चिंतामणि को ,जब केशवदास जी बताते हैं ,'कि उनकी बेटी अहाते में, किसी सहेली से नहीं बल्कि हमसे झूठ बोलकर एक लड़के से मिलने गई थी। तो उन्हें एकाएक विश्वास नहीं होता,' कि उनकी बेटी ऐसा भी कुछ कर या सोच सकती है।'', किंतु जब उसके सामने पति बता रहे हैं -'कि मैंने दोनों को साथ में, वहां पर देखा है तो उसे विश्वास करना पड़ा।''
यह सुनकर चिंतामणि सोच में पड़ गई, ऐसा कैसे हो सकता है? मेरी बच्ची तो ऐसी नहीं थी। अचानक ही न जाने ,ये लड़का इसकी जिंदगी में कैसे आ गया ? कमरे के कोने में बैठी अफसोस से चिंता मग्न थीं। उसे अब प्रेम के बदले व्यवहार की कुछ बातें स्मरण हो आईं।
तब केशवदास जी बोले -इस तरह बैठे रहने से कुछ नहीं होगा , इससे पहले की बात और अधिक बढ़ जाए। हमें शीघ्र ही इसके ''हाथ पीले करने होंगे।'' वैसे तो आज ही मैं 'रामावतार 'से बात करके आया हूं। उससे कहा था ,'कि नजर में कोई लड़का हो तो बताना।''किन्तु अब जब तक कोई लड़का नहीं मिल जाता है ,तब तक तुम्हें इस पर नजर रखनी होगी ,इसे बाहर कहीं नहीं जाने देना है।
अचानक इसे ,इस तरह रोकूंगी और यह ज़िद पर आ गई ,तो क्या होगा ?
उसके ऐसे प्रश्न को सुनकर केशवदास जी के मुँह में जैसे कड़वाहट घुल गयी और बोले - तुम कैसी माँ हो ?अपनी बेटी पर ही नियंत्रण नहीं ,उसे ही नहीं संभाल सकतीं।
मेरे कहने का मतलब ये था ,अभी घर में किसी को कुछ पता नहीं है ,इसीलिए मैं कह रही थी ....दबे शब्दों में वो बोलीं।
इससे पहले कि वो अपना वाक्य पूर्ण करतीं ,वो झुंझलाकर बोले -इसीलिए तो कहता हूं, लड़कियों को ज्यादा छूट देना,उचित नहीं, तुम हमेशा ही इसकी तरफदारी करती थीं, नाराज होते हुए ,तब केशव जी बोले - जीवन में रोटी -पानी के सिवा तुमने किया ही क्या है ? तुमसे एक बेटी ही नहीं सम्भल रही।
उनके इतना कहते ही चिंतामणि को लगा जैसे उसका सम्पूर्ण अस्तित्व ही समाप्त हो गया हो। उसकी आँखों के समक्ष उसका सम्पूर्ण जीवन घूम गया। जबसे यहाँ आई है ,न दिन देखा ,न रात। तीस -पैंतीस की होते छह बच्चों की माँ बन गयी। कभी किसी को कुछ कहने -सुनने का मौका ही नहीं दिया। आज जब बच्चे इतने बड़े हो गए ,तीन का विवाह हो गया। उम्र के इस पड़ाव पर आकर मुझे यह सुनने को मिल रहा है। वो आँखें मूंदकर बैठ गयीं। क्या करें ,किससे कहें ? घर में बहु है ,उसको भनक लग गयी तो क्या होगा ?
बहु का स्मरण होते ही ,पल भर में ही वो, अपनी सभी बातों को भुलाकर ,अपने अहम को मारकर ,केशवदास जी से बोली - बहु ,का क्या करना है ?
क्या मतलब ?
