चतुर, कस्तूरी से, स्कूल के बच्चों को पढ़ाने के लिए कहता है ,तब कस्तूरी कहती है -''मैं भला बच्चों को कैसे पढ़ा पाऊँगी ?''
तब चतुर ने उसे विश्वास दिलाया था ,थोड़े समय के लिए सही वो, अपने आपको भूल गयी है ,वो स्वयं भी, एक पढ़ी -लिखी महिला है।''इतने छोटे बच्चों को तो पढ़ा ही सकती है।
चतुर दुनिया भर में कहीं भी घूमता रहे किन्तु कभी अपनी पत्नी को एहसास नहीं होने दिया कि वो अकेली है ,या फिर किसी के सामने, उसको अपमानित किया हो। वो जानता है, हर रिश्ता सम्मान चाहता है। आज तभी तो कुछ ऐसी ही महिलाएं जो अपने मन में दर्द, अपमान लिए बैठीं हैं ,चतुर के तनिक प्यार के बोलों से भावुक हो जाती हैं। चतुर के बहकावे में कहूँ या उसके झूठे प्यार के दिखावे को देख ,बहक जाती हैं और अपने मन की दुविधा को उसके समझ खोलकर रख देती हैं।
चतुर अपनी पत्नी से ज़्यादा कुछ तो नहीं बताता है किन्तु कस्तूरी को भी उस पर विश्वास है। वो जो भी कर रहा है ,अपने परिवार के लिए ही तो कर रहा है। चतुर ने कभी अपनी पत्नी को ताना नहीं दिया,-' तुम दिनभर करती ही क्या हो ? कभी उसे एहसास नहीं दिलाया ,तुम मेरे लायक ही नहीं हो। तुम समय के साथ नहीं चलतीं , या कम पढ़ी -लिखी हो ,तुम्हारे साथ रहने से मेरी बेइज्जती होती है।
ऐसा वो अपनी पत्नी से क्यों कहेगा ? जबकि वो जानता है ,वो ,अब तक जितनी भी महिलाओं के सम्पर्क वो आया है। उसने, उनकी कमज़ोरी का ही लाभ उठाया है। उसने स्कूल में दो -चार अध्यापिकाएं भी रख लीं हैं या यूं कहें ! भाभियों को रख लिया है और भाभियों को पटाने में वो पहले से ही माहिर है।
देखिए ,शिल्पा जी ! आप हमारे स्कूल की एक प्रखर अध्यापिका हैं। आप जैसी शिक्षिकाओं के, कारण ही तो हमारा स्कूल उन्नति कर रहा है और आगे भी करेगा। अब यह स्कूल आपका है। इस स्कूल को हमने, आपके हवाले कर दिया है।
सर !आप ये क्या कह रहे हैं ? मेरे पास इतना अनुभव भी नहीं है ,बहुत पहले कभी पढ़ाया था। अब तो शायद वो भी स्मरण नहीं रहा।
ज्ञान कभी समाप्त नहीं होता ,समय के साथ बढ़ता है ,जैसे आप अपनी गृहस्थी चला रही हैं ,बस इस स्कूल का भी ऐसे ही संचालन करना है। हमारी भाभी बहुत ही गुणी हैं, कहते हुए ,उनकी तरफ प्यार भरी नजरों से देखा ,जब आपने हमारे भाई को संभाल लिया तो ये स्कूल क्या चीज है ?
चतुर के इस तरह कहने से वो शरमा गयी और बोली -अब आप इतना कह रहे हैं ,तो इंकार तो नहीं करूंगी किन्तु मैं प्रयास करूंगी अपना बेस्ट दे सकूं।
बात ख़त्म !अब आपने इतना कह ही दिया है, तो अब कहने को कुछ नहीं रहा ,हमें आप पर पूर्ण विश्वास है ,आप अपने खाली समय का सदुपयोग करेंगी। ज्ञान बाँटने से ही बढ़ता है ,घर में रहकर महिलाओं की कोई क़द्र नहीं होती। महिलाओं को अपने लिए भी तो सोचना चाहिए।
आप सही कह रहे हैं।
प्रातः उठते ही शिल्पा फुर्ती से अपने बच्चों को तैयार करती है ,नाश्ता बनाती है और उन्हें स्कुल भेजकर अपने पतिदेव का नाश्ता भी मेज पर रख देती है।
आज इतनी जल्दबाज़ी क्यों, क्या कहीं जा रही हो ?
