kya chahta hai ?

 किसी ने'' ईश्वर'' कहा ,किसी ने'' ख़ुदा'' ,किसी ने बोला '' वाहे  गुरु'' तो किसी ने'' ईशु ''कहा लेकिन संतों ने कहा -''परमात्मा एक है। ''परमात्मा ने कहा -मैं हर इंसान में हूँ ,मैं हर जगह हूँ लेकिन फिर भी इंसान भ्रमवश मानता  ही नहीं। परमेश्वर ने कहा -जब मैंने इंसान बनाया तो मैंने कोई भेदभाव नहीं रखा, सब एक जैसे ही बनाये, जगह के आधार पर कुछ काले  कुछ गोरे  ,किन्तु दिल सबका एक ही जैसा ही  बनाया लेकिन इंसान ने अपने को ही टुकड़ों में बाँट दिया। अपना अंग -भंग करवाया ,दूसरों से अलग दिखने के लिए ,क्या  मैंने तुम्हें ऐसा बनाया ?अल्लाह कहो  या भगवान तुम मेरा ही अंश  हो। क्या यही काफी नहीं था ?तुम्हारे लिए धर्म ही सर्वोपरि हो गया ,मुझसे भी ऊपर। अपनी जिंदगी को स्वयं ही परेशानियों में  डाल दिया  ,अपनी राह स्वयं ही कठिन बना ली। मैंने जीवन दिया उसके साथ सुंदर दिल भी तो दिया ,अच्छी भावनायें दीं, प्यार से रहने के लिए लेकिन इंसान को इतना सादगी भरा जीवन पसन्द नहीं  आया। उसे जिंदगी में चाहिए ,रोमांच ,छल -कपट ,मार काट। अपने को धर्मों में बाँट लिया ,सरहदों में बाँट लिया। मैंने जीवन दिया खुलकर जीने के लिए लेकिन इंसान अपने -आप ही अपने बनाये नियमों में अपने -आप को बांधता चला गया। जिसके फ़लस्वरूप वो परेशान रहने लगा ,परेशानी के कारण वो प्रकृति से भी दूर होता चला गया ,जिस कारण वो बिमार भी रहने लगा। अब वो रोता  है ,परेशान  होता है। आलस और
आवश्यकताओं का गुलाम इंसान मुझे मंदिर में ढूढ़ता है ,मस्ज़िद में अज़ान लगाता है। गुरुद्वारों में अरदास करता है। चर्च में मोमबत्ती जलाता है। मुझे पाने के लिए परेशान है किन्तु अब भी मुझे पाने की उतकंठा नहीं वरन अपनी इच्छाओं को अपनी परेशानियों को मुझसे बाँटना चाहता है।अपने अंदर के अंर्तद्वंद  को शांत करना चाहता है। पर वो रास्ता नहीं छोड़ना नहीं चाहता जिस कारण से वो परेशान है। वो मुझसे दूर है ,इसी कारण मैं उन्हें दिखता नहीं ,महसूस होता हूँ कि मुझे सच्चे मन से याद तो कर मैं तेरे साथ हूँ। तब वो पागल इंसान स्वयं ही नहीं समझ पाता कि वो क्या है ?क्या चाहता है ?कहते हैं -मोह ,माया का पर्दा उसकी नजरों के सामने है लेकिन मुझसे मिलने के लिए वो पर्दा तो उसे स्वयं ही हटाना है ,तभी तो उस परमात्मा की प्राप्ति होगी। उसके लिए अपने अन्तर्मन को टटोलना पड़ता है और अंतर्मन कोई देखना ही नहीं चाहता जो भी अपना अन्तर्मन का विकृत रूप देखेगा स्वयं ही डर जायेगा। न जाने कितने -छल- कपट ,बेईमानी, धार्मिक आडंबर भरे पड़े हैं ,उनसे कैसे बाहर निकले ?
                     फंसा तो वो खुद ही है ,फिर चाहता है कि परमात्मा उसकी मदद करे ,वो तो बीच -बीच में चेता ता रहता है लेकिन इंसान समझना ही नहीं चाहता। सोचता है ,मन्दिर ,मस्ज़िद ,गुरुद्वारे में इसका हल मिलेगा लेकिन मूर्ख मानव ये नहीं सोचता इसका हल उसके अपने पास है , अपने मन में है फिर भगवान को दोष  देता है। हे भगवान !तूने मेरे साथ क्या किया ?उधर भगवान भी सोचता होगा -रे मूर्ख मानव !तू क्या कर रहा है ?बाद में मुझे दोष देगा ,तू क्या चाहता है ?सुधरना या मुझे दोष देना। वो स्वयं ही नहीं जा नता कि वो क्या चाहता है ?  
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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