Dhokha [part 47]

नंदिनी जब अपनी होने वाली सास के साथ खरीददारी करने गयी थी तब भी, उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैंने प्रतीक को नहीं देखा। उसके भाई ने तो स्वयं बताया था, कि अब प्रतीक नहीं रहा, फिर वह अब इस तरह 3 साल बाद जिंदा कैसे हो सकता है ? उसका तो अंतिम संस्कार हो गया है। अपने मन को समझाने का प्रयास करने लगी किंतु उसकी एक झलक ने, उसको बेचैन अवश्य कर दिया था। अपना मन फिर से विवाह की तैयारियों में लगाने का प्रयास लगी ,किन्तु मन में रह -रहकर उस छवि का ख़्याल आ ही जाता। 


एक दिन नंदिनी, गहने खरीदने के लिए ,स्वर्णकार की दुकान पर गई थी। वहां बैठकर उसे, वही बात स्मरण हो आईं।  जब वो प्रतीक की दुकान के सामने से गुजरती थी और वो उसे निहारता रहता था। हालाँकि नंदिनी इस ओर ध्यान न देने का अभिनय करती थी किन्तु प्रतीक की  नजरें उसका पीछा करते हुए उसके पीछे महसूस होतीं ,तो उसकी चाल में स्वतः ही अज़ीब सी मस्ती होती थी, सोचकर मुस्कुरा दी। 

दुकानदार ने उसे मुस्कुराते हुए देख लिया ,उसने नंदिनी से पूछा -हांजी ,बताइये !आपके लिए ये पायल कैसी रहेंगी ?आपका अच्छा चुनाव है। 

उसकी आवाज से नंदिनी वर्तमान में आ गयी और बोली - भइया ! ये तो बहुत भारी हैं ,आजकल ऐसी पायल कौन पहनता है ?थोड़ी हल्की दिखाइए।

उसने नंदिनी को देखा और बोला -आप इन्हें देखकर मुस्कुरा रहीं थीं इसलिए मैंने सोचा,ये आपको पसंद हैं। वैसे तो शादी ब्याह में तो भारी पायजेब ही पहनी जाती हैं ,आप कहती हैं ,तो हल्की भी दिखला देता हूँ किन्तु आपके पांवों में ये बड़ी खूबसूरत लगेंगी। 

नहीं ,हल्की ही दिखाइए ! भारी पायल तो इसकी ससुराल से आएँगी ,नंदिनी की मम्मी बोली। 

नंदिनी ने मुँह बनाया और सोचने लगी ,जिसको मेरे पांवों में भारी पायल पसंद थी, वो तो अब इस दुनिया में ही नहीं रहा। एक दिन बगीचे में जब प्रतीक से मिलने के लिए गयी थी ,तब उसने अपनी कमीज के अंदर से एक पैकेट बाहर निकाला। उत्सुकता से नंदिनी ने पूछा -इसमें क्या है ?

तुम खुद ही देख लो !कहते हुए उसने पैकेट उसके आगे कर दिया। नंदिनी ने जब वो पैकेट खोला तो ख़ुशी से उछल पड़ी। उसमें भारी पायल थीं। ओह !कितनी सुंदर पायल हैं ? क्या मेरे लिए लाये हो ?

नहीं ,अपने लिए ,मैं पहनूंगा ,तुम्हें दिखाने  के लिए लाया हूँ। जरा बताना ,मेरे पावों में कैसी लगेंगी ?उसकी बातें सुनकर नंदिनी जोर से हंसी ,हंस क्यों रही हो ? अब पहनकर भी दिखा दो ! मेरी दुकान में ये सबसे अच्छा डिजाइन था ,तुम्हारे लिए ले आया। ये तो मेरी चौधरन के पांवो के लिए ही बनी हैं। 

इतनी भारी पायल मैं कहाँ पहनूंगी ? मम्मी ने पूछा ,तो क्या जबाब दूंगी ? 

ये पायल तुम मेरे घर में पहनना,जब तुम ब्याहकर मेरे घर आ जाओगी। इन पायलों की छमछम से ही मेरी मेरी सुबह की शुरुआत होगी और आँखें खुलेंगी। वहां तो पहनोगी। 

ठीक है ,तब तक तुम इन्हें मेरी अमानत के तौर पर रख लेना ,वहीं आकर पहनूंगी ,सोचते हुए नंदिनी की आँखें भर आईं। दुकानदार उसे डिजाइन दिखाए जा रहा था किन्तु उसका  ध्यान तो कहीं और था।

 तब उसका स्वर नंदिनी के कानों में गूंजा ,इतने डिजाइन आपके सामने हैं ,कोई तो पसंद कीजिये !

