विवाह की तैयारियाँ जोरों से चल रहीं थीं ,काफी रोेनक थी। हमारी संस्था के अध्यक्ष की बेटी की शादी जो है ,सभी लोग आये हैं। संस्था के अन्य सदस्य भी आये हैं , किसी मदद की आवश्यकता हो तो ,हर कोई अध्यक्ष महोदय की नजर में आना चाहता है। तभी वहाँ बैठी एक महिला[विभा जी ] अपने साथ बैठी महिला से बोली -रमाकांत जी तो कई सालों से लड़का ढूंढ़ रहे थे ,तब जाकर ये लड़का मिला। हाँ जी, हमने भी कई लड़के बताये लेकिन किसी से बात नहीं बन पाई। सुना है ,ये लड़का अच्छा कमाता है ,और इन लोगों की कोई मांग भी नहीं है वो महिला बोली। अरे , माँग क्या करेंगे ?रमाकांत जी तो दहेज़ विरोधी हैं ,हमारी संस्था का यही उद्देश्य है। न जाने कितनी पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलवाया है। तभी विभा जी बोलीं -आइये ,अंदर चलते हैं ,वहाँ हल्दी की रस्म हो रही है। वे लोग अंदर जा ही रहीं थीं कि एक महिला बड़ी तेजी से उनके बराबर से निकल गई। दोनों ने एक -दूसरे को देखा। अंदर जाकर पता चला कि लड़की की गांव में रहने वाली रिश्ते की चाचीजी हैं। उन्होंने तो बहुत सारे गाने गाये ,नाची भी। उनके आने से लगा कि विवाह वाला घर है उनके आने से खूब रौनक जो हो गयी थी।
जब सब लोग चले गए ,शाम के समय जब सब घर के लोग चाय पी रहे थे ,चाचीजी ने पूछा -ससुराल कैसी है ?कैसे लोग हैं ?कुछ मांग -वांग तो नहीं की। गीता बोली -नहीं कोई मांग नहीं है ,तुम्हारे जेठजी तो दहेज़ विरोधी हैं।'' दुल्हन ही दहेज़ है। ''इसी तरह के न जाने कितने नारे लगाए हैं, जिससे लोग जागरूक हों ,दहेज़ का विरोध करें, इन्होंने तो न जाने कितनी पीड़िताओं को न्याय दिलवाया है। दहेज़ का तो प्रश्न ही नहीं उठता गीता ने अपने पति की उपलब्धियों से गर्वित होते हुए कहा। दहेज़ देना और दहेज़ लेना दोनों ही ग़लत हैं, चाचीजी कुछ सोचते हुए बोलीं पता नहीं माता -पिता कैसे -कैसे इंतजाम करते हैं ?फिर एकाएक चाचीजी बोलीं -अच्छा ,वैसे तुम लोग अपनी बेटी को क्या दे रहे हो ?उनके इस प्रश्न से अचकचाकर गीता बोली -अभी तो आपको बताया कि उनकी कोई मांग नहीं है। नहीं ,मैं उनकी बात नहीं कर रही ,मैं आपकी बात कर रही हूँ चाचीजी ने समझाते हुए कहा। आप अपनी बेटी को अपनी तरफ से क्या दे रहे हैं ?भई !हम क्या देंगे ?उसकी शादी करा रहे हैं और वो अच्छे घर चली जाये ,हमें और क्या चाहिए ?हम तो उसी की ख़ुशी में ही ख़ुश हैं गीता ने संतुष्ट भाव से कहा।
चाचीजी बोलीं -आपकी क्या लगती है ?कमाल करती हैं ,आप भी ,बेटी है, हमारी उनके प्रश्न से विचलित होते हुए गीता बोली। जब लड़की हो या लड़का उसके विवाह में जो भी लोग आते हैं तो उपहार लाते हैं तो फिर ये तो आपकी बेटी है इसे ऐसे ही खाली हाथ भेज दोगे। क्या माता -पिता अपनी तरफ से कुछ उपहार नहीं देते ?क्या बेतुकी बातें हैं गीता कुछ झल्लाती सी बोली। तब तक वहाँ रमाकांत जी भी आ जाते हैं, बोले -क्या बातें हो रहीं हैं दोनों में गीता कुछ कहती उससे पहले ही चाचीजी बोल उठीं -भाईसाहब !
