aatmraksha

ये क्या, बंटू तुम यहाँ क्या कर  रहे हो ?तुम्हें इतना पता होना चाहिए ,जब किसी के कमरे में प्रवेश करते हैं तो दरवाजा खटखटाना चाहिए ,मैं नहा रही थी ,और जब मैं यहाँ नहीं थी तो तुम्हें यहाँ से चले जाना चाहिए था। इतनी तहज़ीब तो तुम्हें होनी भी चाहिए। आज सख्ताई से पलक ने कह ही दिया ,उसके ऐसे व्यवहार के कारण बंटू उठकर चला गया ,वो तिलमिलाई , बुदबुदाई, ये तो एक न एक दिन होना ही है,कब तक उसे बच्चा समझते रहेंगे ?दीपक भी न , बस  सबको अपने जैसा समझते हैं। पलक कई दिनों से महसूस कर रही थी कि बंटू उसके आस -पास घूमता रहता है या उसके नज़दीक आने का प्रयत्न करता है। शुरू में तो उसने ध्यान ही नहीं दिया लेकिन अब ज्यादा हो गया। इतने दिनों से अपने पति की बातों का ध्यान रखते हुए वो सब सहन कर  रही थी। उसे अपने पति के शब्द ध्यान हो आये ,जब उससे कहा -पलक!बंटू  मेरा छोटा भाई है ,उसका ध्यान रखना , उसे कभी महसूस नहीं होना चाहिए कि उसका भाई ,भाभी के आने पर बदल गया या उसके प्रति लापरवाह हो गया। ''इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर बंटू के खाने -पीने से लेकर  हर चीजों का ध्यान रखने लगी। कभी -कभी वो उसे सताता भी लेकिन देवर -भाभी वाला मज़ाक समझ उसकी कुछ बातों को नज़र अंदाज कर  देती। 
             एक दिन जब वो अपने कमरे में लेटी  थी तो वो चुपचाप आकर लेट गया पीछे से अपनी बाहों में इस तरह से जकड़ा कि उसे लगा, ये बचपना नहीं। उसने कहा -ये क्या कर रहे हो बंटू ?और वो सीधी होकर  बैठ गयी और वो अपनी हरकत पर न ही शरमिंदा हुआ , न ही उसे अपनी  गलती का एहसास हुआ और बेशर्मो की तरह दाँत दिखा रहा था।  किसी तरह उसे बाहर भेजा। सोचती रही ,उसकी इस हरकत को पति को बताऊँ या सास को। सुनकर दीपक तो शायद बोलें उसने अंदाज़ा लगाया -तुम्हारी ग़लत फ़हमी होगी ,वो अभी बच्चा है। सास के तो पहले से ही तेवर तीखे रहते हैं ,अगर ये बात बताई तो शायद कहने लगें  कि झूठ बोल रही है ,मेरे बेटे को उड़ाना चाहती है, दोनों भाइयों में मतभेद कराना चाहती है ,तिल का ताड़ बनाने में उन्हें देर नहीं लगेगी। ये ही सब बातें सोचकर वो चुप रही लेकिन इसके बाद उसकी हरकतें बढ़ने लगीं।  एक दिन वो स्नानागार में घुस आया ,उसके इस तरह अचानक आ जाने से उसकी चीख निकल गयी इससे घबराकर वो तुरंत बाहर आ गया। बाहर जब दीपक आये तो बोले- क्या हुआ ?बंटू बाहर ही था ,उसने जबाब दिया -पता नहीं, भाभी क्यों चिल्लाई ,मैं भी तो उनकी चीख सुनकर आया हूँ ,शायद किसी छिपकली या तिलचट्टे से डर गयीं हों। मैं स्नानागार के दरवाज़े के पास खड़ी ये सब सुन रही थी। 
              मैं सोच रही थी कि औरत की जिंदगी कितनी मुश्किल है? आसानी से नहीं जी जा सकती अपने साथ कुछ ग़लत हो रहा है ,खुलकर उसका विरोध भी नहीं कर सकती ,विरोध करने का मतलब है ,घर में कलह होना। उसके बावजूद भी कोई उसकी बात पर यकीन करेगा भी या नहीं। अगर उम्मीद होती,कि उसकी बात पर यक़ीन कर  लिया जायेगा तो वो कब की बता चुकी होती ?इसी अंतर्दवंद में वो परेशान घूम रही थी कि क्या करे ,किससे  कहे ?आज उसे अपनी सहेली प्रिया की बेबसी का एहसास हो रहा था कि उस पर क्या बीत रही होगी  ?जब उसके अपने ही परिवार के चाचा उसके साथ ऐसी हरकतें करते होंगे। आज उसे महसूस हुआ, जब अपने ही परिवार के लोगों द्वारा छले जाते हैं।  ससुराल हो या मायका किसी की भी बुरी नियत पड़  जाये तो क्या करें ? कोई बाहर का हो तो उसके मुँह पर दो जूते मारकर आयें  और सीना ठोंककर अपने घरवालों को ले जायें लेकिन जब अपने ही घर में या मजबूरी में फँस जायें, तो क्या करें ?अंदर ही अंदर घुटना पड़ता है।  परिवार की इज्ज़त का सवाल ,रिश्तों के बिखरने का भय, क्या कुछ सोचकर नहीं चलना पड़ता? औरत की जिंदगी क्या सोचकर बनाई ?भगवान ने ,हमेशा दोराहे  खड़ी रहती है। 
