निरूपा गुस्से में थी ,कई दिन हो गए ,प्रेमा काम पर नहीं आई। जब देखो छुट्टी करके बैठ जायेगी ,मुझे ही अकेले सारे घर का काम संभालना पड़ रहा है। नहीं आना था तो बता भी सकती थी कि नहीं आयेगी किसी के हाथ खबर भी भेज सकती थी कि किस कारण से वो नहीं आ रही ?या कितने दिनों तक नहीं आएगी। निरूपा ये सब बातें नरेंद्र से कह रही थी। नरेंद्र सुनकर बोले -तुम कोई दूसरी कामवाली क्यों नहीं रख लेतीं ?अब दूसरी कामवाली कहाँ ढूंढू ?पता नहीं केेसा काम करे ?अभी ये बातें चल ही रहीं थीं कि प्रेमा ने घर के अंदर प्रवेश किया। उसे देखकर निरूपा ने चैन की साँस ली और उसके प्रश्न शुरू हो गए -इतने दिन तुम कहाँ थीं ?तुम्हें बताना चाहिए था ,सारा काम फैला पड़ा है। प्रेमा चुपचाप अपने काम में लग गई। नरेंद्र अपने काम पर चले गए। निरुपा ने देखा, कि प्रेमा आज इतनी फुर्ती से काम नहीं कर रही वो थोड़ी सुस्त है। उसने पूछा -प्रेमा क्या बात है ?क्या तुम बीमार थीं या कुछ और बात है ?प्रेमा फ़ीकी सी हँसी हंसकर बोली -कुछ नहीं ,ये तो घर -घर की कहानी है। ओह !हम भी तो सुने ,कैसी कहानी ?वो मेरा मर्द है न , उसने ही घर में कलह मचा रखी है ,कमाता है तो कमाई का रौब ,पीता है ,फिर..... मना करो तो मा र -पीट पर उतर आता है। ज़बरदस्ती करता है ,क्या औरत का जीवन इसीलिए बना है ,क्या उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं ?उसने निरूपा से ही प्रश्न पूछ डाला। निरूपा बोली -जब वो इतनी मार -पीट करता है तो तुम झेलती क्यों हो ,उसे छोड़ क्यों नहीं देती ?आये दिन तुम्हारा ये ही झगड़ा रहता है।
हम औरतों के साथ ये ही तो परेशानी है ,ये जीवनभर का साथ है। उसके बिना तो जिंदगी नज़र भी नहीं आती ,कहाँ जाउंगी? उसके बच्चे लेकर ,मेरे बच्चों का बाप है।छोड़ने के नाम से , एकाएक उसके विचार बदलने लगे। बोली -मैडम !जब वो अच्छे मूड़ में होता है तो उससे बढ़िया कोई नहीं ,हम ही उसका परिवार हैं. बाहर से कहीं दुःखी होकर आएगा या पी आएगा तभी करता है ऐसी हरकतें ,गुस्से में उसे कुछ नहीं दिखता वरना वो किसके लिए कमा रहा है ?अपने परिवार के लिए ही तो ,दो -चार बातें भी सुन ली तो क्या ?फिर तो बात ही ख़त्म हो गयी उसी के साथ रहना है और उसी से ही पिटना भी है निरूपा बोली। चलो तुम काम पूरा करो मैं तुम्हारे लिए चाय बनाकर लाती हूँ, साथ में एक गोली भी ले लेना उससे दर्द भी कम होगा ,कहकर निरुपा रसोईघर की तरफ़ चल दी। लेकिन उसका दिमाग़ में वो बातें एक फ़िल्म की तरह घूम रही थीं जब वो इस घर में ब्याहकर आई थी, नरेंद्र एकदम ग़ैर जिम्मेदार ,लापरवाह व्यक्ति थे ,सोचती हूँ माँ -बाप ने भी क्या सोचकर इनसे मेरा विवाह किया था। इसके लिए कई बार मैंने अपने माँ -बाप को भी कोसा। आज तो ये अपने बच्चों की नजरों में आदर्श पिता हैं लेकिन उन दिनों को याद करती हूँ तो सिहर उठती हूँ।
जब पहली बार नरेंद्र मेरे नज़दीक आये तो उनसे पहले शराब का भभका मेरे नथुनों से टकराया। मैं तो इंतज़ार में बैठी थी कि वो आयेंगे ,मेरी प्रशंसा करेंगे ,कुछ अपनी कहेगें ,कुछ मेरी सुनेंगे। हम देर तक एक -दूसरे को महसूस करेंगे ,एक दूसरे की भावनाओं को समझेंगे। एक -दूसरे की बाहों में देर तक चाँद को देखेंगे लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। नरेंद्र पर तो शराब हावी थी और उन्हें मुझे अपनी मर्दानगी जो दिखानी थी ,शायद दोस्तों ने यही सीखकर भेजा था उन्होंने आव देखा न ताव ,न ही मेरी भावनाओँ की क़द्र की। भावनाओँ को तो जैसे वो जानते ही नहीं ये किस' चिड़िया 'का नाम है ?भावनायें भी कुछ होती हैं ,शायद उन्हें नहीं पता। इस अनसोचे ,अचानक व्यवहार के लिए मैं तैयार ही नहीं थी ,वो मेरे साथ पहली जबरदस्ती थी फिर भी मैंने झेला ,मैं सोच रही थी, कि मैं क्या कहीं भागे जा रही थी ?यहीं तो रहती ,मैं ये सब सोचकर रोने लगी अपनी सुहागरात पर मुझे खुश होना था लेकिन आँसू थम नहीं रहे थे। मेरी भावनायें जो कुचली जा चुकी थीं। मैं सोते हुए उस इंसान को देख रही थी और अपने -आप से ही प्रश्न कर रही थी कि इस इंसान से मेरा विवाह हुआ है ?
