Kiski dulhan [part 82]

मोहिनी ,रूद्र और भानु अपनी जाँच को आगे बढ़ाते हुए ,आगे बढ़ ही रहे थे। तब उन्हें एक विद्यालय के दस्तावेज़ मिलते हैं। जहाँ  उन्हें 'राघव मेहरा' नाम दिखलाई देता है। तब भानु ने पूछा - क्या ये वही नाम है ?जो' पहचान पट्टी' से हटाया गया है।

 रूद्र  ने सिर हिलाकर कहा - हाँ ,शायद ! लेकिन इस नाम के सामने जन्मतिथि दर्ज नहीं है। केवल इतना लिखा है कि बच्चे को एक अभिभावक ने व्यक्तिगत रूप से दाखिल कराया था। अभिभावक का नाम भी गोपनीय रखा गया था।”


तब विक्रम ने पूछा -'' दाखिले की तारीख कौन सी है ?”रूद्र ने दस्तावेज़ नीचे खिसकाया।“24 अगस्त 2001 

मोहिनी  चौंकी ,लेकिन स्कूल तो 2002 में खुला था?”

“यह स्कूल 2002 में बंद नहीं हुआ था ,2002 में इसका प्रबंधन बदला गया था। पुराने रिकॉर्ड में 24 अगस्त 2001 की तारीख है।”

भानु ने पूछा, “क्या अभिभावक का कोई हस्ताक्षर है ?”

रूद्र ने स्क्रीन पर हस्ताक्षर बड़ा किया ,वहाँ केवल दो अक्षर दिखाई दे रहे थे—R.P.

मोहिनी के चेहरे पर तनाव उभर आया यानि “रत्न प्रताप !”

विक्रम ने तुरंत कहा, “यह वही अक्षर हो सकते हैं, लेकिन हमें हस्ताक्षर की तुलना करनी होगी, केवल R.P. देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि ये रत्नप्रताप ही हो सकता है। 

मोहिनी ने दस्तावेज़ को ध्यान से देखा।

“अगर रत्न प्रताप ने, उस बच्चे को स्कूल में दाखिल कराया था, तो वह उसे अपने पास रखे हुए थे? फिर उन्होंने, उसे हमसे क्यों छिपाया ?”

रूद्र ने कहा, “हो सकता है, उन्होंने उसे बचाने के लिए नया नाम दिया हो।”

भानु ने तुरंत विरोध किया ,या ये भी हो सकता है उन्होंने उसकी पहचान बदलकर उसे अपने नियंत्रण में रखा हो। हमें अभी बिना किसी के प्रमाण के ,किसी को निर्दोष या दोषी नहीं मान लेना चाहिए।”

मोहिनी ने स्कूल के रजिस्टर की तस्वीर अपने फोन में सुरक्षित कर ली और बोली -हमें उस ट्रस्ट से मिलना ही होगा। मैं जानना चाहती हूँ कि 'राघव मेहरा 'कौन था ,उसका असली नाम क्या था और उसे स्कूल से किसने बाहर निकाला ?”

तभी विक्रम के फोन पर एक संदेश आया।उसने वो संदेश पढ़ते ही फोन नीचे रख दिया।

“क्या हुआ?” रूद्र ने पूछा।

विक्रम ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—“स्कूल के पुराने रिकॉर्ड संभालने वाले व्यक्ति ने बताया है कि 'राघव मेहरा' का दाखिला तो हुआ था, लेकिन वह वहाँ केवल ग्यारह दिन रहा।”

“ग्यारह दिन !''आश्चर्य से मोहिनी ने पूछा।

“हाँ ,बारहवें दिन उसे कोई लेने आया था। उसके बाद उसका नाम कभी उस स्कूल के रिकॉर्ड में नहीं आया।”

भानु ने पूछा -उसे कौन लेने आया था?”

विक्रम ने स्क्रीन पर मिली जानकारी पढ़ी -“एक महिला !”

मोहिनी ने तुरंत पूछा - “उसका नाम क्या था ?”

विक्रम ने फोन को थोड़ा पास लाकर देखा ,यहाँ नाम के आगे लिखा है—मृणाल !”

मोहिनी के चेहरे पर अविश्वास फैल गया ,“माँ ! ऐसा कैसे हो सकता है ?”

रूद्र ने कहा, “इसका मतलब मृणाल ने ही उसे स्कूल से भी निकाला था।”

“लेकिन मृणाल की रिकॉर्डिंग में कहा गया था, कि उसे नहीं पता कि तीसरे बच्चे को किसने नया नाम दिया ?” भानु ने उन शब्दों को याद दिलाते हुए कहा।

मोहिनी ने सिर हिलाया ,“हो सकता है उसने, उसे किसी के कहने पर स्कूल से निकाला हो, लेकिन यह जरूरी भी तो नहीं कि उसे लेजाकर अपने पास ही रखा हो। उसके बाद उस बच्चे को कहाँ ले जाया गया ?उसे मालूम ही न हो ?”

