महिमा जी एक समाज सेविका हैं ,ज़्यादातर वो ग़रीब बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं ,बच्चों को स्कूल की यूनिफॉर्म ,किताबें इत्यादि सामान जुटाने का प्रबंध करतीं। वो कहतीं,'' कि ग़रीबों को स्वयं ही ग़रीबी से लड़ना होगा ,किसी का इंतजार न करें। गरीबों को स्वयं ही मजबूत होना होगा ,मेहनत करें ,पढ़ाई करें।'' उनकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहतीं। वे कहतीं- गरीबी को हराना है ,उससे हारना नहीं है ,उनका बस चलता तो किसी को ग़रीब या कमज़ोर न रहने देतीं। उनका यही उद्देश्य रहता कि कोई ग़रीब किसी के आगे हाथ न फैलाये।'' वो ऐसे लोगों की कतई मदद नहीं करतीं जो मेहनत नहीं करना चाहता। जो आगे बढ़ना चाहते हैं ,जीवन में कुछ करना चाहते हैं उनकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहतीं ,जो ग़रीबी का रोना रोते रहते हैं और करना कुछ नहीं चाहते उनकी तो अच्छी ख़ासी क्लास ले लेतीं।
एक दिन महिमा जी की ख़ास सहेली गीता अचानक उनके दफ़्तर में आ गयी। उससे मिलकर उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई, वो भी समाज सेविका तो नहीं पर कुछ न कुछ जैसे पेंटिग प्रतियोगिता या सिलाई सिखाना जैसे कार्य करती रहती। दोनों सहेली बहुत दिनों बाद मिली थीं ,चाय -नाश्ते के बाद महिमा जी ने अपनी संस्था के लोगों से मिलवाया और उन बच्चों से भी जो पढ़ाई के साथ -साथ कुछ हस्तकला का प्रशिक्षण भी ले रहे थे। दोनों ने ढेर सारी बातें की फिर महिमा जी ने पूछ ही लिया। जो बात उन्हें इतनी देर से ख़टक रही थी। बोलीं -गीता तुम काफी कमज़ोर नज़र आ रही हो ,चेहरा भी बुझा -बुझा सा है। '' गीता ने भूमिका बांधते हुए कहा -नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है वैसे तो प्रदीप बहुत ही समझदार व पढ़े -लिखे हैं ,उनका व्यापार भी अच्छा चल रहा है। महिमा जी ने बीच में ही टोकते हुए बोलीं -ये सब तो मैं जानती हूँ ,लेकिन फिर भी तुम कुछ परेशान नज़र आ रही हो, प्रश्नात्मक दृष्टि से देखते हुए बोलीं। गीता बताते हुए थोड़ा झिझक रही थी। महिमा ने महसूस किया कि बताना तो वो चाह रही है लेकिन शायद झिझक ने उसे रोका है इसीलिए बात को बदलते हुए बोली -क्या हमारे जीजू यानि प्रदीप जी डांटते -फ़टकारते हैं या मार -पीट करते हैं ?महिमा जी का ये अपना अलग ही अंदाज होता था, दूसरे से मन की बात निकलवाने का। गीता बोली -नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।
तो फिर क्या कारण है ?परेशान तो तू है ,ये बात तो पक्की है ,बताना भी चाह रही है ,क्या कोई व्यक्तिगत या गुप्त रहस्य है ?गीता बोली -प्रदीप अच्छे हैं ,पढ़े -लिखे हैं ,मेरे खाने -पीने का भी बहुत ख़्याल रखते हैं। महिमा कुछ बोलने ही वाली थी कि गीता ने उसे चुप रहने का इशारा करते हुए बोली -किन्तु वो किसी भी तरह का परहेज़ नहीं करते , कोई सुरक्षा नहीं करते। बताते हुए उसकी आवाज़ काँपने लगी -शुरू में जब मेरा बेटा हुआ, उसके कुछ दिनों बाद बेटी भी रह गयी ,दोनों में सिर्फ डेढ़ साल का ही अंतर है। उन्हें मैंने कैसे पाला ?