एक रात्रि, विवाह की तैयारी के मध्य नंदिनी का, दीपक को फोन आया और नंदिनी ने, दीपक से बताया - मैंने उसे देखा है।
तुमने, किसे देखा है ? कुछ भी ना समझते हुए दीपक ने पूछा।
मैंने, प्रतीक को देखा है।
तुम यह क्या बात कर रही हो ? 'प्रतीक' कैसे हो सकता है ? वो तो मर चुका है।
हाँ ,ये मैं जानती हूँ किन्तु कुछ दिनों से मुझे लगता है ,जैसे कोई मुझे देख रहा है।
ऐसा कैसे हो सकता है ?अवश्य ही ,तुम्हारा भ्रम रहा होगा, जब कोई तुम्हारे ख़्यालों में हावी रहता है ,तब ऐसा ही कुछ होता है। क्या तुम उसके विषय में ज़्यादा सोच रही हो।
नहीं ,उसकी यादें अब सिमट ही रहीं थीं ,मैंने अपने मन को भी समझा लिया था कि प्रतीक अब कभी वापस नहीं आएगा, लेकिन अब कुछ दिनों से मुझे प्रतीक दिखलाई दे रहा है।
क्या उसे किसी और ने भी देखा है ,या तुम्हें ही दिखलाई दे रहा है।
मुझे क्या मालूम किसी और को दिख रहा है या नहीं ,मैं सिर्फ इतना जानती हूँ - वो है ,मेरे आस -पास है।
फिर तो उसकी आत्मा तुम्हारे पीछे पड़ी है ,कहते हुए दीपक हंसने लगा।
हंसो मत ! मुझे ड़र लग रहा है।
प्रतीक से या उसके भूत से...
उसका कोई भूत नहीं है ,समझे तुम.... मुझे लगता है ,कोई मेरे पीछे है शायद वह मुझसे कुछ कहना चाहता है या फिर मुझसे मिलना चाहता है।
ऐसा नहीं हो सकता, मरा हुआ इंसान कभी वापस नहीं आता,एकदम से दीपक के तेवर बदल गए।
पता नहीं क्यों ? मुझे लग रहा है ,वो प्रतीक ही है ,उसका अस्तित्व है, वह यहां है ,मेरे आस-पास है।
यदि वो तुम्हारे सामने आ गया ,तो तुम क्या करोगी ?
कुछ क्षण नंदिनी चुप रही ,फिर बोली - मुझे नहीं पता , कुछ समझ नहीं आ रहा। मैं क्या करूंगी ? कहकर उसने फोन रख दिया।
नंदिनी ने तो फोन रख दिया किन्तु दीपक को नींद नहीं आई और वो अपनी मोटरसाइकिल उठाकर चल दिया। उसकी मोटरसाइकिल किसी सुनसान सड़क पर दौड़ रही थी। लगभग एक घंटा चलने के पश्चात वह एक मकान में पहुंचा। शायद उसकी चाबी उसी के पास थी ,तब उसने, अपने आप दरवाजा खोला और अंदर गया। वहां पहले से ही एक व्यक्ति सो रहा था। दीपक ने जाते ही, उसे हाथ पकड़कर उठा दिया। उठ ! मेरी नींद उड़ाकर तू यहां चैन से सो रहा है।
हड़बड़ाकर वो उठा और उसने पूछा - मैंने ,क्या किया ?
यही तो बात है , तू कुछ करता नहीं ,बस तुझसे हो जाता है। देख !मैंने पहले ही, तुझसे स्पष्ट कह दिया था -''अब नंदिनी पर तेरा कोई अधिकार नहीं रहेगा ,जब तुझे सहायता की आवश्यकता थी ,तब मैंने तेरी सहायता की या नहीं।
उसी का दंड तो भुगत रहा हूँ ,मुझे क्या मालूम था ? तेरे जैसे दोस्त से सहायता मांगकर मैं ही फंस जाऊंगा। तूने मेरे साथ छल किया है ,मेरी दोस्ती को 'धोखा 'दिया है।
देख ! तू ,मुझे गुस्सा दिला रहा है , आज तक मैंने कोई ऐसा कार्य नहीं किया ,जिसके लिए मुझे पछताना पड़े ,किन्तु यदि तू अभी भी नहीं समझेगा तो मुझे, तुझे अच्छे से समझाना होगा। नन्दिनी के लिए अब मैं कुछ भी कर सकता हूँ। दुनिया की नजरों में तू पहले ही मर चुका है ,मैंने मार भी दिया तो किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा ,तेरे लिए तो वो पहले से ही अपने आंसू बहा चुके हैं।
हाँ ,इसी बात का तो तू लाभ उठाना चाहता है बल्कि लाभ उठा रहा है किन्तु 'मैं' तुझसे कह रहा हूँ ,'नन्दिनी को जिस दिन तेरी सच्चाई के विषय में पता चलेगा। उस दिन तुझसे विवाह करना तो दूर ,वो तेरे मुँह पर थूकेगी भी नहीं।
वो थूके या न थूके ये मेरी परेशानी है ,तू अपना देख ! तू मेरा कहा मान ! मैंने तेरा बेटा वायदे के अनुसार तेरे घर पहुंचा दिया ,अब तू मेरा कहा मान !अपने बेटे को लेकर यहाँ से बहुत दूर चला जा ! किंतु मेरी जिंदगी को नर्क मत बना।
मैंने क्या किया है, मैंने तो कुछ भी नहीं किया है , अनजान बनते हुए प्रतीक ने, दीपक से कहा।
तू बार -बार उसके सामने क्यों आ जाता है ? क्या तू , उस पर नजर रख रहा है ? उसे इस बात का एहसास हो चुका है कि कोई उसका पीछा कर रहा है जबकि मैंने, तुझसे मना कर दिया था।
क्या उसने ऐसा कहा ?
