मम्मा मैं ऐसे ही किसी से विवाह नहीं कर सकती ,न ही हम किसी को जानते पहचानते और माँ -बाप ने रिश्ता तय कर दिया। पता नहीं केेसा स्वभाव है उसका ?मैं पढ़ी -लिखी लड़की हूँ । ऐसे ही नहीं कि किसी भी खुंटे से बांध दो और मैं सीधी -साधी गाय की तरह बंधी चली जाउंगी। पुराने जमाने की बात न करें ये आज का ज़माना है। लड़के से मिलकर ,उससे बातें करके मैं तय करुँगी कि मुझे इससे विवाह करना है कि नहीं। मेघा ने जैसे अपना फैसला सुनाया हो। हालांकि उसकी मम्मी उसकी इस सोच से सहमत नहीं थीं ,पहले तो चुप रहीं ,फिर बोलीं -'दो राही' जो अपनी -अपनी मंजिल ढूढ़ते हैं और जब उनका विवाह हो जाता है ,विवाह के बाद राही तो दो ही होते हैं किन्तु उनकी राह एक होती है। जिससे वो' हमसफ़र' कहलाते हैं। वे जो दो शख़्सियत होती हैं उनकी सोच में भी अंतर होता है ,शायद मंजिल भी अलग हो सकती है। किन्तु चलते फिर भी एक ही राह पर एक -दूसरे को संभालते, जिंदगी को सुलझाते जीवन की उस पगडंडी पर चलते रहते हैं ,विपरीत सोच के साथ भी चलते हैं।
हम सोचते हैं कि हमारा हमसफ़र हमारी सोच से मिलता -जुलता या हमारे जैसा होना चाहिए ,लेकिन ऐसा नहीं होता ,यदि ऐसा हुआ तो समानता टकराव का कारण भी बन है या फिर सहयोग का भी। जो चीजें तुम पर या तुम्हें अच्छी लगती हैं जरूरी नहीं कि दूसरे पर भी अच्छी लगें। कभी -कभी हम अपनी ही दुनिया में खोये रहते हैं लेकिन दूसरा व्यक्ति जो हमारे स्वभाव के विपरीत है ,अनायास ही हमें अच्छा लगने लगता है। हमारा स्वभाव शांत ,गंभीर है और हमारी जिंदगी में कोई हँसमुख ,चुलबुला ,प्रसन्नचित्त इंसान ,हमसे बिल्कुल विपरीत स्वभाव का है वो हमारी जिंदगी में हवा के झोंके की तरह , बारिश ठंडी फुहारों की तरह जीवन में प्रवेश कर जाता है। यदि दोनों ही शांत गंभीर हों तो जिंदगी खिचड़ती बैलगाड़ी सी हो जाएगी। कभी तुमने कहा ,उसने सुना। कभी उसने कहा ,तुमने सुना ,ये जीवनभर चलता है वरना जिंदगी बोझ बनकर रह जाएगी।
आपस में भावनायें भी प्रकट होते रहनी चाहिए ,सारे जज़्बात अंदर ही दबाये रखो उन्हें बाहर ही न आने दिया जाये ,तो क्या पता चलेगा, कि दूसरे की सोच क्या है ?क्या चाहता है ?इन रिश्तों को समझने के लिए पूरी जिंदगी भी कम पड़ जाती है। मेघा बोली -फिर दो -चार घंटों में हम किसी व्यक्ति को कैसे परख सकते हैं ?हम उससे मिलकर उसके शौक पूछ सकते हैं ,थोड़ा बहुत उसकी जिंदगी से संबंधित बातें पूछ सकते हैं, उसके रिश्तों के बारे में भी। इतनी मुलाकात में वो कितना सही बता रहा है कितना ग़लत ,ये फैसला भी तो हम नहीं कर सकते ,मात्र इतनी मुलाकात से हम जीवनभर का फैसला तो नहीं ले सकते मम्मा। अभी मैंने तुम्हें समझाया न, कि रिश्तों को समझने के लिए पूरी जिंदगी भी कम पड़ जाती है रमा बोली।क्या तुम समझती हो, किसी के साथ एक -दो महीना साथ रहकर भी हम अंदाजा नहीं लगा सकते कि किन परिस्थतियों में वो व्यक्ति कैसी प्रतिक्रिया करता है? जिस तरह परिस्थितियाँ बदलतीं रहतीं हैं ,उसी तरह मनुष्य का स्वभाव भी परिवर्तित होता रहता है। आज उसकी जो सोच है, परिस्थिति वश बदल भी सकती है। समयानुसार स्वभाव में परिवर्तन लाना भी पड़ता है ,नहीं लाओगे तो जिंदगी जीना मुश्किल हो जायेगा।
नहीं ,मुझे तो अपने पिता जेेसा ही पति चाहिए ,मेरे पापा में क्या कमी है ?हेल्पफुल है ,शांत साथ -साथ हँसमुख और कमाऊ भी मेघा बोली। रमा बोली- क्या तुम्हारे पापा हमेशा से ही ऐसे थे ?वो भी धीरे -धीरे बदले हैं, जो आज तुम्हारे लिए आदर्श बन गए। इसीलिए बता रही हूँ एक -दो मुलाकात से उस व्यक्ति के शोेक या रहन -सहन का तरीका जान सकते हो लेकिन पूरी जिंदगी वो ऐसा ही हो ऐसा जरूरी नहीं , या बाद में उसके बारे में नई बातें पता चल सकतीं हैं। जिस चीज को वो आज पसंद नहीं करता कल उससे प्यार या लगाव हो सकता है इसीलिए तो कहती हूँ ,ये जो आजकल 'लिव इन' चल रहा है ये सही है। पास रहकर साथ रहकर इंसान को परख़ सकते हैं। मेघा बोली। कितने दिनों तक परखेंगे इसकी कोई सीमा है कि नहीं ?हर रिश्ते की भी एक सीमा होती है ,कल को पसंद नहीं किया एक -दूसरे को तो जीवन के जो अमूल्य क्षण जो तुमने परखने में गवां दिए वो तो वापिस नहीं आयेंगे, परिणाम कुछ नहीं, क्या फिर दूसरे रिश्ते के लिए भी आप तैयार रह पायेंगे ?जिस उम्र में तुम्हें घोंसला बनाना चाहिए ,उसमें तुम घोंसला बना- बनाकर देख रहे हो कि कब सही बनेगा ?जब मन में प्यार ,अपनापन ,सुरक्षा की भावना ,जिम्मेदारी की भावना, ये सब आ जाती हैं तो घोंसला बनाकर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती ,अपने -आप बनता चला जाता है।
उसको बनाते -बनाते कब उसके अंडों से बच्चे निकलते हैं और कब उड़ने लगते हैं ?पता ही नहीं चलता। इस घोंसले की या किसी भी घर की बुनियाद होती है विश्वास और प्रेम ,ये न हो तो कितना भी बड़ा महल बना लो तो टूटेगा ही, कहकर वो अपने काम में लग गयी।
Hahahahah😅😅😅
ReplyDeleteक्या ये सच में सही है???