Jina chahti hun

ए ज़िंदगी !''मैं ''ख़ुश रहना चाहती हूं। 

'मैं 'अपने लिए भी, जीना चाहती हूं।


ग़ैर तो क्या ?दर्द दिया न कभी, अपनों को,

 कभी-कभी, मतलबी हो जाना चाहती हूं।

 जो मैं हूँ , वही बनकर जीना चाहती हूँ।  

उड़ान भर,अपना गगन छूना चाहती हूँ। 

अब अच्छे बने रहना नहीं ,मुझे !

घुटन छोड़ , खुद के लिए जीना चाहती हूँ। 

अच्छे बनने की चाहत में ,भूली थी,अपने को,

 फ़ितरत जो मासूम थी,बदल देना चाहती हूं।   

अब किसी के लिए खुश रहना नहीं , मुझे ! 

मतलबी रिश्तों से , घिरी थी ,कभी....

मतलबी रिश्तों से मुक्त हो,

स्व के लिए' स्वार्थी 'बन जाना चाहती हूँ। 

 आंसू मेरे ,कभी किसी ने देखे नहीं, 

बांटने की तो बात दूर है,समझे नहीं। 

अब समझाना नहीं, समझना चाहती हूँ।

चुभती हूँ ,आँखों में ,मतलबी लगती हूँ। 

चुप थी ,जब तक ,अब कह देना चाहती हूँ। 

अब अपने फ़ैसले, ख़ुद लेने लगी हूँ।  

किसी ने जानना नहीं चाहा, मैं क्या चाहती हूं ?

नहीं जीना मुझे, अब किसी के लिए , 

अब अपने लिए जीना चाहती हूं। 

स्वार्थी होना ,कोई गुनाह तो नहीं , 

भुला ,अपने को ग़ैरों को खुश करने चली थी। 

त्याग छोड़ , मतलबी हो जाना चाहती हूँ।

खुद न खुश रह सकी,परवाह में ग़ैरों की ,

अब खुद की नज़रों में उठना चाहती हूँ। 

भूल चुकी थी,ख़ुद को,जीवन में तरंग चाहती हूं। 


 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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