चारुलता जी किसी कार्यक्रम में गयीं थीं ,वो एक प्रख्यात लेखिका हैं ,कुछ लोग पहचानते भी हैं जो साहित्य अथवा कहानियों में रूचि रखते हैं। कार्यक्रम के आरंभ होने के कुछ देर बाद एक लड़की मुस्कुराती सी आई बोली -मैडम! आप अपनी कहानियों में नारी के दुःख -दर्द को बखूबी पेश करती हैं ,नारी चरित्र को पढ़कर लगता है, जैसे वो हमारा ही अपना दर्द है। उनकी वेदना को इस तरह से पेश करती हैं जैसे आपने उस दर्द को महसूस किया है ,उसका एहसास है। इतने अच्छे तरीक़े से लिखतीं हैं आप, मैं तो उस चरित्र में अपने को जीने लगती हूँ। चारुलता जी मुस्कुराकर बोलीं -धन्यवाद। उन्हें मन ही मन ख़ुशी हो रही थी कि लोग उनके लिखे को पसंद कर रहे हैं। अभी वो सोच ही रहीं थीं , अगले कार्यक्रम में कुछ देरी थी, तभी पीछे से एक आवाज़ आई -अरे ,ये क्या जाने किसी का दुःख दर्द ?असल जिंदगी का दुःख -दर्द ,इसे लिखना और उसे महसूस करना ,जीना इसमें बहुत फ़र्क है। एक और आवाज़ आई -मैडम !मैंने भी आपकी कहानी पढ़ी है '',एक औरत सात बच्चे ''मात्र कल्पना है ,एक पढ़ी -लिखी औरत या उसका पति कैसे लापरवाह हो सकते है ं। इससे आप दर्शाना चाहती हैं कि हिन्दू महिलाएं पढ़ी -लिखी होने के बावजूद मूर्ख हैं। अरे !इन्होंने तो मुस्लिम महिलाओं के ,उनके क़ानून के बारे में भी लिखा है। ये क्या जाने हलाला क्या है ?हमने मुस्लिम लोगों को सज़ा के लिए ही ये क़ानून बनाया है ताकि कोई भी हलाला के डर से तलाक न दे।
किसी ने कहा -इंटरनेट ने कहानी को सस्ता बना दिया ,आजकल तो कोई भी हो ,ख़ाली बैठा कहानीकार या उपन्यासकार बन बैठता है। कुछ भी कहानी लिख देते हैं जो हकीक़त से परे होती है।
अरे ,ये क्या जाने किसी का दुःख ,दर्द ?पर लिखतीं अच्छा हैं। चारुलता जी ये समझने का प्रयत्न कर रहीं थीं कि जिसने भी बोला ,ये प्रशंसा थी या व्यंग। तभी एक मोटी सी महिला पास आकर बोली -मैडम !आप अपनी कहानियों में तो बड़ी -बड़ी बातें लिखती हैं ,क्या कोई इतने अत्याचार सहन करने के बाद भी संस्कारी बना रह सकता है? उसके बाद भी उसके मन में बदले की भावना नहीं जगती ,ऐसा कैसे हो सकता है ?आजकल तो हर तीसरा आदमी ज्ञानी बना घूमता है ,ये संस्कार की बातें बस किताबों या कहानियों में ही अच्छी लगती हैं ,वास्तविकता में तो ऐसे लोगों को मूर्ख समझते हैं या बना देते हैं। मैडम !आप तो सिर झुकाए बैठी हैं ,कुछ तो जबाब दीजिये।चारुलता जी ने नजरें उठाई। अपमान , दुःख से उनका चेहरा उतरा हुआ था ,आँखे भी नम थीं। वे उठीं और जो कार्यक्रम करा रहे थे उनके पास गयीं। जिसने जो भी कहा ,सोच रहा था कि ये क्या करने वाली हैं ?या कार्यक्रम छोड़कर जा रही हैं। उसके कुछ देर बाद वो मंच की तरफ बढ़ने लगीं और उन्होंने बोलना शुरू किया।
मेरे प्रिय पाठकों व मित्रों !दुःख या दर्द से तो मेरा बरसों पुराना नाता है ,दर्द अमिर -गरीब नहीं देखता ,न ही वो धर्म या मज़हब देखता है ,दर्द तो दर्द होता है किसी के साथ तो जन्म से होता है ,किसी को परिस्थिति वश घेर लेता है। किसी भी धर्म या मज़हब में कोई ऐसा व्यक्ति न होगा, जिसको दर्द ने न छुआ हो या उसे अपना एहसास न कराया हो। दर्द औरत या मर्द का नहीं ये तो सबका साझा है। कुछ दर्द शारीरिक और कुछ मानसिक होते हैं। आप लोग कहते हैं कि मैंने दर्द को महसूस नहीं किया लेकिन आप लोग नहीं जानते कि मैंने तो दर्द को जीया है। दर्द तो जन्म से ही मेरे साथ रहा है। मैंने एक ऐसे परिवार में जन्म लिया, जहाँ दो पैसे कमाने के लिए नए -नए जुगाड़ सोचे जाते थे लेकिन मेरे परिवार ने या मैंने कभी अपने मान का सोे दा नहीं किया। वो जैसे विचारों में खो गयीं ,एक दिन तो हमें भूखे रहते दो दिन हो गए। पिता पैसों का इंतजाम करने गए थे। तीन माह से घर का किराया भी नहीं दिया था। मकान -मालिक घर ख़ाली करने के लिए बोलने लगा , उसका लड़का मुझ पर ग़लत नज़र रखता था। हम अपने घर के खिड़की दरवाज़े बंद किये भूखे पेट ,'अपनी इज्जत अपने हाथ' ,सोच घर में रहे ,जब हमारे पिता कहीं से उधार पैसे लेकर आये तब हमने घर का किराया दिया और चावल लाकर अपनी भूख मिटाई।
