Zeenat [part 24]

जब ख़ालिद के पिता ज़ीनत के लिए रिश्ता लेकर अपने भाई यूसुफ़ के घर पहुंचे ,तब यूसुफ़ ने , उन्हें अपनी समस्या बतलाते हुए ,उस रिश्ते से इंकार कर दिया किन्तु अंदर ही अंदर वे लोग ड़र भी गए कि कहीं इस बात से ख़ालिद नाराज़ होकर कोई गलत क़दम न उठा ले। तब  शुरुआत में ,तो उन लोगों ने ज़ीनत के बाहर -आने -जाने पर पाबंदी लगाई , ताकि ख़ालिद उससे मिलने की कोशिश न कर सके ,कुछ दिनों तक वे सावधान रहे। 

 बहुत दिनों तक उधर से कोई हरक़त न देख, वो लोग भी ,निश्चिन्त हो गए। ज़ीनत के चचाजान की तरफ से, जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। तब ज़ीनत के अब्बू यूसुफ़ को लगा- अब वो लोग, इस बात को समझ गए होंगे कि ज़ीनत अब किसी की अमानत है ,और अपने बेटे ख़ालिद को भी समझा लिया होगा। 


हमारे रिश्ते से इंकार करने पर उन्हें बुरा नहीं लगा है जबकि उन्हें इस बात का डर था कि कहीं  ख़ालिद  इस बात विरोध न करें,गुस्से में कहीं कोई गलत क़दम न उठाये, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

अभी मैं' ज़ीनत' के द्वारा बताई गई, इस कहानी पर विश्वास करने का प्रयास कर रही थी, क्या ये  ऐसे अच्छे परिवार से हो सकती है ? आखिर इसके साथ ऐसा क्या हुआ था ? यह तो बता रही है-' कि वह ठीक से बोलती थी, फिर इसके शब्द अस्पष्ट कैसे हो गए ? जो ये तुतलाने लगी, इसके साथ ऐसा क्या हुआ होगा ?

 एक बार को तो भूमि को लगा, कहीं यह  झूठ तो नहीं बोल रही है ,उसकी तरफ देख ,उसकी 'आंखों में पढ़ना चाहा ' लग तो नहीं रहा कि यह झूठ बोल रही होगी। भूमि भी उसकी कहानी सुनती रही किंतु उसकी कहानी कभी पूरी नहीं हो पाती ,कोई न कोई कारण बन जाता और वो चली जाती।

आप लोगों को भी उसकी कहानी इसी प्रकार टुकड़ों -टुकड़ों में मिलेगी। उस दिन के बाद से ज़ीनत तीन दिनों तक नहीं आई।  ये जब भी छुट्टी करती है ,कभी बताकर नहीं जाती। अबकी बार भूमि ने सोचा था -'कि इसको एक छोटा सा फोन लेकर दे दूंगी, ताकि मैं इससे संपर्क कर सकूं और इससे न आने का कारण पूछ सकूं किन्तु फिर सोचा - इसे तो कोई खाने के लिए पैसे भी  देता है तो यह उन्हें भी रख देती है, ताकि वह अपना घर बड़ा बनवाए।

 ऐसा नहीं है कि उसके पास घर नहीं है, उसके पास' सरकारी घर; है, मेरा मतलब है -'सरकारी योजना के तहत ग़रीबों को दिया जाने वाला एक 'सरकारी घर ''ज़ीनत के पास भी था, किन्तु इंसानी फ़ितरत यही है इंसान कब संतुष्ट हुआ है ? मुफ़्त का मकान मिल गया ,सर पर छत हो गयी किन्तु अब उसे लगता है मेरे बच्चे बड़े हो रहें हैं । बड़ा वाला लड़का बीस बरस का हो गया ,वो तो शादी लायक हो गया है, कल को उसकी बहू आएगी एक कमरा और बनवाना है।

 सारा दिन तो वह स्वयं ही, उस घर में नहीं रहती, इधर -उधर सड़कों पर धक्के खाती रहती है। उसके घर में खाना ही नहीं बनता ,बच्चे न जाने कहाँ खाते हैं और वो स्वयं जिनके यहाँ काम करती है ,वहीँ खा लेती है  ,जिस दिन कोई रोटी नहीं देता तो भूखी ही रह जाती है।  भूमि ने उससे पूछा -जब तुम घर में ही नहीं रहती हो , तो घर बनवा कर क्या करना है ? सारा दिन तो तुम इधर-उधर ही भटकती रहती हो।

आदत जो पड़ गयी है ,जब ये घर नहीं था ,तो मैं पुल के नीचे ,कभी किसी घर के आगे ,ख़ाली जगह में ऐसे ही तो रहती थी। खुले में रहने की आदत पड़ गयी है ,उस घर में रहकर , मैं क्या करूंगी ? जी नहीं लगता।

