Kiski dulhan [part 77]

 तभी विक्रम का फोन बजा ,उसने स्क्रीन देखकर फोन उठाया -“हैलो?” दूसरी ओर से कुछ कहा गया।विक्रम के चेहरे का रंग बदल गया ,“क्या? कब?”

विक्रम के इस तरह के भावों और शब्दों को सुनकर लगा ,अवश्य ही कोई गड़बड़ है ,उसने तुरंत गाड़ी रुकवाई और पूछा -“क्या हुआ?”

विक्रम ने फोन बंद किया और कुछ क्षण तक बोल नहीं पाया ,फिर उसने मोहिनी की ओर देखकर कहा -रत्न प्रताप हवेली से गायब हैं।”


मोहिनी चौंक गई ,वे अचानक कहाँ गए ? उनसे प्रातःकाल तो मिलकर ही आये थे। 

“उनके कमरे में एक पत्र मिला है। उसमें लिखा है कि वह उस व्यक्ति से मिलने जा रहे हैं, जिसे उन्होंने 2001 में मृत घोषित किया था।”

भानु ने तुरंत पूछा, “क्या उस पत्र पर हस्ताक्षर हैं?”

विक्रम ने सिर हिलाया -“नहीं ,लेकिन नीचे एक वाक्य और लिखा है।”

“क्या?”

विक्रम ने काँपती आवाज़ में कहा—“अगर मैं वापस न लौटूँ, तो मोहिनी को बता देना, कि तीसरे बच्चे का नाम कभी अन्वी था, ही नहीं।”विस्मित हो, मोहिनी की आँखें फैल गईं।

अन्वी—वह नाम, जिसे लेकर मुझे पहले भी संदेह पैदा हुआ था। उस व्यक्ति ने साफ़ कहा था ,'कि तीसरे बच्चे का असली नाम 'अन्वी' नहीं था।'तो फिर उसका वास्तविक नाम क्या था और रत्न  प्रताप अब किससे मिलने गए हैं ?

राजवीर से.....या फिर उस तीसरे बच्चे से, जिसकी पहचान वर्षों से छिपाई जा रही थी?भानु ने शंका ज़ाहिर की। 

मोहिनी ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।अब यह केवल एक परिवार का पुराना रहस्य नहीं रहा था। यह तीन बच्चों की बदली हुई पहचान, एक माँ से अलग की गई बेटी और एक ऐसे आदमी की कहानी बन चुकी थी, जिसे शायद कभी मरना ही नहीं चाहिए था—लेकिन जिसे कागज़ों में मृत घोषित कर दिया गया था ,और सबसे बड़ा सवाल अब भी वही था—तीसरे बच्चे को आखिर किसने गायब किया था ?

हवेली के मुख्य दरवाज़े के बाहर रात की नमी अब भी ठहरी हुई थी, वहां का वातावरण शांत नजर आ रहा था ,लेकिन भीतर का माहौल किसी तूफ़ान से कम नहीं था। रत्न प्रताप गायब थे ,उनके कमरे से मिला पत्र इस बात का संकेत दे रहा था कि वह उस व्यक्ति से मिलने गए हैं, जिसे उन्होंने स्वयं 2001 में मृत घोषित किया था और पत्र के अंत में लिखी पंक्ति ने मोहिनी के सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया था—“तीसरे बच्चे का नाम कभी अन्वी था ही नहीं।”

मोहिनी  ने पत्र दोबारा पढ़ा। उसे स्मरण था,' कि पहले हवेली के दरवाज़े पर आए लाल पत्थर की अंगूठी वाले आदमी ने भी अन्वी के नाम को नकार दिया था। उस समय उसने उस बात को एक और रहस्यमयी पहेली समझा था। अब वही नाम बार-बार सामने आ रहा था।

“विक्रम जी,”से उसने पूछा, “क्या आपको कभी किसी ऐसे बच्चे के बारे में बताया गया था, जिसे' अन्वी' के नाम से दर्ज किया गया हो?”

विक्रम ने सिर हिलाया और  बोले -“मुझे इस नाम का उल्लेख एक पुराने कागज़ में मिला था, लेकिन उस कागज़ पर नाम के आगे सवाल का निशान था। जैसे किसी ने बाद में उसे काटने या बदलने की कोशिश की हो।”

भानु ने, रत्न प्रताप के कमरे से मिला पत्र वापस मेज़ पर रखा।अगर 'अन्वी' उसका असली नाम नहीं था, तो किसी ने यह नाम उसे क्यों दिया होगा? और अब कोई हमें बार-बार यह बताने की कोशिश क्यों कर रहा है ? कि वह नाम गलत है?”

“क्योंकि शायद असली नाम सामने आते ही ,उस बच्चे की पहचान खुल जाएगी,”मोहिनी ने कहा।

भानु ने उसकी ओर देखा और कहा -या फिर कोई ये चाहता है, कि हम उसी नाम के पीछे भागते रहें, जबकि असली सच कहीं और छिपा हो।”

मोहिनी को उसका तर्क सही लगा। इस परिवार में हर सुराग के साथ, एक नया विरोधाभास सामने आ रहा था। एक नाम सामने आता, फिर उसे झूठा बताया जाता। किसी को मृत घोषित किया जाता, फिर उसके जीवित होने का संकेत मिलता। किसी को बचाने की बात कही जाती, लेकिन उसी के कारण किसी दूसरे की ज़िंदगी तबाह हो जाती है।अब उसे केवल सुराग इकट्ठे नहीं करने थे, उसे यह समझना था कि इन सबके पीछे कौन-सा एक सच छिपा हुआ था। तभी सीढ़ियों से तेज़ कदमों की आवाज़ आई।

मोहिनी ने देखा, उसके पालक पिता नीचे उतर रहे थे। उनके चेहरे पर चिंता थी और हाथ में एक पुराना कपड़े का बैग !आते ही बोले -मोहिनी ! मुझे, तुमसे कुछ कहना है।”

मोहिनी तुरंत उनके समीप पहुँची ,“क्या हुआ ? पापा !”