लेकिन हमारे पिता ने हिम्मत नहीं हारी ,न ही हमें कमज़ोर पड़ने दिया।पिता कहते -दुःख के दिन थोड़े लम्बे खींच गए लेकिन ये दिन भी नहीं रहेंगे। शांति से धैर्य से ये दिन गुजार लो। हमें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। कहते यदि क़ामयाब हो गए तो ये दिन तो याद भी नहीं रहेंगे ,बस हिम्मत मत हारना। कई बार विचार आया ,ऐसी जिंदगी से तो मौत अच्छी। इसी तरह हमारे दिन खिसटते रहे ,धीरे -धीरे हम संभलने लगे। मेरा विवाह हुआ , सोचा इतनी परेशानियों के बाद जिंदगी के कुछ दिन आराम से गुजर जायेंगे। लेकिन दर्द ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा, वो तो जैसे मेरे फेरों के साथ ही मेरे साथ आ गया। मेरा मायका तो सम्भल रहा था, लेकिन दर्द मेरे साथ ही चला आया। दहेज़ न दे पाने के कारण ,मेरी सास का मुझसे कैसा मधुर व्यवहार रहा होगा ?आप ही सोचिये।उन्होंने मुझे शारीरिक रूप से ज़्यादा मानसिक रूप से भी आहत किया। मैं घर में नाश्ता बनाती पर खा नहीं सकती थी ,कहतीं -परांठे खाओगी तो पेट खराब हो जायेगा और कुछ बनाने नहीं देतीं थीं। सुबह रसोईघर में घुसने नहीं देतीं थीं। कभी -कभी घबराते हुए चाय भी मांगती तो एक कप में आधी चाय बाहर रख देतीं। जैसे मैं इस घर की बहु न हो ,कोई कामवाली या बाहरवाली हों। जब नहा -धोकर रसोईघर में घुसती तो मुझ पर निगाह रखतीं कि कहीं घी या दूध पर हाथ साफ न कर ले। नाप -तौलकर सामान देतीं।
क्यों? मैडम आपके पति कहाँ थे ?क्या वो कुछ नहीं कहते थे। पति तो चुप रहते वरना ताना सुनने को मिलता कि बहु के आने पर अपने माँ -बाप को भूल गया। वे उनका सम्मान भी करते थे वो तो आजतक भी नहीं बोले। वे एक ही के साथ न्याय कर सकते थे, इसीलिए चुप ही रहना ठीक समझा। आप लोग यकीन नहीं करेंगे -मैं गर्भवती थी ,पोछा लगाती ,झुका नहीं जाता था ,पैरों से पोछा लगाती थी ,उस समय ऐसे पोंछे भी नहीं होते थे, होते भी तो सास नहीं लेतीं। यदि इनकी मम्मी ने नहीं कहा कि डॉक्टर को दिखाओ ,तब तक मैं ऐसे ही परेशान घूमती रहती थी। आप नहीं मानेंगे, मैंने अपने पति के साथ अब तक दो ही फिल्में देखीं हैं उनमें भी पहली बार हमारी सास हमारे साथ थी। बाद में देख लेतीं किसी ने कहा। फिर बच्चे बड़े हो गए ,जिम्मेदारियाँ बढ़ी फिर नहीं गए। मैं पढ़ी -लिखी थी ,नौकरी कर सकती थी ,की भी ,लेकिन पैसे कम मिलते थे। घर और बाहर की जिम्मेदारियों के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी ,कोई मदद करने वाला भी नहीं था। घर भी नहीं जा सकती थी, माता -पिता शादी -शुदा लड़की की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थे ,कहते -थोड़ा बहुत तो लड़की को समझौते करने पड़ते ही हैं। ये तो मेरी कहानी के कुछ छोटे टुकड़े हैं ,जिन्हें मैंने जीया है। समय के साथ मैं अपने अधिकारों के लिये लड़ी ,कभी अपनों से कभी अपने -आप से। फिर लोग कैसे कह सकते हैं? कि मेरा दर्द से कोई नाता नहीं। गहराइयों में छिपा दर्द ,आप लोगों से बाँट लेती हूँ।
यदि कोई कहानीकार कहानी लिखता है तो अपने आस-पास से प्रेरित होकर ,कहानियाँ ही हमारे समाज का आईना होती हैं, जो किसी को पता नहीं होता, ये दर्शा देती हैं। हमारी अपनी भी कहानी हो सकती है, कहकर मैडम मंच से उतरीं और चली गयीं। शायद उनके जख़्म इतने गहरे थे, जो हरे हो गए वो दर्द शायद उन्हें साल रहा था। कुछ तो दिखा दिया न जाने कितना दबाकर चलीं गई।