अगले दिन मैंने सोचा ,शायद नरेंद्र को अपनी गलती का एहसास हो और अपने रात के व्यवहार के लिए माफ़ी माँगे लेकिन उसे तो अपना व्यवहार गलत ही नहीं लगा ये तो शायद उसका अधिकार था और मुस्कुराकर बोले -केेसी रही रात ?मजा तो..... आगे के शब्द मैं ने सुने ही नहीं उसके वे शब्द मुझे काँटों की तरह लगे। सोचा, दिन में साथ बैठकर बातचीत करेंगे लेकिन समय ही नहीं मिल पाया। उस रात भी मैं ऐसे ही झेलती रही , नरेंद्र ने कहा भी -तुम इस सब में रूचि नहीं ले रही हो ,मैंने कहा -नहीं ऐसी कोई बात नहीं, मैं साथ देना चाहकर भी साथ नहीं दे पा रही थी. मेरे मन में बार -बार ये ही प्रश्न उठ रहे थे कि क्या मेरी भावनाओं की कोई क़द्र नहीं? पता नहीं, ये आदमी क्या साबित करना चाह रहा है ?एक सप्ताह बाद मैंने पूछा -तुम्हारी दृष्टि में पति -पत्नी के रिश्ते का ये ही अर्थ है ,भावनायें ,इच्छाएं कोई मायने नहीं रखतीं। तब नरेंद्र बोले -औरत इसी से वश में रहती है ,हर औरत को इसी तरह खुश किया जा सकता है तभी औरत क़ाबू में रहती है। क़ाबू में क्यों करना है ?क्या ये सब तुम्हारे दोस्तों ने बताया। तब मैंने अंदाजा लगाया कि इस व्यक्ति का माहौल और दोस्तों की सोच बस यहीं तक सीमित है।
नरेंद्र को एक जिम्मेदार इंसान बनाने में ,उसकी सोच बदलने में न जाने कितने वर्ष लग गए ?मैं सम झती हूँ ,ज़बरदस्ती ,बाहर घूम रही औरतों के या लड़कियों के साथ ही नहीं होती ,ज़बरदस्ती घर में रह रही औरतों के साथ भी होती है और उनके साथ किसी की सहानुभूति भी नहीं होती। किसी से कह भी नहीं सकती कि उसका पति उसके साथ कैसा व्यवहार कर रहा है ?घर वालों के व्यवहार से तो लगता है कि उसे यहाँ लाया ही इसीलिए गया है कि जिसके साथ ब्याहकर आई है उसे ख़ुश रखना ,उसकी जरूरतों का ख़्याल रखना ,उसकी अपनी भावनाओं का कोई महत्व नहीं है और ये सब हमारी ही बड़ी -बूढी बताती हैं। और पति अपने दिनभर की कुंठा से मुक्त होने के लिए, उसे पत्नी ही नज़र आती है। नए -नए ज़ेवर ,कपड़े ,मान -सम्मान जीवन भर साथ निभाने वाले सात फेरे -सात वचन सब दिखावा प्रतीत होते हैं लेकिन कुछ दिनों बाद उसे एहसास हो जाता है कि इस सब दिखावे का उसे हर रात चाहे न चाहे मूल्य चुकाना होगा। सारा दिन काम करे शाम को डांट -फटकार इसके लिए ये मुहावरा सही बैठता है-'' चार दिन की चाँदनी फ़िर अँधेरी रात। '
वो अक्सर फिल्मों में देखती थी ,पति -पत्नी हाथों में हाथ डालकर घंटो एक -दूसरे से प्यार भरी बातें करते हैं ,एक -दूसरे की भावनाओं को समझते हैं सुख -दुःख में साथ रहते हैं लेकिन हकीक़त तो इससे कोसों दूर है। दिनभर का थका -हारा पति अपनी इच्छा पूरी करता है और सो जाता है और वो लुटि -पिटी सी उस अर्धनग्न शरीर को देखती है। सोचती है -सुना था ,'विवाह दो शरीरों का ही नहीं ,दो आत्माओं का मिलन होता है लेकिन इस इंसान ने तो मेरे दिल को भी नहीं छुआ ,आत्माओं का मिलन तो बहुत दूर की बात है ,अपनी दिल में ही जगह नहीं बना पाया। सोचते -सोचते इस बीच वो प्रेमा को चाय दे आई लेकिन अपने विचारों में वहीं अटकी रही। वो तो जब एक बार दुर्घटना में नरेंद्र का पैर टूट गया ,तब मैंने घर और बाहर की ज़िम्मेदारी उठाई तब नरेंद्र को समझ आया कि पति -पत्नी के जीवन के और भी पहलू होते हैं एक -दूसरे के सुख -दुःख में साथ खड़े रहना ,एक -दूसरे की भावनाओं की कदर करना तभी से उसके जीवन में बदलाव शुरू हो गए। मुस्कुराते हुए -अपने -आप से बोली ,मैंने भी तो नरेंद्र का साथ नहीं छोड़ा ,चली थी प्रेमा को सलाह देने। तभी प्रेमा की आवाज़ आई -मैडम काम पूरा हो गया। ठीक है, निरूपा ने वहीं से कहा।