kismat

क़िस्मत भी न जाने क्या -क्या खेल खेलती है ?बचपन से ही अपने बड़ों  से यही सुनते आ रहे हैं ,कि क़िस्मत में हो तो राजा को रंक ,रंक को राजा बनाने में देर नहीं लगती। मैंने तो इनकी पुराने ज़माने की बातें सोचकर कभी ध्यान ही नहीं दिया। इनके समय में क्या हुआ ?इनके अनुभवों से न ही मैं कुछ सीखना चाहती हूँ ,सबकी अपनी -अपनी जिंदगी है, सबके अनुभव भी अलग होंगे। मेरा तो यही मानना है कि किसी भी काम में जब कोई भी व्यक्ति सफ़ल नहीं हो पाता ,तो क़िस्मत का नाम ले देता है। हमारी क़िस्मत में ही नहीं था। मेरा तो मानना है, कि क़िस्मत के सहारे मत बैठो ,हमारी मेहनत में ही कोई कमी रह गयी होगी तो इसीलिए क़िस्मत को छोड़कर दुबारा से मेहनत में जुट जाओ! देर से ही सही सफलता जरूर मिलेगी। व्यक्ति चाहे तो अपनी मेहनत से अपनी किस्मत बदल सकता है। लो मैंने भी किस्मत का नाम ले ही दिया इतनी सी जगह में  मैंने नौ बार क़िस्मत का नाम लिख दिया।  किस तरह से  हम इस  किस्मत को अपने से अलग कर  सकते हैं? हमारी क़िस्मत हमारे साथ जो चलती है। मैंने  अपने तरीक़े से खूब कोशिश की कि मैं अपनी और अपने से जुड़े लोगो की क़िस्मत बदल दूँ ,मैं अपने तरीक़े से चली और वो अपने हिसाब से। आइये ,आप भी मेरे और क़िस्मत के खेल में शामिल हो जाइये। 
                मैंने सोचा था ,कि मैं पढ़ -लिखकर बहुत बड़ी अफ़सर बनूँ लेकिन उसने मुझे एक कलाकार बना दिया।  मैं जिंदगी से और क़िस्मत से जूझती रही ,पग -पग पर उसने मुझे पटकनी दी पर मैंने भी हार नहीं मानी। इस जिंदगी की लड़ाई को लड़ते -लड़ते मेरा विवाह हो गया। ये बात तो जगज़ाहिर है , कि मैं जो क़िस्मत से लड़ रही थी, तो सम्भवतः क़िस्मत नाराज़ ही  होगी , मुझसे। मध्यवर्गीय परिवार की लड़की का विवाह ऐसे ही लड़के से ही  हुआ होगा, जो दो जून की रोटी के लिए दिन -रात एक कर रहा हो,जिसके ऊपर जिम्मेदारियों का बोझ हो  मैंने भी जाकर हाथ बटाना शुरू कर  दिया। हम दिन -रात मेहनत करके अपना और परिवार का भरण -पोषण करने लगे।सोचा किस्मत से जीतने में, मैं अपने बच्चों की मदद करुँगी। मैंने सोचा ,अपनी बेटी को इंजीनियर बनाउंगी और मैं उसी उद्देश्य को लेकर अपनी बेटी के भविष्य को संवारने में जुट गयी ,बेटे को डॉक्टर बनाना था उसे भी अपने भविष्य को संवारने की प्रेरणा देती रही। समय अपने तरीक़े से आगे बढ़ता रहा। समय ने एहसास कराया कि बच्चों पर अपनी इच्छायें मत थोपो ,हमने भी बच्चों की इच्छा का मान रखा तो पता चला लड़की को तो कॉमर्स पसंद है ,उसकी इच्छाओं का मान रखते हुए, हमने कॉमर्स से संबंधित नौकरी और कोर्स देखने शुरू कर दिए।  अपने मन को समझाया कि बच्चा क़ाबिल होना चाहिए ,चाहे कैसे भी हो ?और किस्मत से बेटी चार्टर एकाउन्टेंट बन गयी। अब हमारी जिम्मेदारी थी, बेटा कुछ समय बाद पता चला कि बेटे को डॉक्टर नहीं बनना ,उसे तो इंजीनियर बनना है। 
             ह मने अपने को वहाँ भी समझाया कि कोई बात नहीं ,बेटी को इंजीनियर बनाना था ,बेटा बन गया।हमने सोचा, कि हम समय के साथ चल रहे हैं लेकिन ये नहीं सोचा, क़िस्मत अपना खेल खेल रही है। बच्चा जो अपनी क़िस्मत में लिखवाकर लाया है उसी के अनुसार उसकी बुद्धि का विकास होगा। हम मेहनत करते रहे, अपनी क़िस्मत बदलने के लिए बाद में एहसास हुआ कि हम तो क़िस्मत में ये ही लिखवाकर लाये हैं कि मेहनत करोगे, तभी खाने को मिलेगा। वरन  ऐसे भी लोग हैं जो थोड़ी मेहनत में ही अधिक सफलता का स्वाद चख़ लेते हैं ,क्योंकि उनकी क़िस्मत उनके साथ थी।  उनकी किस्मत में ऐसा ही लिखा था। अब हमारी ज़िम्मेदारी बनती थी, कि बच्चों का विवाह सही और अच्छी जगह करा  दें वहाँ भी क़िस्मत अपना खेल खेल गयी, बेटी को तो उसके दफ्तर में ही लड़का मिल गया। क्या -क्या अरमान सोचे थे ?बेटी के विवाह के ,लेकिन सब उनके कहे अनुसार करना पड़ा।बेटी अपने घर चली गयी। अब बेटे के लिए लड़की देखने जाने लगे। लड़का बाहर विदेश गया  था ,दो साल बाद बहु लेकर आ गया। 
                  एक दिन ऐसे ही बैठी थी, कि क़िस्मत मुस्कुराने लगी बोली -क्या अब भी नहीं थकी, मुझसे लड़ते -लड़ते।  तेरे सारे काम तो  करा दिए फिर भी तू परेशान है क्योंकि इन सबका श्रेय तो तू अपने -आप लेना चाहती थी लेकिन इंसान के हाथ में क्या है ?इंसान सोचता है कि मैं कर रहा हूँ लेक़िन भगवान ने सबको अपनी -अपनी जिम्मेदारी सौंपकर भेजा है , जिसे कुछ लोग क़िस्मत का नाम दे देता है। इंसान यहाँ आकर अपने -आप को ही सब कुछ समझ बैठता है ,जैसे कि तुम मुझसे लड़ रहीं थीं लेकिन तुम नहीं समझीं कि तुम अपनी किस्मत में ये ही जिद्दीपन और मेहनत लिखवा कर लाई  थीं।  न जाने कितने लोगों से मैं अपना लोहा मनवा चुकी हूँ। अब अपनी किस्मत से, अपने आप से अब लड़ना बंद करो ,कुछ हासिल नहीं होगा। शांत रहो !और उसका स्मरण करो, सोचो जो भी होगा अच्छा होगा।    


















 
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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