हाँ ,मैंने एक स्कूल में नौकरी कर ली है ,वहीँ जा रही हूँ।
तुमने मुझे पहले बताया भी नहीं ,न ही मुझसे पूछा।
इसमें पूछना क्या है ?आपके सभी कार्य तो समय पर हो रहे हैं ,अब मैं जीवन में कुछ करना चाहती हूँ ,तमाम उम्र क्या इस घर- परिवार में ही लगी रहूंगी ? मेरी सारी पढ़ाई -लिखाई व्यर्थ जा रही है।
पढ़ाई -लिखाई का ये अर्थ तो नहीं ,कि बाहर जाकर नौकरी ही करनी है। अपना घर -परिवार देखो !अपने बच्चों को पढ़ाओ ! उनके ट्यूशन लगवा रखे हैं ,ट्यूशन हटवाकर अपने बच्चों पर ध्यान दो !
आप क्या चाहते हैं ?मैं सारा दिन घर में ही खपती रहूं ,बाहर जाकर कुछ न करूं नाराज होते हुए शिल्पा बोली -मुझे अपने लिए भी कुछ करना है।
प्रवीण को लगा ,इसका कुछ दिनों का शौक है ,कर लेने दो ! जब दोहरी मेहनत पड़ेगी तो अपने आप नौकरी छोड़ देगी। नौकरी करने का भूत उतर जायेगा। तब उसने पूछा -वैसे तुम नौकरी करने कहाँ जा रही हो ?तुम्हारी नौकरी कहाँ लगी है ?
पहले तो शिल्पा चुप रही ,तब बोली -अभी एक नया स्कूल खुला है ,एक ''कस्तूरी पब्लिक स्कूल ''
तुम वहां जा रही हो ,आश्चर्य से प्रवीण ने पूछा।
क्यों, क्या हुआ ?
क्या तुम जानती नहीं हो ?वो स्कूल किसका है ?
हाँ जानती हूँ ,''चतुर भार्गव ''सर ने ही तो मेरा साक्षात्कार लिया।
तुम वहां क्यों गयीं ?क्या तुम जानती हो वो कैसा आदमी है ?
कैसा ?
वो तो एक नंबर का धोखेबाज़ है ,जिनके यहाँ रहता था ,उन्हीं के साथ घपला किया ,जेल भी गया।
अब आप ये सब मुझे इसीलिए बता रहे हैं ,ताकि मैं वहां न जाऊँ। मुझे इस सबसे क्या लेना -देना मुझे तो बस वहां नौकरी करनी है ,मुझे उनके व्यक्तिगत मामलों से कोई लेना देना नहीं।
अच्छा ,प्रवीण समझ गया था ,अभी इसे नौकरी की ज़िद चढ़ी है ,जब उसकी असलियत इसके सामने आएगी ,अपनेआप ही नौकरी छोड़ देगी। तब पूछा -तुम्हारी नौकरी का वेतन कितना तय हुआ है ?
शिल्पा !अब क्या कहे ? मात्र पांच हजार पर नौकरी करने जा रही है ,तब बोली -अभी तो आठ हज़ार देने के लिए कहा है ,नया स्कूल खुला है ,सर, कह रहे हैं ' बाद में पैसे बढ़ा देंगे ,वैसे मैं सारा दिन घर में ख़ाली रहती हूँ। कम ही सही कुछ तो आता है ,कहकर उसने प्रवीण को ही नहीं अपने आपको भी समझाया।
कपिला का आत्मविश्वास जबाब दे रहा था ,किन्तु अब उसके पास समय था , ऐसे में चतुर ने उसे अपने ज्ञान का सदुपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि प्रधानाध्यापिका के रूप में, कस्तूरी का नाम लिखा गया है किंतु वह इतना कुछ जानती नहीं है। तब वो कपिला से बोला - आप एक अनुभवी, ज्ञानवान शिक्षिका हैं , यह स्कूल आपका है , इस स्कूल में ,अभी तो ज्यादा बच्चे नहीं आए हैं किंतु यदि आपका सब भरपूर सहयोग रहा , तो एक दिन यह स्कूल बहुत उन्नति करेगा और जैसे-जैसे यह उन्नति करेगा वैसे-वैसे ही, आपका वेतन भी बढ़ता रहेगा।
वैसे भाभी जी ,आपके कितने बच्चे हैं ?
जी ,तीन हैं।
बस तो, हो गया काम !आपके दो बच्चे इसी स्कूल में पढ़ेंगे !हमारा स्कूल अभी पांचवी तक है , शीघ्र ही छठी कक्षा तक हो जायेगा। जहाँ तक मेरा विचार है ,आपका एक बच्चा सेकिंड क्लास में है ,दूसरा चौथी क्लास में है। इससे बेहतर और क्या हो सकता है ?आपके दोनों बच्चे अपनी माँ की आँखों के सामने रहेंगे और अपनी माँ से ही पढ़ेंगे।
किन्तु सर ! उनका अभी दूसरे स्कूल में दाखिला करवाया है।
क्या उस स्कूल की यूनिफॉर्म बन गयी ,किताबें आ गयीं ?
नहीं ,अभी तो नहीं .....