उन्होंने वो कपड़े का बैग मेज़ पर रख दिया और तब बोले -“आज स्टेशन से लौटने के पश्चात, मुझे अपने पुराने सामान में यह मिला। मैं इसे पहले भी देख चुका हूँ, लेकिन कभी खोलने का साहस  नहीं हुआ।”

“आपने ,पहले क्यों नहीं बताया ?”

“क्योंकि मुझे लगा था कि इसमें वही बातें होंगी, जिनसे तुम्हें दूर रखने का वादा मैंने किया था, लेकिन अब जब तुम्हारी माँ का नाम, तुम्हारा बचपन और तुम्हारी शादी तक इस मामले में जुड़ चुके हैं, तो मुझे लगता है कि इसे और छिपाना गलत होगा , कहते हुए उन्होंने बैग खोला।

जिसके अंदर एक छोटी डायरी, एक पुरानी चाबी और कपड़े में लिपटा हुआ ,चाँदी का लॉकेट था।लॉकेट देखते ही मोहिनी के  चेहरे के भाव बदल गये ,उसके मुख से निकला -“यह…कहते हुए ,उसने लॉकेट को हाथ में लिया। उसने देखा ,उस लॉकेट के सामने के हिस्से पर एक छोटा फूल बना था—वही फूल, जो हवेली के तीसरे पलंग पर खुदा हुआ था।“यह लॉकेट आपको कहाँ मिला था?”उसने प्रश्न किया 

“तुम्हें हवेली से ले जाने के कुछ दिनों पश्चात यह मेरे सामान में रख दिया गया था। साथ में एक संदेश था - कि इसे तब तक सुरक्षित रखना, जब तक तुम अपने बचपन वाले कमरे में वापस न आ जाओ।”

“किसने रखा था?”

“मुझे नहीं पता, संदेश पर भी कोई नाम नहीं था।”

मोहिनी ने लॉकेट खोला, अंदर दो छोटे अक्षर खुदे हुए थे—M.R.

विक्रम ने उसे देखकर कहा - “यह M.V. नहीं है, M.R. है।”

भानु ने भी लॉकेट को रोशनी में देखा और कहा -“क्या R का मतलब राजवीर हो सकता है?”

मोहिनी ने तुरंत कहा, “या कोई दूसरा नाम, हम फिर अनुमान लगा रहे हैं।”उसके स्वर में झुँझलाहट थी। इतने दिनों से वह दूसरों के अनुमानों पर अपनी ज़िंदगी के जवाब खोज रही थी। अब वह बिना प्रमाण के किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहती थी।उसने लॉकेट वापस मेज़ पर रख दिया।“डायरी खोलिए, पापा !”

उनके पालक पिता ने डायरी मोहिनी को दे दी।पहले पन्ने पर तारीख थी—21 अगस्त 2001 और नीचे लिखा था—“जिस बच्ची को मैं अपने साथ ले जा रहा हूँ, उसका नाम मुझे नहीं बताया गया। मुझे केवल इतना कहा गया है ,कि जब वह बड़ी होगी, तो उसे उसके असली नाम से पुकारना ,उससे पहले नहीं।”

मोहिनी की उँगलियाँ काँपने लगीं ,“यह किसने लिखा है?”

उसके पालक पिता ने धीमे स्वर में कहा, -“मुझे लगता है, यह उसी व्यक्ति की लिखावट है, जिसने तुम्हें मेरे हवाले किया था लेकिन मैं पूरी तरह से निश्चित नहीं हूँ।”

मोहिनी ने अगला पन्ना पलटा ,वहाँ एक और वाक्य लिखा था—“अगर वह कभी पूछे कि उसकी माँ ने उसे क्यों छोड़ा, तो कहना कि उसकी माँ ने उसे नहीं छोड़ा था। उसे बचाने का फैसला किसी और ने किया था।”

मोहिनी ने डायरी बंद कर दी ,उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वह रो नहीं रही थी। उसके भीतर एक ऐसी दृढ़ता जन्म ले रही थी, जो किसी भी रहस्य से पीछे हटने को तैयार नहीं थी।तब मोहिनी बोली -“मैं अब अपने असली नाम का इंतज़ार नहीं करूँगी, “मैं खुद उसे खोजूँगी।”

भानु ने उसकी ओर देखकर कहा - और हम तुम्हारे साथ हैं।”

लेकिन मोहिनी के पालक पिता ने, एक ऐसी बात कही, जिसने कमरे का माहौल फिर बदल दिया।“एक और बात है, मोहिनी ! जब तुम्हें ,मेरे हवाले किया गया था, तब तुम्हारे साथ एक दूसरा बच्चा भी था।”

मोहिनी ने हैरत से उनकी ओर देखा ,“दूसरा बच्चा !ये आपने पहले क्यों नहीं बताया ?”

“हाँ, उसे कुछ देर पश्चात ही मुझसे अलग कर दिया गया ,इसलिए ये बात बताना ,मैं भूल गया।  मुझे ,उसका चेहरा तो स्पष्ट स्मरण नहीं, लेकिन उसकी कलाई पर लाल फीता बंधा था।”

मोहिनी के हाथ से डायरी छूटते-छूटते बची ,लाल फीता !यानि कि तीसरा बच्चा और वह पुराना रेलवे स्टेशन। अब इन तीनों के बीच भी गहरा संबंध हो सकता है ,इसका अनुमान हम क्यों नहीं लगा सके ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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