bavra

भाई के विवाह का उत्सव है , नई बहु के साथ ,बारात वापस आ चुकी है। बहु के आने  पर उसके स्वागत की तैयारी में लगे हैं। भीड़ -भाड़ वाला घर है ,कौन ,कहाँ ,क्या कर रहा है? पता ही नहीं  चल  रहा। बहु का स्वागत करके उसे पूजा के लिए देवता वाले कमरे में ले गए और वहीं कुछ रस्में की जा रहीं हैं। तभी उस कमरे से आवाज आई ,अनुराग को भेजो !कोई न कोई  काम कर ही रहा था ,आवाज सुनकर अनुराग की ढ़ुँ ढ़ेर मची। आँगन में आवाज आई, कि अनुराग कहाँ है ?पर वो वहाँ मिलता  कैसे ?जब वो वहाँ था ही नहीं ,वो तो अन्य बच्चों के साथ बाहर खेल रहा था। तभी उसकी दीदी आई, बोली -अनुराग तू यहाँ है ,चल जल्दी ,तुझे बुलाया जा रहा है। तेरी जरूरत है ,जल्दी चल। एक गोरा -चिट्टा ,तंदुरुस्त सा बच्चा अपनी दीदी का हाथ पकड़कर चल दिया। दीदी मुझे क्यों ले जा रही हो? मैं अपनी चाल पूरी करके आता लेकिन उसकी दीदी ने जैसे उसकी बात पर ध्यान ही नहीं दिया ,उसे खींचे जल्दी -जल्दी चलती रही। जब वो घर पहुँचे उन्हें देखकर ,तभी कोई बोला -लो आ गया देवर ,जो रस्म करनी है करो। अनुराग को अंदर कमरे में ले गए, जहाँ उसके भाई -भाभी देवता के सामने बैठे थे। बस  उसका इंतजार हो रहा था। उसे देखकर माँ बोली -चल जल्दी बेेठ ,अपनी भाभी की गोद में। वो झिझका ,और नहीं में गर्दन हिलाई। तभी वहाँ बैठी एक महिला बोली -नई भाभी की गोद में बैठने का मौका मिल रहा है। ,कहते हुए उसे खींचकर बहु की गोद में बिठा दिया। बोली -अब कहो ''भाभी को बेटा मुझे बताशे। ''अनुराग ने वही  शब्द दोहरा दिए ,तब उस महिला ने उसे कुछ बताशे दिए और वो उन बताशों को लेकर बाहर भाग आया। 
              अनुराग इस घर का सबसे छोटा बेटा है ,अपने ही भाई से कम से कम दस -पंद्रह साल छोटा है। इस बीच उसकी बहनें जो आईं थीं यदि वो पहले आ जाता तो और बहनें नहीं आ पातीं। उसी के इंतजार में ही ,ये बहनें न चाहते हुए भी आ गयीं। दादी की इच्छा थी, कि एक भाई और होना चाहिए। बड़े अरमानों के बाद जब अनुराग आया, तो सबकी आँखों का तारा बन गया। भाई बाहर नौकरी करने गए, भाभी भी उनके साथ ही चली गयी। कुछ वर्ष तो वो वहीं रहे, फिर न जाने क्या कारण रहा ?वो अपनी नौकरी छोड़कर आ गए लेकिन गाँव नहीं आये, गाँव के पास ही शहर में घर किराये पर ले लिया। कारण बताया ,कि बच्चे गाँव में रहकर नहीं पढ़ पायेंगे ,न ही कोई अच्छा विद्यालय है, गाँव में। इस बीच अनुराग भी कॉलिज में आ गया था। जवान ,गर्म खून था ,कॉलिज में दादागिरी में रहता ,दोस्तों से घिरा रहता। पढ़ाई में तो दिमाग था ही नहीं ,पढ़ना भी नहीं चाहता था। बस वो चाहता था कि  खूब पैसा कमाऊँ ,कहीं ऐसी नौकरी हाथ लग जाये। दोस्तों के साथ बैठकर पैसा कमाने  की नई -नई तरकीबें सोचता। 
