति -पत्नी बेमन से बेटे के बनवाये उस मकान में ,बेटे की धरोहर समझकर उसकी देखभाल करते। बुढ़ापे में वो इतना बड़ा मकान काटने को दौड़ता ,काम भी नहीं होता ,जीवन में कुछ उत्साह ही नहीं रहा ,लगता जैसे जिंदगी बोझ बन गयी है। हम खुद ही इसे नहीं संभाल पा  रहे हैं ,पूरी जिंदगी बच्चों को कामयाब बनाने में लगा दी और अब बुढ़ापे में मिला एकांत -एकाकीपन। पत्नी के मरने के बाद मजबूरी में अजित  ले तो आया, पर वो अपनापन प्यार ढूढ़ता हूँ उसके व्यवहार में। सरकारी नौकरी तो थी नहीं मेरी कि पेंशन आये, खर्चे के पैसे भी देना भूल जाता था। अपनी बेबसी,लाचारी पर बहुत गुस्सा आता था। यहाँ आकर भी श्रीवास्तवजी  उदास रहते थे, कुछ पत्नी के जाने का दुःख ,कुछ अपनों के बीच रहकरअपनी ही तलाश।शर्माजी  सोचते -सोचते उस विशाल सागर को  देखने लगे ,ये सागर भी न जाने अपने में क्या -क्या समा  लेता है। , किसी के लिए ये प्रेम के लिए दर्शनीय स्थल और दूसरी तरफ जीवन भर की शांति का माध्यम जैसे श्रीवास्तव जी को मिली। आज इस सागर ने उनके ग़म के सागर को शांत किया। 
                पोलिस अपनी कार्यवाही कर रही थी ,शर्माजी ने एक नजर उधर देखा और घर की तरफ चल दिए।  उन्हें पता था, कि जब जीते जी कद्र नहीं की, तो मरने पर क्या फ़र्क पड़ता है ?आदमी पूरी जिंदगी बच्चों को क़ामयाब बनाने में लगा देता है। ये माँ -बाप की मजबूरी भी है, क्योंकि हर माता -पिता चाहता है कि उसका बेटा क़ामयाबी की सीढ़ियां चढ़े और ये क़ामयाबी ही अपनो को अपने  ही रिश्तों को लील जाती है।इन कामयाबियों के पीछे न जाने कितनी  ,इच्छाओं, सपनों की लाशों के ढ़ेर नज़र आ रहे थे ,न जाने कितनी चलती -फिरती लाशें नज़र आ रहीं थी। 






















laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post