किसी तरह मोहिनी और भानु की रात्रि बीती। उस रात्रि उनके अलग ही अनुभव रहे ,वे रातभर सो नहीं पाए। उन घटनाओं को समझने का प्रयास कर रहे थे ,जो उनके साथ बीती। रणवीर जो रजिस्टर लेकर आया था। उसमें एक नाम ''माधव वर्मा ''था ,जबसे मोहिनी ने यह नाम सुना ,उसे बार -बार परेशान कर रहा था।
तभी उसके पास कमला आई और कमला ने अपनी साड़ी के पल्लू में बँधी, एक छोटी-सी कागज की पर्ची निकाली और मोहिनी के हाथ पर रखते हुए बोली -“कल रात जब मैं ऊपर सफाई करने गई थी, तो मुझे यह पुराने कमरे के बाहर मिली ,मोहिनी ने पर्ची खोलकर देखी।उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—‘जिसे तुम माधव समझ रही हो, वह माधव नहीं है।’वो लाइन पढ़कर मोहिनी की उँगलियाँ जैसे ठंडी पड़ गईं। तब उसने कमला से पूछा -“यह पर्ची तुम्हें कहाँ मिली?”
“ऊपरी गलियारे में, उस कमरे के सामने जहाँ आप रात को गई थीं।”
तुमने इसे किसी को दिखाया तो नहीं ?”
कमला ने 'नहीं 'में सिर हिलाया, मुझे डर लगा इसलिए सीधे आपके पास चली आई।”
मोहिनी ने पर्ची को दोबारा पढ़ा ,जिस व्यक्ति का नाम रजिस्टर में से काट दिया गया था, क्या वह वास्तव में ''माधव वर्मा ''नहीं था? या फिर किसी ने उसकी पहचान बदल दी थी ? तभी कमरे के बाहर कदमों की आवाज सुनाई दी और तभी भानु अंदर आ गया।उसे देखकर कमला वहां से चली गयी।
अंदर आते ही बोला -मोहिनी ! हमें, अभी नीचे चलना होगा।”
क्यों ,क्या हुआ?”
भानु ने उसकी ओर देखकर कहा - आँगन में कोई आया है।”
“कौन है ?”
भानु ने कुछ पल रुककर जवाब दिया—वह आदमी, जिसने कल रात दरवाजे पर राजवीर होने का दावा किया था।”
मोहिनी के हाथ से पर्ची लगभग छूट गई ,उसने पूछा -अब वह यहाँ क्यों आया है?”
इस बार वह अकेला नहीं है,भानु ने दरवाजे की ओर देखा, उसके साथ एक महिला भी है।”
मोहिनी ने पूछा, “कौन-सी महिला ?”
भानु का चेहरा गंभीर हो गया ,वह अपना नाम मृणाल बता रही है।”
मोहिनी की साँस जैसे अटक गई -मृणाल ! वह नाम, जो मेरी माँ का है ।वह नाम, जिसके साथ उसकी सबसे पुरानी और सबसे दर्दनाक यादें जुड़ी थीं।मोहिनी ने काँपते स्वर में पूछा— भानु !… क्या तुमने उसे देखा है ?”
“हाँ ”
“वो कैसी दिखती है?”
भानु ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—ठीक वैसी, जैसी तुम्हारी पुरानी तस्वीरों में, तुम्हारी माँ दिखती है।”
मोहिनी कुछ क्षणों तक उसे देखती रही ,फिर उसने अपनी मुट्ठी में बंद चाबी कस ली और अपने को मानसिक रूप से उस महिला से मिलने के लिए तैयार किया ,बोली -“चलो ”वह दरवाजे की ओर बढ़ी।
इससे पहले कि वो दरवाजे से बाहर निकलती ,उससे पहले भानु ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला -मोहिनी ! एक बात याद रखना।”
“क्या?”
“हम अभी यह नहीं जानते कि वह सचमुच तुम्हारी माँ है या कोई और, इसलिए कोई भी फैसला लेने से पहले हम उसकी बात सुनेंगे।”
मोहिनी ने सिर हिलाया और विश्वास दिलाया - ठीक है ,मैं उसकी बात सुनूँगी लेकिन अगर वह सचमुच मेरी माँ हुई, तो …उसकी आवाज भर्रा गई ,तो मैं उससे एक ही सवाल पूछूँगी।”
“कौन-सा?”
मोहिनी ने उसकी ओर देखा और बोली - उस रात उसने, मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया था?”
