ए ज़िंदगी !''मैं ''ख़ुश रहना चाहती हूं।
'मैं 'अपने लिए भी, जीना चाहती हूं।
ग़ैर तो क्या ?दर्द दिया न कभी, अपनों को,
कभी-कभी, मतलबी हो जाना चाहती हूं।
जो मैं हूँ , वही बनकर जीना चाहती हूँ।
उड़ान भर,अपना गगन छूना चाहती हूँ।
अब अच्छे बने रहना नहीं ,मुझे !
घुटन छोड़ , खुद के लिए जीना चाहती हूँ।
अच्छे बनने की चाहत में ,भूली थी,अपने को,
फ़ितरत जो मासूम थी,बदल देना चाहती हूं।
अब किसी के लिए खुश रहना नहीं , मुझे !
मतलबी रिश्तों से , घिरी थी ,कभी....
मतलबी रिश्तों से मुक्त हो,
स्व के लिए' स्वार्थी 'बन जाना चाहती हूँ।
आंसू मेरे ,कभी किसी ने देखे नहीं,
बांटने की तो बात दूर है,समझे नहीं।
अब समझाना नहीं, समझना चाहती हूँ।
चुभती हूँ ,आँखों में ,मतलबी लगती हूँ।
चुप थी ,जब तक ,अब कह देना चाहती हूँ।
अब अपने फ़ैसले, ख़ुद लेने लगी हूँ।
किसी ने जानना नहीं चाहा, मैं क्या चाहती हूं ?
नहीं जीना मुझे, अब किसी के लिए ,
अब अपने लिए जीना चाहती हूं।
स्वार्थी होना ,कोई गुनाह तो नहीं ,
भुला ,अपने को ग़ैरों को खुश करने चली थी।
त्याग छोड़ , मतलबी हो जाना चाहती हूँ।
खुद न खुश रह सकी,परवाह में ग़ैरों की ,
अब खुद की नज़रों में उठना चाहती हूँ।
भूल चुकी थी,ख़ुद को,जीवन में तरंग चाहती हूं।
