कभी हर आंगन में, बालकों गूंज होती थी।
कभी नन्हें ,मुन्नों की किलकारियां गूंजती थीं।
कभी सड़कों पर ,भोर होते ही भीड़ होती थी।
स्कूल बस, रिक्शे के पीछे भाग -दौड़ होती थी।
दफ्तर की भागमभाग में पीछे से पुकार होती थी।
शाम को जल्दी आना !प्रिया की मनुहार होती थी।
शाम को, बच्चों की, खेलकूद की पुकार होती थी।
छुपी -छुपाई ,क्रिकेट, देख मन उत्साहित होते थे।
आज वही गलियां,मौहल्ले सुनसान नजर आते हैं।
वीरान होते घर, इंसानों को तरसते नजर आते हैं।
न जाने, कितने रिश्ते ? अपनों से दूर हो गए।
वक़्त संग ,पहचाने से चेहरे , अनजाने हो गए।
करने को जैसे कुछ नहीं रहा, मकान बिक गए।
बच्चे रोजी-रोटी की तलाश में बाहर निकल गए।
बेटियों ने, अपनी ससुराल में चहल-पहल मचाई है।
खिड़की,बग़ीचों में खनकती थी,कभी उनकी हंसी,
वक़्त ने धूल जमाई है,रह गयी उन लम्हों की परछाई है।
जिस आंगन में कभी तुलसी के नीचे दिया जलता था।
पानी देने वाला कोई नहीं ,आज वहां तुलसी मुरझाई है।
कुछ दूर जाकर बस गए, कुछ अकेले रह गए।
उम्र भी साथ छोड़ती जा रही,अकेले रहने को मजबूर हो गए।
ये गलियां क्या सुनसान हुई ?अपने ही, अपनों से दूर हो गए।
किसी की मजबूरी रही, किसी का रोजगार रहा।
सुनसान सी , गलियों में अपनों का इंतज़ार रहा।
फोन पर हो जाती हैं , कुछ बातें ,चंद मुलाक़ातें।
सुनसान सी ये गलियां-मौहल्ले, लौटा दो,रौनक! पुकारते।
खो गया, इंसान वक़्त के फेर में, लौट नहीं रही ,
गली -मोहल्लों की रौनक, ज़िंदगी के फ़रेब में।