नहीं ,मुझे इनमें से कोई पसंद नहीं है ,उसने बिना उस ओर देखे ही इंकार कर दिया और उठ गयी। तब बोली -मम्मी !आपको जो पसंद हो ,ले लेना ,मैं घर जा रही हूँ। 

उसका ऐसा व्यवहार देखकर उन्हें नंदिनी पर क्रोध तो आया किन्तु उन्होंने अपने को शांत रखा। नंदिनी वहां से चली तो आई किन्तु विचारों ने उसे नहीं छोड़ा ,वो उसके साथ थे। ऐसी एक दुकान के सामने से जाते हुए ही उसकी जिंदगी में आज कितना बड़ा बदलाव आ गया ? पर कोई बात नहीं, अब तो जीवन में आगे बढ़ ही रही हूँ। अपनी पलकों पर झलक आये आंसू पोंछ डाले। 

अब तो दीपक मेरी ज़िंदगी में आ गया है ,यह सोचकर उसने गहरी सांस ली। तभी उसे लगा जैसे कोई उसे देख रहा है। न जाने क्यों बार -बार उसे आभास हो रहा था ,कोई तो है ,जो उस पर नजर रखे हुए है। उसने आसपास देखा ,लेकिन कोई दिखलाई नहीं दिया। 

नंदिनी की मम्मी और बहन ने अपनी पसंद से आभूषण लिए और बाहर आ गई।

इधर नंदिनी को महसूस हो रहा था, किसी की नजरें  उसका पीछा कर रही हैं । घबराकर तब वो वापस उसी दुकान पर पहुंचने के लिए अपने क़दम तेजी से बढ़ाने लगी किन्तु रास्ते में ही उसकी मम्मी और बहन उसे मिल गए। उसे देखते ही उसकी बहन ने पूछा -तुम इस तरह वहां से उठकर क्यों चली आईं ?

क्या करती ?वहां मेरा दम घुट रहा था। चलो ,और कहीं चलते हैं ,बाजार में घूमते -फिरते उसे काफी समय हो गया, काफी सारा सामान भी लिया। तब एक चूड़ियों की दुकान पर उसे फिर से वही परछाई दिखलाई थी। वह तुरंत ही अपना सामान छोड़कर उधर की तरफ भागी। उसके साथ उसकी मम्मी और उसकी चचेरी बहन भी थी। उसकी यह हरकत देखकर उन्हें बड़ा अजीब लगा किंतु वह परछाई फिर उसे दिखला ई नहीं दी। उसकी मम्मी ने उसकी यह हरकत का कारण जानना चाहा, तब उसने बताया-' कि मुझे आज फिर वही परछाई दिखलाई दी थी।' 

यह सुनकर उसकी मम्मी को क्रोध आया और बोलीं - अब एक जगह बात बन रही है ,क्या तू यह बात बनने नहीं देना चाहती है।  क्या तू अब परछाइयों के पीछे भागने लगी है ? 

नहीं, मम्मी ! मैं परछाई के पीछे नहीं भाग रही हूं , मुझे लगता है ,अवश्य ही कोई है जो छुपकर मेरा पीछा कर रहा है और मुझ पर अपनी नजर गड़ाए हुए हैं। 

 तू अपने आप को किसी मुसीबत में डाल रही है ,क्या तुझे यह सब समझ नहीं आता ? अगर दीपक को यह बात पता चलेगी तो उसे कितना दुख पहुंचेगा ?

ऐसा कुछ नहीं है, दीपक मेरे विषय में शुरू से ही सब कुछ जानता है बल्कि उसने ही मुझसे अपनी सच्चाई छुपाई है। मैंने कभी उससे अपनी कोई सच्चाई नहीं छुपाई। 

तो अब तू क्या चाहती है ? प्रतीक के भ्रम को लेकर जीना चाहती है या फिर तेरे सामने जो साक्षात दीपक है उसके साथ जीना चाहती है , क्रोधावेश में उन्होंने कहा। 

मेरे मन में तो ऐसा कुछ भी नहीं है ,किंतु मेरा मन अभी भी बहुत बेचैन है ,परेशान है। मैं अब तो आगे बढ़ ही रही थी किंतु क्या कर सकती हूं ?मुझे ऐसा लगता है, कोई तो है ,जो मेरा पीछा कर रहा है या मुझ पर नजर रखे हुए है।

 बस एक ही बात को लेकर बैठ गई है , जो हो गया उसे भूल जा ! जो परछाई है ,अगर वह प्रतीक हुआ भी हालांकि वह जिंदा नहीं है और यदि हुआ भी, तो अब तेरी बात दीपक से हो चुकी है। इस बात को भूल जा कि वह वापस आएगा। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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