                  औरत तो आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ते -लड़ते आत्मरक्षा की लड़ाई में उलझकर रह जाती है। कैसे अपने -आप को अपने ही लोगों  से बचाना है ?कैसे अपने को सुरक्षित करे ?यदि किसी की शिकायत करे भी तो कोई यक़ीन  नहीं करता ,क्या कह रही हो तुम, इनकी उम्र तो देखो ?अक़्सर ये शब्द सुनने को मिलते ,अचानक उसके चेहरे पर मुस्कान आती है अरे ! उनकी उम्र देखूँ , उन्होंने अपनी उम्र नहीं देखी किसी भी लड़की को छेड़ते हुए।सब कुछ लड़कियों या औरतों को ही क्यों देखना पड़ता है ?वो अपने को  संयमित करके बाहर आई ,बाहर सब बैठे उसका इंतज़ार कर रहे थे। देखते ही उस पर प्रश्न दाग़ दिया ,ऐसा क्या देख लिया ?जो तुम इतनी ज़ोर से चीखीं। उसने एक नज़र बंटू को देखा, कुछ नहीं कहकर रसोईघर में चली गयी ,तभी सासू माँ की आवाज़ उसे सुनाई दी -बहू !कल तुम्हें अपने मायके जाना है ,सावन आ रहा है न , तुम्हारी पहली तीज मायके में होगी ,कल तुम्हारा भाई लेने आ जायेगा, अपना सामान बांध लेना। ठीक है ,कहकर वो अपने कमरे में चली गयी। अगले दिन वो अपने घर में थी। सोच रही थी कि मम्मी से बताऊँ या नहीं दो तीन दिन हो गए सोचते-सोचते ,फिर उसने सारी  बातें अपनी मम्मी को बताईं। सुनकर वो थोड़ी देर चुप रहीं, फिर बोलीं -ये बात तुम्हें अपने पति को बतानी चाहिए ,क्या पता वो इसका कुछ हल निकाल ले ?किसी और से पता चला तो बात बिगड़ भी सकती है और वो कहेगा कि मुझे बताना चाहिए था ,तुमने मुझ पर विश्वास नहीं किया। 
                 घर आकर उसने सारी  बातें अपने पति को बताईं पहले तो वो कहने लगे ये सब तुम क्या कह रही हो ?जब मैंने उस दिन चीखने का कारण बताया तो वो बहुत ही आहत हुए ,वो अपने को यकीन नहीं दिला पा  रहे थे ,फिर बोले -तुम अपने व्यवहार को थोड़ा परिवर्तित करो और आज उसी का परिणाम था कि मैंने बंटू को सख़्त लहज़े में कमरे से बाहर कर दिया। अब मेरे साथ मेरे पति भी थे ,जो बात भी होती मैं उन पर विश्वास करके बता देती। दीपक भी प्रयास करते कि बंटू  मेरे पास कम आये। मेरे रूखे व्यवहार से वो थोड़ा आहत भी हुआ और अपनी कुंठा किसी न किसी बहाने निकालने लगा। अब वो अपनी माँ यानि मेरी सास को मेरी  कुछ न कुछ कमियाँ गिनाने लगा। एक दिन जब मैंने अपने देवर और सास  बातें सुनी तो अचम्भित रह गयी। वो कह रही थीं -बंटू तुम जो हरकतें अपनी भाभी के साथ कर रहे थे ,मैं उससे अनजान नहीं थी। तुमने अपनी भाभी और भाई की अच्छाई का ये सिला दिया ,तुम्हें शर्म नहीं आई उसके साथ ऐसी ज़लील हरक़त करते हुए ,भाभी तो माँ समान होती है। ये तो उसकी अच्छाई है जो उसने चुपचाप सहा। बंटू
अचम्भित सा अपनी माँ को देख रहा था। माँ ने उसकी जिज्ञासा दूर करते हुए कहा -हाँ मुझे सब मालूम है ,जब वो दीपक को ये बातें बता रही थी तभी मैंने सब सुन लिया। मैं तो ये देख रही थी कि दोनों इस समस्या को कैसे सुलझाते हैं ?मुझे इस बात का भी दुःख है कि एक औरत होते हुए भी, मैं अपनी बहु का विश्वास नहीं जीत पाई ,उसके लिए मैं सास बनकर ही रह गयी वरना अपनी परेशानी मुझे आकर बताती ,यूँ मन ही मन न घुटती। मुझे इस बात का दुःख है कि मेरे घर में, मेरे अपने बेटे ने ये हरक़त की ,मैं उससे कैसे नजर मिलाऊँगी ?मैं सोच रही थी कि मैंने अपनी सास को ग़लत समझा काश !हर औरत की ऐसी सोच हो तो घरों की परेशानियाँ समझदारी से और बिना किसी झगड़ों के सुलझ जाये। 


















कलह 
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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