मैं समझने का प्रयास कर रही थी ,इसे तो खुले आसमान की आदत पड़ गयी है ,सारी धरती ही इसका अपना घर बन गयी है। उन चार दिवारियों में इसे घुटन महसूस होती होगी। जिनके अंदर जाने के पश्चात न ही कोई इंसान दिखलाई दे ,न ही कोई पूछे !अभी उसने अपनी बात पूरी नहीं की थी। 

वैसे बाजी ! तुम सही कह रही हो, उसे भूमि की बात उचित तो लगी किन्तु इस सबका कारण उसने बताया - अब रिश्तेदार कहते हैं - 'कि बेटे की शादी  करनी है या नहीं , उसके लिए पैसा जोड़ना है ,घर ठीक बनवाना है तो वह बेचैन हो जाती थी और तब वह प्रयास करती कि और पैसे जोड़ लूं कहीं और काम मिल जाए।अपने बेटे की शादी का सोचकर वो रोमांचित हो उठती ,उसका वो चेहरा न जाने किस -किसके द्वारा किये गए अपमान के कारण ,अधिकतर गुस्से से, तो कभी थकावट से भरा रहता ,अब वही चेहरा मुस्कुराता नज़र आ रहा था। 

ये वही बेटा है ,जो बिमार माँ से एक बार भी न पूछे ,माँ कैसी हो ?भूख लगी है या नहीं ,मुझे आज भी याद है -एक दिन ज़ीनत बिल्कुल टूटी हुई सी घर आई, वो बीमार थी ,उसने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था। 

 तीन दिनों के पश्चात जब 'ज़ीनत', भूमि के घर आई , तो भूमि ने पूछा -तीन  दिनों की छुट्टी कैसे की ? किंतु उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसे तो न जाने किस बात पर नाराजगी थी, न जाने वो किस पर गुस्सा थी ?  उसके चेहरे से स्पष्ट झलक रहा था, भूमि ने उससे बात करना उचित नहीं समझा क्योंकि भूमि ने अक़्सर देखा है-' जब उसे गुस्सा आता है, तो वह किस तरह से लड़ने लग जाती है ? ज़ीनत ने चुपचाप काम किया, चाय नाश्ता किया और चली गई।

 भूमि के मन में चल रहा था, न जाने, इसके साथ क्या हुआ होगा ? इसे  किस बात का गुस्सा है। 

अचानक वो दोपहर में आ गई और बोली -बाजी ! चाय पिलाओगी। 

हां पी लेना, कहते हुए भूमि उठी और भूमि ने उसको चाय बना कर दी , चुपचाप उसकी तरफ देखा लेकिन उससे कोई प्रश्न नहीं किया तब वह खुद ही बोली - बाजी में तीन दिनों से बीमार थी और भूखी थी। 

क्यों अब तो तेरे बच्चे बड़े हो रहे हैं, उनका विवाह करना चाहती है तब क्या तेरा बेटा, तुझे कुछ खाने के लिए नहीं दे सकता ? तुझे खाना बनाना नहीं आता तो ब्रेड खरीद कर और दूध में भिगोकर तो खा सकती है ,क्या तेरे घर में चूल्हा भी नहीं है ?

है ,आंटी ! सब है। कल मेरा लड़का दूध लाया था खुद ही गर्म करके पी गया बर्तन मांजने  के लिए मुझ पर छोड़ दिए, आज सुबह ही बर्तन मांजकर आई हूं। 

तू, ही देख ले ! यह तेरी कैसी औलाद है ? तुझे बीमारी में भी नहीं पूछा और तू, उसकी शादी करवाना चाहती है। जब बेटा ही तेरा अपना नहीं हुआ ,तो क्या तेरी बहू तेरी बातें सुनेगी ?

 वह तो बाजी मुझे मारता भी है, उसने कई बार मुझे पीटा है। 

किस बात पर पीटा  है ? सुनकर भूमि को गुस्सा आया किंतु यह बात उसको, ज़ीनत ने बताई नहीं और चुप हो गई। 

मेरी तो कभी शादी नहीं होगी , क्या मेरी जिंदगी यूं ही कट जाएगी ?

क्या हुआ ? अंततः भूमि ने पूछ लिया। 

मैं जब 20 वर्ष की थी, जब मेरी शादी हुई थी और अब 40 की हो गई हूँ जब से मेरा आदमी गया है एक बार भी उसने आकर देखा नहीं मैं कहां हूं, क्या कर रही हूं ? उसके बच्चे कैसे हैं ?

