बहन का विवाह है ,सारी चीज -ज़ेवर बनवा दिए ,लेकिन अंगूठी कैसे भूल गए ?फिर से हिसाब लगाने लगे लड़की के गले का सेट ,उसकी सास के लिए पांच ज़ेवर ,ये उसकी जेठानियों के ज़ेवर ,हथफूल, तगड़ी फिर बड़बड़ाने लगे -अब कोई पहनता तो है नहीं ,फिर भी विवाह में देने के लिए तो बनवाने पड़ते ही हैं। सुनो !उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज़ दी। पत्नी आकर खड़ी हो गयी। विक्रम जी बोले -मैंने दुबारा सारा हिसाब लगाया ,लड़की के उसकी सास और जेठानी को देने वाले जेवर सब तैयार हैं ,बस लड़के की अंगूठी बननी रह गयी ,पता नहीं ये कैसे गड़बड़ हुई ?परसों ही सामान लेकर जाना है ,अब क्या करूं ?बैठे कुछ सोचते रहे ,फिर जैसे अचानक याद आया ,बोले -प्रभा !तुमने जो अपने गहने तुड़वाकर मेरे लिए अंगूठी बनवाई थी ,मैं तो पहनता नहीं, उसे ही दे दो, इतनी जल्दी अब अंगूठी बनेगी नहीं। प्रभा थोड़े गुस्से से बोली -वो अंगूठी ,कैसे दे दूँ ?वो तो मैंने ,अपनी बेटी के लिए रख दी है। हमारे पास पूंजी ही क्या है ?मैंने अपने ज़ेवर तुड़वाकर वो अंगूठी बनवाई थी। हम भी तो अपने दामाद को कुछ देंगे कि नहीं।
विक्रम जी बोले -तुम भी कमाल करती हो ,अभी हमारी बेटी बहुत छोटी है ,उसके समय में और बन जायेगी ,अभी तो पूनम के विवाह का सवाल है,लाओ !उसे निकालकर दे दो। प्रभा ने एक बार और विक्रम जी को समझाने की नाकाम कोशिश की ,बोली -आप समझ नहीं रहे हैं ,पूनम का विवाह तो सन्युक्त परिवार में मिजु -लकर हो जायेगा, लेकिन जब हमारी बेटी का विवाह होगा ,उस समय हमारी मदद कौन करेगा ?तुम उसकी चिंता मत करो ,उस समय जो उसकी किस्मत में होगा ,हो जायेगा। फिलहाल अभी तुम वो अंगूठी निकालकर दे दो, वो भी तो बहन है कोई गैर नहीं । प्रभा ने बेमन से वो अंगूठी निकालकर दे दी।विक्रम जी घर के बड़े जो हैं ,सभी भाई -बहनों में सबसे बड़े। घर को और सबको साथ रखना , परिवार को मिल -जुलकर चलाना ,बहन के लिए लड़का देखना ,सही उम्र में उसका विवाह करना ,अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। उनका अपना व्यापार या यूँ कहे गुजारे के लिए एक छोटी सी दुकान है। दोनों छोटे भाई नौकरी करते हैं लेकिन परिवार के प्रति जिम्मेदारी विक्रम जी ही समझते हैं। पत्नी को गुस्सा भी आया क्योंकि व्यापार में कमी जो आई है ,कारण अपनी बहन के विवाह की जिम्मेदारियों में जो व्यस्त रहे।
प्रभा ने समझाने का प्रयत्न भी किया कि उन लोगों की तो बंधी तनख़्वाह आती है ,वे भी छुट्टी में काम में मदद कर सकते हैं। क्या उनकी बहन नहीं है ?तुम्हारी दुकान का भी तो नुकसान हो रहा है। मैंने कहा भी, तो मना कर दिया नए -नए बहाने बता रहे थे। प्रभा ने गुस्से में कहा। विक्रम जी ने प्रभा को शांत रखने व समझाने के उद्देश्य से कहा -घर -परिवार में ऐसी बातें नहीं सोचते ,कोई कुछ करता है ,कोई कुछ। परिवार में अपने ही बारे में सोचो, ऐसा नहीं चलता है। अभी छोटे हैं ,धीरे -धीरे अपनी जिम्मेदारी समझ जायेंगे। प्रभा ने तुनककर कहा -कब समझेंगे ?दो - दो ,तीन -तीन बच्चों के बाप तो हो गए। खेती का सारा पैसा रखते हैं ,अपना वेतन अपने पास रखते हैं। मंझले को देखा नहीं ,पहले पत्नी को अपने साथ ले गया था।जब वहाँ खर्चे बढ़े तो वापस यहीं ले आया ,सारा खर्चा घर से ही तो होता है ,यहाँ खुलकर खर्च करते हैं। हम अपनी कमी करते रहते हैं ,कब तक ऐसा चलेगा ?