वो भी आए दिन, अपने पीहर जाने की जिद लगाये रहती है। कुछ काम करना नहीं चाहती, बैठे- बिठाये खाने को मिल जाए ,तो सास और ननद बढ़िया है। न मिले तो... कहते -कहते रुक गयी। मैंके जाने की जिद कर रही है।
कुछ क्षण केशवदास जी चुप रहे और फिर बोले - तुम क्यों चिंता करती हो ? भेज दो !उसी के घर ! हमने क्या सभी का ठेका ले लिया है। बच्चे पाल दिए, बड़े हो गए। अब उनके बच्चों की जिम्मेदारी भी हम ही निभाएं ।
निभा भी लें, तो बच्चे भी तो इस काबिल होने चाहिए।
जाना चाहती है, तो उसे जाने दो ! उसके मां-बाप उसकी देखभाल करेंगे, देखते हैं , उसे कैसे बैठाकर खिलाएंगे ?तीखे स्वर में केशवदास जी बोले।
कम से कम दो-तीन महीने तो लग ही जाएंगे, उसे वहीं छोड़ो ! कल जाकर दिनेश छोड़ आएगा। इस बीच हम कोई लड़का देख लेंगे। बहू के कानों में इस बात की भनक भी नहीं पड़नी चाहिए। मेरे विचार से तो यह बात इस कमरे से बाहर ही नहीं जानी चाहिए। एक बार भी, किसी के कानों में यह बात पड़ गई, तो लड़की का रिश्ता होना भी मुश्किल हो जाएगा। यह शहर नहीं है, गांव है, बस तीली दिखाने भर की देर है, आग लगने में देर नहीं लगेगी और आसपास के गांव में भी चर्चा फैल गयी तो... इस बदनामी से कोई नहीं बचा सकता। अब तुम अपनी बेटी को संभाल कर रखो ! उसे घर के काम सिखाओ ! अब जंगलों में बहुत धक्के खा लिए , इसे बाहर कहीं नहीं जाने देना है।
आखिर वह लड़का कौन है ,वो हमारी प्रेम को कैसे मिल गया ?
बता रही थी , मनीष के विवाह में उसने देखा था।
हां, मुझे याद आया, जब ये लोग वापस आई थीं ,तब तीनों बहनें ही हंसी मजाक कर रही थीं। उस समय बता रही थीं -' कोई लड़का बार-बार हमारी प्रेम के इर्द-गिर्द मंडरा रहा था।'' तभी उनके दिमाग में एक विचार आया और बोली - एक बात कहूं ,यदि लड़का सही है, नौकरी पेशेवाला है या उसका अच्छा कारोबार है तो उससे विवाह करने में कोई बुराई भी नहीं है।
वह तुम, क्या बकवास कर रही हो, तुम्हें पता भी है, वो कौन है ? पिछली पट्टी वालों के, यहां उसका कोई दोस्त रहता है। वो हमारी बिरादरी का भी नहीं है। ये बेफिज़ूल की बातें अपने दिमाग़ में मत डालो !जितनी अक़्ल हो ,उतना ही काम करो ! उनके इस रूखे व्यवहार से चिंतामणि फिर से आहत हुई और चुप हो गयी।
कुछ क्षण शांत रहकर ,अपनी बेटी के लिए वो फिर से उठ खड़ी हुई ,उसे तो शायद, उनके इस तरह के व्यवहार की आदत ही बन गयी है ,तब बोली - यह आप क्या कह रहे हैं ? दोस्त ही तो है, दोस्ती तो किसी से भी हो जाती है ,जरूरी तो नहीं, पिछली पट्टी वालों की बिरादरी से ही हो।
तुम्हें एक बात समझ में नहीं आती ,तुम अपना ज्यादा दिमाग मत लगाओ ! मैंने सब पता कर लिया है। आज ही मैं दोबारा जाकर राम अवतार जी से कहता हूं कि शीघ्र से शीघ्र कोई लड़का बताएं।
इतनी जल्दबाजी भी ठीक नहीं, कहीं राम अवतार जी को शक हो गया तो सोचेंगे-इतनी जल्दबाजी कैसे दिखा रहे हैं ?
हां, मैं सब संभाल लूंगा, कहते हुए वो उठ खड़े हुए और बोले - कल दिनेश या केशव में से कोई सा भी जाकर बहू को उसके घर छोड़ आएगा। इस विषय में किसी से कोई बात नहीं करनी है, कहकर केशवदास जी कमरे से बाहर निकल गए।
एक इंसान मान- सम्मान और इज्जत की ख़ातिर ही तो, कई बार परिवार से, समाज से, परिस्थितियों से समझौते कर बैठता है। इज्जत को कमाने में सालों लग जाते हैं, किंतु खोने में पल भर नहीं भी नहीं लगेगा। यही सब सोचते हुए ,वो आगे बढ़ रहे थे।
चिंतामणि ! बाहर डाकिए ने चिंतामणि को आवाज़ लगाई।
चिंतामणि, ने बाहर झाँका ,डाकिये को देखकर सोचने लगी - ऐसे समय में किसका पत्र आया होगा ? कुछ क्षण के लिए वह अपनी मानसिक परेशानियों से मुक्त होकर, उस पत्र की जिज्ञासा लिए बाहर आई और डाकिये से पूछा - किसका पत्र है ?
चिंतामणि के नाम से पत्र आया है , डाकिए ने जवाब दिया और पत्र को उसके हाथ में पकड़ाकर चला गया।