           घरवालों के अनुसार, वो दोस्तों में बैठकर बिगड़ रहा था। न ही पढ़ाई में ध्यान था ,माता -पिता चिंतित थे कि इसका भविष्य क्या होगा ?पिता एक दुर्घटना में अपाहिज़ हो गए ,अब उनके बस में इतना काम संभालना भी नहीं था। अब सारी जिम्मेदारी अनुराग के ऊपर थी ,बड़ा भाई तो बाहर रहता। अभी सारी  जिम्मेदारी उठाने के लिए अनुराग तैयार नहीं था।  उसने भाई से कहा, तो भाई ने जबाब दिया -'मैं यहाँ रहता हूँ ,यहाँ की जिम्मेदारी भी मुझ पर है ,तुम्हें भी तो कुछ न कुछ काम करना ही है तो तुम खेती सम्भालो। घर का सारा खर्चा गाँव से ही आता। किसी कारण से अनुराग शहर आया था ,देखा -भाई का चेहरा उतरा हुआ था। अनुराग ने परेशानी का कारण पूछा ?भाई ने बताया-' कि बच्चों का दाख़िला किसी अच्छे विद्यालय में नहीं मिल रहा  है ,अभी तक प्रवेश -पत्र ही नहीं मिला। भाई की बात सुनकर अनुराग ने कहा -आप चिंता न करो ,सब काम हो जायेगा और उसने अपनी पहुंच से थोड़ी भाग -दौड़ से  दोनों बच्चों को प्रवेश दिलवा दिया।अनुराग इसी तरह से भाई की समस्याओं को अपने ऊपर ले लेता। 
                वो गाँव से रोज़ाना बच्चों के लिए दूध लाता ,अब बड़े भाई को उसका बहुत सहारा हो गया ,कोई भी समस्या होती तो अनुराग संभाल लेता। अब दोस्तों का साथ भी कम हो गया और उसकी जिम्मेदारी बढ़ती चली गयीं। भाई ने कभी अनुराग को पढ़ने या अपने साथ रहने के लिए नहीं कहा। कहते -''तू पिताजी की देखभाल कर और खेती देखना। ''लेकिन माँ तो अपने बेटे के लिए चिंतित थी ,कभी -कभी पिता से कहती -पता नहीं हमारे अनुराग की क़िस्मत में क्या लिखा है ?न ही पढ़ पाया ,न ही नौकरी लगी। इसका कोई रिश्ता भी नहीं आया ,कैसे कटेगी, इसकी जिंदगी ?यही बातें अपनी बेटियों से भी कही। एक बहन ने सलाह दी -''गाँव में रहने वाले लड़के से कोई विवाह नहीं करेगा ,शहर में भाई के साथ रहेगा ,तभी कोई रिश्ता आ सकता है। शहर में चाहे कितनी भी परेशानियाँ हों लेकिन सब शहर में ही रहना चाहते हैं। माँ के कहने पर बड़ा मकान लिया गया ,जिसमें दोनों भाइयों का परिवार रह सके। बहन की सोच सही निकली ,रिश्ता भी  आया और विवाह भी हो गया। लड़की पढ़ी -लिखी तेज़ थी ,उसने आते ही वहाँ का माहौल भाँप लिया, कि बड़ा भाई छोटे भाई से मात्र काम कराने  के ,कोई मतलब नहीं रखना चाहता। उसे ताज्जुब था, कि अनुराग अभी तक समझ ही नहीं पाया। 
           अनुराग जिसे प्यार ,अपनापन और अपने लोग समझ रहा था ,वो तो मात्र भ्र्म था वो उसका इस्तेमाल कर रहे थे। भाभी समझ गयी, कि नई बहु को बहलाया नहीं जा सकता, इसीलिए बात फैला दी कि ''नई बहु घर तोड़ने वाली बात करती है। ''अनुराग पर  परिवार का असर ज्यादा था ,उसने ये बात मान ली। जब पत्नी ने समझाना चाहा तो अनुराग ने उसकी एक भी बात नहीं मानी क्योंकि भाभी तो  अपना पासा पहले ही फेंक चुकी थी। पुष्पा को ही समझाने लगा  - अपना ही परिवार है ,अपने ही बच्चे हैं ,तुम घर -परिवार को तोड़ने की बात न करो। वो तो अपने बच्चे भी बनाने को तैयार नहीं था लेकिन माँ की इच्छा का मान रखा। माँ कहती-' मेरी इच्छा है, कि मैं जीते जी तेरे बच्चे  मुख देखना  चाहती हूँ। पुष्पा  ने उसे कई बार समझाने का प्रयत्न