किंतु उस दिन तो तुमने कहा था कि तुम्हारा विवाह 15 वर्ष की उम्र में, होना तय हुआ था। 

तय हुआ था हुआ नहीं था। पाजी यह सब बातें छोड़ो ! मुझे तो इसी तरह बुढ़ापा जाएगा कहते हुए मेरी भाव से, वह भूमि को देख रही थी। भूमि महसूस कर रही थी लोग इस पागल कहते हैं किंतु इतना यह समझता है अपने लोगों को याद भी करती है। उन्हें उसे पति को याद करती है, जो उसे बरसों पहले छोड़कर चला गया इसे अपने बुढ़ापे की फिक्र होती है। उसे अपने बच्चों के भविष्य की भी चिंता है , खाने को यह पढ़ी-लिखी नहीं है पागल है लेकिन सभी कुछ सोचती समझती है। 

तभी भूमि ने उससे पूछा -तुम्हारे यहां तो विवाह हो जाते हैं, कई बार हो जाते हैं जब वह तुम्हें छोड़कर चला गया तो तुम भी किसी और का हाथ पकड़ लेती। 

नहीं कर सकती थी। 

क्यों नहीं कर सकती थी, मेरे अब्बू ने तो बहुत कहा था-मेरे भाई ने भी कहा था, किंतु एमी एमी नहीं मानी , पता नहीं इसकी मम्मी क्यों उसकी दुश्मन बन कर बन गई और इसे इस तरह राह पर भड़काने के लिए छोड़ दिया क्या कारण रहा होगा ? क्या तुम्हारी अम्मी है आज जिंदा है। 

नहीं, मम्मी अब्बू दोनों ही नहीं है। 

इसमें मैं उसके लिए क्या कर सकती थी ? मैं उसके जीवन को बदल तो नहीं सकती थी, ना ही उसकी कल्पना को उसके दर को, ठीक कर सकती थी , अपने को विवश पा , भूमि अपने कपड़े समेटने लगी। अच्छा ! यह बताओ ! तुम्हारे उसे भाई जान वालिद ने कुछ किया तो नहीं था। फिर तो तुम्हारा निकाह अच्छे से हो गया होगा। आज उसका मन दुखी था , शायद उसे अपने घर वालों की याद आ रही थी, शायद उसे अपने पति शहर की याद आ रही थी, जिसे इसकी तनिक भी परवाह नहीं थी। कितने वर्ष हो गए अब तो वह कहीं दूसरी बेगम के साथ घूम रहा होगा। मन में अनेक प्रश्न उठाते उसने से छोड़ ही क्यों था ? और छोड़ भी तो लोग बच्चे हो जाने के पश्चात।।। अगर उसे इसके साथ रहना ही नहीं था तो निकाह ही नहीं करता निकाह हो भी गया फिर बच्चे।।।। उनकी जिम्मेदारी भी नहीं उठानी चाहिए कैसे-कैसे लोग हैं ?

भूमि ने महसूस किया, इसके मन में हमेशा हलचल मची रहती है। चाय दिए इसीलिए पागल सी हो गई है , जिसके मन में अनेक विचार आते हैं लेकिन कोई कहने और सुनने वाला नहीं है कोई से समझना ही नहीं जाता है। हर चीज मुझे भी तो नहीं बता सकती इसीलिए इसे आज अपने पति की याद आई होगी। अचानक उठी, और बोली -अच्छा ,अब मैं चलती हूं। 

जीना की कहानी कुछ इस तरह से थी, एक दिन वह जीना बाहर घूमने के लिए गई थी और किसी ने, उसे चुपचाप , एक गली से खींच लिया। वह ठीक से किसी को देख नहीं पाई, क्योंकि तुरंत ही उसके मुंह पर कुछ ऐसा रख दिया जिससे वह बेहोश हो गई और, जब उसे होश आया तो उसने अपने को एक सुनसान कमरे में,पाया। उसके हाथ बंधे हुए थे, वह सोच रही थी कि मुझे यहां कौन लेकर आया है ? शक करना ज्यादा मुश्किल नहीं था उसे लगाओ उसके चाचा जानू का बेटा ! वालिद ने ही उसे यहां कैद किया होगा। 

इधर ज़ीनत गायब हुई,उधर गली और मोहल्ले में उसकी ढुंढेर मचने लगी  


एक दिन 'ज़ीनत' के अब्बू का इंतकाल हो गया। कारोबार अब बच्चों ने संभाला उन्होंने तो कभी बताया भी नहीं कितना कर्जा छोड़ कर गए हैं ? यह सब क्या हो रहा है ? बच्चे कारोबार संभालने का प्रयास तो कर रहे हैं किंतु अनुभव भी नहीं है , कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई दुनिया की फरमाबारीसे वाकिफ़ नहीं हैं। चचाजान उन्हें समझा रहे थे ,उन्हें लगता था ,उनके साथ खड़े हैं किन्तु उन्होंने तो सारा कारोबार ही संभाल लिया। कर्ज़ा चुकाने के बहाने सारा कारोबार ही हथिया लिया। धोखा यह तो इंसानी फ़ितरत है। 

इसमें क्या बुरा मानना ?''जिसकी लाठी उसी की भैंस ''यही कायदे चलते आये हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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