रोज थोड़ा सा टूटती हूं, फिर जुड़ भी जाती हूं।
अपनेआप ही बिखर कर,अपने को संवारती हूं।
वक़्त के थपेड़ो से नहीं ,रिश्तों से मात खाती हूँ।
दुर्बल नहीं ,'मैं ' ज़िंदगी को सोच मुस्कुराती हूँ।
तन्हाइयों में बैठ, उस टूटन और चुभन को जोड़ती हूँ।
भीतर ही भीतर कुम्भलाई सी,खिलकर बाहर आती हूँ।
एहसास होने नहीं दिया कभी उसको,अपने जख़्मों का ,
ग़म के छालों को , मुस्कुराहटों में दफ़्न कर आती हूँ।
तुझसे लगाई थीं ,उम्मीदें ! तू कभी तो मेरे साथ होगा।
महफ़िल में उसके साथ होकर भी ,तन्हा रह जाती हूँ।
दर्द ही वो देता गया , मरहम लगाने कभी सोचा नहीं,
ग़ैर तो क्या ?तेरे दिए जख़्मों पर अश्रु पीकर रह जाती हूँ।
रिश्तों की कड़वाहट का एहसास दिलाने में,तूने भी साथ दिया।
तेरी ज़हर बुझी 'मुस्कुराहटों 'को समझ न सकी ,
तेरी विषैली मुस्कान का जबाब,मेरी मासूम मुस्कान से दिया।
तेरे ज़हर ने कहीं , तुझे ही तो कोई जख़्म नहीं दिया।
यही सोच, तुझ पर तरस आता,ऐसे ही तेरी परवाह करती हूँ।
मुझे नीचा गिराने में , तू भी तो उतना ही गिरा है।
तेरी चाहतों का आइना,मैं तुझे रोज दिखलाने चली आती हूँ।
टूटती हूँ ,मैं भी ,बिखरती हूँ ,संवरती हूँ ,फिर भी मुस्कुराती हूँ।
ज़िंदगी को तक़दीर समझ, तेरी बेरुख़ी पर ख़ामोश रह जाती हूँ।