परिवार भी इस अंगूर के गुच्छे की तरह होता है ,गुच्छे में इन अंगूरों की कीमत ज्यादा है ,जो अंगूर इस गुच्छे से अलग हो गए उनकी कीमत कम रह गयी ,विक्रम ने अंगूर खाते हुए पत्नी को समझाया। तभी प्रभा बोली -गुच्छे को कितने प्यार और सहजता से रखा जाता है ,थोड़ी ठेस लगी , जिन अंगूरों की पकड़ कमज़ोर होती है वे अंगूर बिखर जाते हैं। इसी तरह कमज़ोर रिश्ते भी थोड़ी सख्ताई से बिखरते नज़र आयेंगे। कब तक सहेजते रहेंगे ?तभी प्रभा ने दूसरी तरफ से गुच्छा दिखाते हुए बोली -देखो ,कुछ अंगूर इस गुच्छे में दब भी गए हैं जो अपना अस्तित्व ही खो चुके हैं ,दूसरों के दबाब के कारण। इससे तो जो अंगूर गुच्छे से अलग हो गए ,भले ही कीमत कम हो लेकिन उनका अस्तित्व तो कायम है। गुच्छे में दबे हुए अंगूरों की क़ीमत भले ही अधिक है लेकिन इनका अब कोई अस्तित्व ही नहीं। अब ये दबे कुचले अंगूर किसी काम के नहीं ,न ही खाये जायेंगे ,ये सिर्फ़ कूड़ेदान में ही जायेंगे। बात तो सही कही, लेकिन परिवार तो परिवार है। विक्रम जी बोले -परिवार में ,मिल -जुलकर ही प्यार से अपनेपन से काम चलता है। बहन के विवाह की बात है ,मन कसैला मत करो ,ख़ुशी -ख़ुशी विवाह करो ,उसमें शामिल हों। बहन के विवाह बाद विक्रम अपने काम में लग गए।
बहन के विवाह के बाद थोड़ा ऋण भी हो गया ,व्यापार भी मंदा था ,उसमें भी और बढ़ाने के लिए और पैसा चाहिए था। सोचा दोनों भाइयों से मदद ले लेते हैं ,दोनों को पास बुलाया ,बोले -पूनम के विवाह में भी काफी खर्चा हो गया ,काम भी मंदा चल रहा है। जिन लोगों से पैसा लिया है ,उतारना भी है। मैंने सोचा -आधा मैं उतार दूंगा, आधा तुम लोग मिलकर उतार देना। पहले तो दोनों चुपचाप सारी बातें सुनते रहे, ऋण उतारने की बात पर दोनों के तेवर बदल गए। बोले -हम नहीं उतार सकते ,क्या हमने कहा था, इतना ख़र्च करने को। कि ऋण लेना पड़ जाये। विक्रम ने समझाते हुए कहा -बहन तो तुम्हारी भी है ,हमें ही मिल -जुलकर करना था उसका विवाह। तो क्या ,कर्ज़ चढ़ाकर विवाह करने की क्या आवश्यकता थी ?दो साल बाद कर देते, कहीं भागे थोड़े ही जा रही थी छोटे ने जबाब दिया। मंझले ने भी समर्थन किया। उनके इस जबाब से उन्हें बहुत ही दुःख हुआ ,उन्हें अपनी पत्नी के कहे शब्द ध्यान आ रहे थे, कमज़ोर रिश्तों की तरह कुछ गुच्छे से अलग हुए अंगूर नज़र आ रहे थे और अपने को वही दबा -कुचला अंगूर महसूस कर रहे थे जो उस गुच्छे को सहेजने के कारण धीरे -धीरे अपना अस्तित्व खोता जा रहा था। बहुत सोचने के बाद उन्होंने मन ही मन कुछ सोचा। और बुदबुदाए -चाहे अंगूर की कीमत कम होगी ,किन्तु अपना अस्तित्व नहीं खोने देना है।