ये बताइये ,ये धन -दौलत ,घर ,जमीन -जायदाद सब किसके हैं ?वे बोले हमारे और किसके ?चाचीजी बोलीं -उसके बाद। हमारे बेटों की, उन्होंने जबाब दिया। लगभग एक करोड़ की सम्पत्ति तो होगी, चाचीजी ने अंदाजा लगाकर पूछा। नहीं जी ,तीन -चार करोड़ से कम नहीं उन्होंने इस तरह से कहा , जैसे उन्हें इस बात का गुमान हो। इसमें बेटी का हिस्सा कितना होगा? चाचीजी ने फिर से प्रश्न दाग दिया। रमाकांत जी बोले -अरे !तुम भी कमाल करती हो वो तो अपने घर -बार की होगी , हमारे यहाँ बेटियों का हिस्सा नहीं होता उनका हिस्सा , अधिकार अपनी ससुराल में होता है।
चाचीजी पता नहीं आज क्या ठानकर आई हैं? फिर से बोलीं हमारी कोमल बिटिया तो कई सालों से कमा रही है ,लगभग छह -सात साल से उन्होंने अपने अंदाज़े की पुष्टि करनी चाही ,कम से कम उसने बीस या पच्चीस लाख रुपया कमा ही लिया होगा फिर भी उसे खाली हाथ भेज रहे हैं। अब तक जो गीता उनकी बातें सुन रही थी ,बोली -शादी में भी ख़र्च कर रहे हैं और लड़केवालों को भी तो कमाऊ लड़की दे रहे हैं ,उन्हें जिंदगी कमाकर खिलाएगी ,ये क्या कम है ?मुँह बनाकर कहा। चाचीजी के तेवर थोड़े तीखे हो गए बोलीं -क्यों बेटी पर एहसान कर रहे हो ?जब तक यहाँ रही तो क्या यहाँ नहीं कमाया ?और उसे क्या दे रहे हो ?देने के नाम पर दहेज़ का नाम ले दिया। सम्पत्ति पर यदि बेटों का अधिकार है तो बेटी का क्या ?कल उन लोगों ने साथ नहीं दिया तो कह देना ,अब तुम पराये घर की हो गयी हो। तभी पीछे खड़ी एक महिला रिश्तेदार जो उनकी बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी बोली -अब तो कानून भी बन गया है कि बेटियों का भी सम्पत्ति में अधिकार होता है ,न मिलने पर कानून का दरवाजा खटखटा सकती हैं।
कहाँ मिल पाता है ,वो अधिकार ?कुछ तो अपने अधिकार के बारे में जानती ही नहीं ,कुछ अधिकार की माँग करती ही नहीं। लेकिन जो करतीं हैं, उन्हें अपने अधिकार के लिए अपनों से ही लड़ना पड़ता है। जब माता -पिता की ही ऐसी सोच होगी [रमाकांत जी की तरफ इशारा करते हुए ]तो क्या भाई आसानी से सम्पत्ति में हिस्सा दे देंगे? और दुश्मन की तरह देखेंगे। उस अधिकार के चक्कर में रिश्तों से भी हाथ धो बैठती हैं । अब आप लोग अपने को ही देख लो ,जितना इसकी शादी में लगा रहे हो ,इससे ज्यादा तो वो कमा चुकी है ,फिर कुछ न देने का बहाना बनाया कि हम दहेज़ के ख़िलाफ़ हैं। चाचीजी ने फिर प्रश्न दागा-बड़े लड़के के विवाह में कैसे दहेज़ ले लिया ?उनकी देर तक बातें होती देख, धीरे -धीरे और लोग भी उनकी तरफ आ रहे थे। उन्हें देखकर रमाकांत जी ने सफाई दी- उन्होंने अपनी मर्ज़ी से दिया हमने माँगा नहीं। तो क्या ,आपकी उतनी भी मर्ज़ी नहीं? चाचीजी ने पूछा।सब लोगों को अपनी तरफ देखकर गीता जी को बड़ी बेइज्जती महसूस हुई बोलीं -तुम क्या ,हमारे विवाह में विघ्न डालने आई हो ?हमने गलती की ,तुम्हें बुलाकर।
चाचीजी बोलीं -भाभी सोचो !तुम भी एक औरत हो ,मैं भी। बेटी आपकी है लेकिन जो मेरे साथ हुआ उसके साथ न हो, इसी कारण से मैं ये सब पूछ रही थी। एक समय ऐसा था कि मैं सड़क पर आ गयी थी किसी ने मेरी मदद नहीं की ,मेरे अपने घरवालों ने भी हाथ खींच लिया। माता -पिता ने दहेज़ न देने कारण , लालच में मेरा विवाह बड़ी उम्र के व्यक्ति से करा दिया। सब एक साथ रहते थे तब तो कुछ पता नहीं चला ,बाद में जब बटवारा हुआ तो सम्पत्ति के नाम पर छोटी सी जमीन मिली , उसे बेचकर किश्तों पर मकान लिया। मैंने अपने घर भी कमाया ससुराल में भी ,जिससे मकान की किश्तें चुकाई। जब भाइयों से मदद माँगी तो इंकार कर दिया फिर मैंने अपने अधिकार की बात की तो उनकी दुश्मन हो गयी। अब मैंने वही सच्चाई आपसे कही तो आपकी दुश्मन हो गयी। ऐसा नहीं कि मेरे भाई ग़रीब हैं बड़े व्यापारी हैं ,देश -विदेशों में घूमते हैं जितने में मेरी मदद हो जाती उतने तो उनके नौकरों की पगार होती है लेकिन वही पैसा मेरे लिए बहुत कुछ था। औरत की जिंदगी का एक सच्चा पहलू ये भी है ,जो महिलाएं अपने घर में खुश हैं वे तो अपने अधिकार के लिए सोचती भी होंगी या नहीं लेकिन मेरे जैसी महिला का क्या ?इस सच्चाई को आप समझो या नहीं,वो तो न इधर की रही न उधर की।