विक्रम ने धीरे से कहा, “या फिर रिकॉर्डिंग में उसने पूरी बात ही नहीं बताई ,ये भी तो हो सकता है। 

मोहिनी ने तुरंत उसकी ओर देखा और बोली -मैं अपनी माँ पर, बिना प्रमाण के शक नहीं करूँगी, लेकिन अब मुझे उनसे मिलना होगा।”

उसी समय हवेली के बाहर गाड़ी रुकने की आवाज़ आई।मुख्य दरवाज़ा खुला और एक नौकर तेजी से भीतर आया।“विक्रम साहब ! रत्न प्रताप जी वापस आ गए हैं।”सभी एक-दूसरे की ओर देखने लगे।मोहिनी सबसे पहले बाहर पहुँची। रत्न प्रताप सीढ़ियों के पास खड़े थे, उनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और चेहरे पर थकान थी, उनके दाहिने हाथ पर हल्की चोट भी दिखाई दे रही थी।

भानु ने आगे बढ़कर पूछा—“आप कहाँ गए थे?”

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा ,“जहाँ मुझे जाना ज़रूरी था।”

“किससे मिलने गए थे ?”

“राजवीर से !”

मोहिनी एक कदम आगे बढ़ी और पूछा -क्या वो जीवित है?”

रत्न प्रताप  ने कुछ क्षण उसे देखा ,“हाँ,”उनके इतना कहते ही वहां सन्नाटा छा गया।

भानु ने पूछा, “तो आपने इतने सालों तक उसे मृत क्यों बताया गया था ?”

रत्न प्रताप  उत्तर देने से पहले, अपने हाथ की चोट पर कपड़ा बाँधते हुए बोले ,क्योंकि अगर दुनिया को पता चल जाता कि राजवीर जीवित है, तो तीसरे बच्चे की जान खतरे में पड़ जाती।”

विस्मित हो ,मोहिनी की आँखें फैल गईं ,वो तीसरा बच्चा कहाँ है?”

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा और पूछा -“तुम्हें यह जानने की इतनी जल्दी क्यों है? हाल ही में आया हूँ ,चोट लगी है किन्तु सबको अपने प्रश्नों के जबाब चाहिए।  तुमने अभी तक यह भी नहीं जानना चाहा, कि उस बच्चे की पहचान बदलने का फैसला किसने लिया था ?”

मोहिनी का स्वर कठोर हो गया ,मैंने समझने की कोशिश की है , मैंने अस्पताल के रिकॉर्ड देखे, रेलवे स्टेशन के रजिस्टर देखे, अपनी माँ की रिकॉर्डिंग सुनी और अब मुझे पता चला है कि 'राघव मेहरा' नाम से एक बच्चा स्कूल में दाखिल हुआ था। क्या वही  तीसरा बच्चा था?”

रत्न प्रताप का चेहरा एकदम से गंभीर हो गया ,तब उन्होंने धीरे से पूछा—“तुम्हें 'राघव मेहरा 'का नाम किसने बताया?”

मोहिनी ने उत्तर दिया, “आपको यह जानने की ज़रूरत नहीं है, मुझे सिर्फ यह जानना है कि वह बच्चा अब कहाँ है ?”

रत्न प्रताप कुछ पल चुप रहे फिर बोले—“राघव मेहरा' तीसरे बच्चे का असली नाम नहीं था।”

मोहिनी ने गहरी साँस ली और बोली -मुझे यही लगा था ,तो उसका असली नाम क्या था?”

रत्न प्रताप ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—उसका असली नाम 'राजवीर' ने रखा था, लेकिन बाद में उस नाम को भी बदल दिया गया।”

भानु ने तुरंत पूछा, “क्यों? ऐसी क्या मजबूरी थी ?बार -बार उसका नाम बदला जा रहा था। 

रत्न प्रताप ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली, तस्वीर में एक छोटा लड़का खड़ा था, उसकी कलाई पर लाल फीता बँधा था। उसके पीछे एक आदमी खड़ा था, जिसका चेहरा कैमरे की ओर नहीं था।

मोहिनी ने तस्वीर हाथ में ली ,उसकी आँखों में पहचान की चमक उभरी और बोली -“यह वही बच्चा है…”

रत्न प्रताप ने सिर हिलाया -“हाँ, यही वह बच्चा है, जिसे तुम इतने समय से खोज रही हो।”

मोहिनी ने तस्वीर पलटी ,उसके पीछे एक नाम लिखा था—“आर्यन !”वो कुछ क्षणों तक उस नाम को देखती रही और जैसे अपने को विश्वास दिला रही हो ,बुदबुदाई ,“तो उसका नाम आर्यन था?”

रत्न प्रताप ने कहा, “नहीं, यह वह नाम था, जो' राजवीर' ने उसे दिया था, लेकिन परिवार के रजिस्टर में उसे कभी इस नाम से दर्ज नहीं किया गया।”

भानु ने पूछा, “तो फिर उसका क्या हुआ, अब उसका क्या नाम होगा ?”

रत्न प्रताप ने तस्वीर वापस लेने की कोशिश की, लेकिन मोहिनी ने उसे कसकर पकड़ लिया और पूछा - पहले आप यह बताइए ! कि अब वह कहाँ है ?”


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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