मैं ही जानती हूँ ,सोचा थोड़े ही दिनों की मेहनत है ,दोनों बच्चे साथ ही बड़े भी हो जायेंगे। ये तो सही है ,थोड़ी परेशानी हुई होगी अब तो सब ठीक है न ?महिमा बोली। हमने आज तक कभी भी इस तरह की बातें नहीं की थी इसीलिए दोनों को ही थोड़ी झिझक हो रही थी। महिमा ने अपने को संयत रखते हुए पूछा -परेशानी बताओ ?अबकी बार गीता झल्लाई सी बोली -बता रही हूँ ,न। मेरे विवाह को सात या आठ वर्ष होने वाले हैं और अब तक लगभग इतने ही बच्चे मेरे गर्भ में रह चुके हैं। कहते हुए उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। बोली- जब मैंने महाभारत देखी ,उसमें गंगा अपने बच्चों को पानी में बहा देती है। मुझे भी लगता है कि मैं भी हर वर्ष एक हत्या कर रही हूँ या तो मुझे गर्भपात करवाना पड़ता है या दवाई लेती हूँ।
कुछ सोचकर महिमा बोली-तुम भी तो सुरक्षा के साधन अपना सकती हो ,ये ही तो परेशानी है कोई भी दवाई मुझे अनुकूल नहीं पड़ती, मुझे परेशानी होती है।गीता की बातें सुनकर जैसे महिमा जी को भी कुछ याद आया बोलीं - हमारे यहाँ भी एक महिला है सलमा। वो इसीलिए परेशान है कि उसके सात बच्चे हैं ,खाने को घर में नहीं ,पति रिक्शा चलाता है ,बेटियाँ घर -घर जाकर बर्तन और सफाई करती हैं ,ग़रीबी उन्हें दिन -रात तोड़ रही है फिर भी वो जिंदगी से जूझ रहे हैं। वो इसीलिए परेशान हैं कि उनके मज़हब में किसी भी तरह की परहेज़ी के लिए मना करते हैं। उसने बताया- कि एक लड़की का तो उसने विवाह भी करा दिया। कुछ दिन तो ठीक से गुजरे, दो बच्चे भी हो गए। इतना समझाते -समझाते भी ये लोग समझ ही नहीं रहे हैं ,अभी बीस साल की हुई है ,दो बच्चों की माँ भी बन गयी। अभी कितनी उम्र पड़ी है ?इस तरह से तो वो न जाने कितने बच्चों की माँ बन जायगी ?और फिर ग़रीबी उनका हाथ थाम लेगी। छोटे -छोटे बच्चे पढ़ाई -लिखाई की उम्र में कमाने के लिए मज़बूर हो जायेंगे लेकिन यहीं बात ख़त्म नहीं होती ,वैसे तो उसकी बेटी और दामाद में बहुत प्रेम था लेकिन एक दिन किसी कारण से उसने अपनी पत्नी को तलाक़ दे दिया। जब उसे एहसास हुआ कि उससे कितनी बड़ी ग़लती हो गयी।
तब तक तीर कमान से निकल चुका था ,उससे माफ़ी मांगने आया ,दुबारा उससे निक़ाह करने को तैयार है लेकिन ये हलाला ?इसके बिना वो दुबारा निक़ाह नहीं कर सकती ,एक रात के लिए किसी गैर मर्द के साथ उसे हम बिस्तर होना पड़ेगा। इससे बड़ी वेदना क्या हो सकती है ?एक औरत के लिए ,अपने ही शौहर से मिलने के लिए ,उसे किसी ग़ैर मर्द को एक रात के लिए झेलना होगा। हमारे हिसाब से कहें, तो 'अग्नि परिक्षा' देनी होगी। ये वेदना हिन्दू औरत की हो या मुसलमान,झेलना तो औरत को ही पड़ता है। पढ़े -लिखे होने के बावज़ूद, परहेज़ न कर पाने के बाद बच्चे गिराने का दर्द ,दूसरी तरफ मज़हब की बातें लेकिन दोनों ही तरफ दुःख है, तकलीफ़ है ,इसमें सहना तो औरत को ही पड़ता है। एक अपने बच्चे पालने के लिए संघर्ष कर रही है दूसरी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है ,धर्म से जुड़े कायदे क़ानून को मानने के लिए मज़बूर ,बेबस।