उसी ने तो बताया ,आज परेशान हो रही थी। डर रही थी।
प्रतीक मुस्कुराया ,वो ड़र नहीं रही थी ,उसे मेरा एहसास बेचैन कर रहा था। आज भी वो मुझसे ही प्यार करती है ,प्रतीक विश्वास से बोला।
दीपक को क्रोध आ गया और बोला -यदि मैं, तुझे इस मकान में ही बंद करके चला जाऊं तब तू क्या करेगा ? तू खाने- पीने को भी तरस जाएगा और यही पड़ा सड़ता रहेगा। किंतु में ऐसा पाप करना नहीं चाहता मैं अच्छा -बुरा समझता हूं इसीलिए पहले ही कह रहा हूं , कि तू यहां से कहीं दूर चला जा ! उसके आसपास नजर मत आना ,धमकी देने के पश्चात उसने अपना लहज़ा बदला और नम्रता से बोला -देख !अभी भी मैं ,तुझे अपना दोस्त मानता हूँ। बस तू उसे भूल जा !
तूने, मुझसे कहा -कि मेरा भाई मुझे मारना चाहता है, मैंने तेरा सहयोग किया। डॉक्टर से मिलकर बात की, और तुझे मृत घोषित करवा दिया। उन्हें दाह संस्कार के लिए, एक अलग शव दिलवा दिया जो सील बंद था। उन्होंने उसको प्रतीक समझ कर, उसका ' दाह संस्कार 'कर दिया। आज तेरा भाई तेरी हत्या के आरोप में सजा काट रहा है।
हाँ, मैं मानता हूं, मैंने ,तुझसे सहायता मांगी थी और तूने मेरी सहायता भी की किंतु साथ ही तू बदल भी गया।
मैं तेरे लिए आज भी, वही दोस्त हूं, किंतु अब मैं नंदिनी को नहीं छोड़ सकता। तुझे यह खबर भी तो मैंने ही दी थी कि तू बाप बनने वाला है। उसके हर दुख में ,मैं उसके साथ खड़ा रहा ,जब उसे तेरी जरूरत थी ,उसके साथ तू नहीं मैं था।
मैंने तुझे, उसकी सुरक्षा और उसकी देखभाल के लिए भेजा था, तूने क्या किया ? तू उसी से दिल लगा बैठा।मैंने, तुझ पर विश्वास किया था किन्तु तूने ही ''मेरी पीठ में छुरा घोंपा। ''
वो तो पहले से ही मेरी थी ,मैं कबसे उसके सपने सजा रहा था ,मैं अक़्सर छुप -छुपकर उसे देखा करता था तू नहीं जानता ,तुम दोनों के बीच में मैं नहीं तू हमारे बीच आया था और 'वो' तुझे चाहने लगी। मेरा ख़ामोश प्रेम ,टुकड़े -टुकड़े हो बिख़र गया, किन्तु तब भी मैंने अपने को समझाने का प्रयास किया। जब तुम दोनो को बग़ीचे में एक साथ देखता था ,मेरे 'तन बदन' में आग भड़कती थी इसीलिए मैंने ,तुझसे सम्पर्क तो रखा ताकि उसकी ख़बर मिलती रहे किन्तु तुम दोनों से दूर हॉस्टल में चला आया। क्या करता ? तुम दोनों को एक साथ देखकर सहन नहीं हो रहा था।
किन्तु अब देख लो !क़िस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मैंने तो अपने को हालातों के हवाले छोड़ दिया था। तेरे लिए, मैंने अपने प्यार को छोड़ा और तू ,मुझे ''धोखेबाज़ ''कहता है। तूने, मेरे त्याग का ये सिला दिया। थू है तुझ पर....
तूने ,मुझे ये सब पहले कभी क्यों नहीं बताया ?