किया, उसकी आँखों से पट्टी उतारनी चाही लेकिन वो नहीं समझा। पुष्पा  को लगा,'' अब उसे समझाना व्यर्थ है।' अब वो उससे हटने लगी ,अनुराग उसके व्यवहार से आहत होता। अब बच्चे ब्याह लायक हो गए, बेटी के विवाह के लिए पैसों की आवश्यकता थी। बाद में निर्णय लिया गया, कि थोड़ी जमीन बेच देते हैं। जब जमीन की बातें पुष्पा  ने सुनी, तो बोले बिना रह न सकी बोली -वो अपने हिस्से की ज़मीन बेचें, हमारी नहीं। लेकिन अनुराग ने यहाँ भी पुष्पा  की एक न  चलने दी ,बोला -हम सब एक ही हैं ,अभी कोई हिस्सा नहीं बँटा  है। 
            अनुराग के भतीजे की नौकरी भी लग गयी ,वो बहुत खुश था कि हमारा बेटा क़ामयाब हो गया। भाई का रहन -सहन बदलने लगा। बेटे ने  मकान बनवाया ,अनुराग ने खुश होकर सारा काम करवाया। पत्थर ,टाइल्स कैसे लगने हैं ?पेंट -पुताई कैसी होनी है ?मकान बन जाने के बाद भाई -भाभी अपने मकान में चले गए , उससे पूछा भी नहीं, तब वो बहुत आहत हुआ, लेकिन उसने एहसास नहीं होने दिया। उसने कई दिनों तक इंतजार किया, कि भइया -भाभी आयेंगे -कहेंगे ,चलो अनुराग !अपना सामान बांधों ,अपने घर चलो। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ,वो उसी किराये के मकान में पड़ा रहा। समय के साथ -साथ उसकी उम्मीद जबाब देने लगी। उसकी पत्नी ने भी सुनाया -देखा !अपने लोग , कुछ अपने लिए सोचा होता तो हम भी कहीं न कहीं ठीक रह रहे होते ,उनके लिए जमीन का टुकड़ा भी बेच दिया। तभी उसे सूझा कि जमीन का बंटवारा कर  लेते हैं ,देखें ,भाई क्या कहता है ?लेकिन वो तो जैसे तैयार ही थे ,एक क्षण भी नहीं सोचा, कि जिस परिवार को अपनी जिंदगी माने बैठा था ,उस अनुराग पर क्या बीत रही है? 
            वो तो जैसे बोेरा गया ,कोई भी आता ,उसे डपट देता। जैसे सबसे ही उसका विश्वास हट गया हो। किसी का भी नया  मकान देखता ,कहता -मेरे बेटे ने बनवाया है ,पर मैं जाऊंगा नहीं। ज़मीन भी बेचने लगा कहता -मैं अपने भाई से बड़ा होकर दिखाऊँगा ,पूजा में लगा रहता। उसकी हरकतों को देखकर लोग उसे बावरा कहते।वो  कहता -मैं किसी से कम नहीं ,उसकी पत्नी उसके साथ रहते हुए भी साथ नहीं थी। पत्नी को देखते ही उसे अपने विश्वास ,नाकामी का एहसास होता। उसे एहसास होता, कि मैंने इसका कभी कहना नहीं माना , उसके अरमानों का ख़ून होते देखता। कहता-'' मैं ख़ूनी हूँ।'' पुष्पा  उसे अब संभालना चाहती, लेकिन वो तो सम्भलना ही नहीं चाहता था। कभी -कभी रोने लगता ,कहता -सारा जीवन व्यर्थ गया। कभी पूछता -क्या मैं उसके मकान पर कब्ज़ा कर लेता? मेरा उसके सिवा था ही  कौन  ?और रोने लगता। फिर जोर -जोर से हंसने लगता ,कहता -रिश्तों की सच्चाई पता तो चली पर  देर से पता चली। 





















laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

1 Comments

  1. very good writing and shows the reality of modern life through this story..

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