भानु के पास कोई जवाब नहीं था ,दोनों नीचे जाने लगे। उन्हें नहीं पता था कि आँगन में खड़ी महिला उनके आने का इंतजार कर रही थी और उसके हाथ में वही लाल रिबन था, जिसे मोहिनी ने अपने बचपन की यादों में तीसरे बच्चे के बालों में देखा था।
सुबह के सात बज रहे थे ,हवेली का मुख्य आँगन,जहाँ पहले से ही कई लोग मौजूद थे मोहिनी और भानु सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आँगन में पहुँचे। रत्न प्रताप एक खंभे के पास खड़े हुए थे। उनके चेहरे पर असामान्य गंभीरता थी। रूद्र उनसे कुछ दूरी पर खड़ा, उस महिला को देख रहा था, जो मुख्य दरवाजे के पास चुपचाप खड़ी थी।महिला के हाथ में एक छोटा-सा लाल रिबन था। उसके पास खड़ा आदमी वही था, जिसने पिछली रात हवेली के दरवाजे पर राजवीर होने का दावा किया था।
मोहिनी की नजर सबसे पहले उस महिला के चेहरे पर गई। वह चेहरा…उसके पास रखी पुरानी तस्वीरों में मौजूद चेहरे से मिलता-जुलता था।
महिला की आँखों में थकान थी। बालों में हल्की सफेदी झलक रही थी। चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लेकिन उसकी आँखों में कुछ ऐसा था, जिसे देखकर मोहिनी के भीतर कोई पुरानी याद करवट लेने लगी।
महिला ने मोहिनी को देखा ,उसके होंठ थरथराये -“मोहिनी…”बस एक शब्द उसके कंठ से निकला , उसी एक शब्द ने मोहिनी के मन में कई सवाल जगा दिए ,उसका मन किया, कि वह आगे बढ़े और अपनी माँ से लिपट जाये ,वो अंदर से पिघल रही थी किन्तु तभी उसे भानु की बात स्मरण हो आई। माँ जैसी दिखती है ,जरूरी नहीं माँ ही हो। आगे बढ़ते उसके कदम वहीं ठहर गये। तब उसने दूर से ही पूछा -“आप कौन हैं?”
उस महिला ने जवाब देने से पहले एक गहरी साँस ली,“मेरा नाम मृणाल है।”मोहिनी की आँखें भर आईं। तब वो बोली -“मृणाल'' तो मेरी माँ का भी नाम है।”
“मुझे पता है।”
तो फिर आप कौन हैं?”
महिला ने लाल रिबन को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया और विश्वास दिलाते हुए बोली -मैं ही तुम्हारी माँ हूँ।उसके इतना कहते ही जैसे वक़्त थम गया ,आँगन में सन्नाटा छा गया। मोहिनी ने एक कदम और आगे बढ़ाया ,उसके अंदर तूफान उठने लगा ,“नहीं ”ये कोई बहरूपिया भी तो हो सकती है। मेरी माँ मुझे इस तरह अकेला नहीं छोड़ती।
महिला की आँखों से आँसू बह निकले ,“मोहिनी …”मेरी बच्ची !
“नहीं!” मोहिनी की आवाज तेज हो गई, “आप ऐसे ही आकर नहीं कह सकतीं, कि आप मेरी माँ हैं। मेरी माँ तो मर चुकी हैं।”
रत्न प्रताप ने नजरें झुका लीं।मोहिनी ने उनकी ओर देखा और आगे बढ़कर पूछा -“क्या आप जानते थे ? माँ जिन्दा है। ”रत्न प्रताप ने कोई जवाब नहीं दिया ,बताइये ! क्या आपको पता था, कि मेरी माँ जिंदा हैं?”
“मोहिनी, यह बात इतनी सरल नहीं है।”
“मेरे लिए यह बहुत सरल है, रत्न प्रताप जी ! आप सब जानते थे और मुझे कुछ नहीं बताया।”
भानु ने मोहिनी के कंधे पर हाथ रखा और बोला -“पहले उनकी बात सुन तो लो !”मोहिनी ने अपने कंधे से उसका हाथ हटा दिया और बोली -अब सुनने को बचा ही क्या है ?“मैंने पूरी जिंदगी दूसरों की बातें ही सुनी हैं। अब मैं अपने सवालों के जवाब चाहती हूँ।”वह उस महिला के सामने जा खड़ी हुई ,उसकी आँखों में आँ खें डालते हुए पूछा -“अगर आप मेरी माँ हैं, तो बताइए—17 अगस्त 2001 की रात क्या हुआ था?”
