स्टेशन पर हरिनारायण ,मोहिनी से उस व्यक्ति का नाम बताने ही वाला था ,कि तभी अंगूठी वाले आदमी ने उसे रोक दिया। मोहिनी ने उससे कहा -उसे सच्चाई बताने दीजिये !
उस अंगूठी वाले व्यक्ति ने घूरते हुए, मोहिनी को देखा , और कहा - तुम्हें अपने परिवार की बातों में दखल देने की आदत क्या बचपन से है ?”
मोहिनी के चेहरे पर तनाव उभर आया ,आपने क्या कहा “क्या आप मुझे बचपन से जानते हैं?”
उस आदमी ने एक क्षण के लिए उसकी आँखों में देखा, फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला—तुम्हें क्या लगता है, कि तुम इस हवेली में वापस अपनी मर्ज़ी से आई हो?”
भानु अब तक मोहिनी के पास पहुँच चुका था।“सीधे जवाब दीजिए ! आप कौन हैं?”
अंगूठी वाले आदमी ने भानु को देखा और बोला -“तुम्हारे परिवार ने पहले ही बहुत देर कर दी है। अब तुम्हें सच जानने का अधिकार नहीं, सिर्फ परिणाम भुगतने का समय मिला है।”
भानु ने उसका रास्ता रोकने की कोशिश की, लेकिन उसी समय स्टेशन पर ट्रेन आने की घोषणा हुई। यात्रियों की भीड़ बीच में आ गई। जब भीड़ थोड़ी कम हुई, तब तक वह आदमी गायब हो चुका था। 'हरिनारायण 'भी वहाँ नहीं था ,केवल उसकी लकड़ी की छड़ी ज़मीन पर पड़ी थी। अब तक सात बजकर चालीस मिनट हो चुके थे।
मोहिनी ने छड़ी उठाई और बोली -ये भी गायब हो गया,तब उसने देखा , उस छड़ी के नीचे एक छोटा सा कागज़ चिपका हुआ था। उस पर लिखा था—“जिसे तुम ढूँढ़ रहे हो, वह स्टेशन पर नहीं है, लेकिन उसे यहाँ से ले जाने वाले का नाम इसी दरवाज़े के पीछे है।”कागज़ के नीचे एक तीर बना था, जो प्लेटफॉर्म नंबर तीन के बंद निकास की दिशा में इशारा कर रहा था।
भानु ने, मोहिनी की ओर देखा और कहा -“अब समझ में आया कि रत्न प्रताप ने हमें ,वहाँ जाने से क्यों रोका था।”विक्रम ने भी आसपास नज़र दौड़ाई ,“हमें जल्दी करनी होगी, हो सकता है , वह आदमी हमें देख रहा हो।”
तीनों प्लेटफॉर्म के पीछे बने पुराने गलियारे की ओर बढ़े। वहाँ जंग लगा,एक लोहे का दरवाज़ा था, जिस पर ''रेलवे विभाग ''की पुरानी मुहर दिखाई दे रही थी। दरवाज़ा बाहर से बंद था, लेकिन ताले के पास लकड़ी की पट्टी में एक छोटा-सा छेद था।
मोहिनी ने अपनी पायल में छिपी पीतल की चाबी निकाली।भानु ने ,उसे रोकने के लिए हाथ आगे बढ़ाया, लेकिन फिर रुक गया और पूछा -“तुम्हें यकीन है, कि यह चाबी यहाँ काम करेगी?”
“नहीं,”मोहिनी ने कहा, “लेकिन अब हर सवाल का जवाब हमें किसी न किसी दरवाज़े के पीछे ही मिलेगा इसीलिए प्रयास करने में क्या जाता है ?”कहते हुए ,उसने चाबी ताले में लगाई।पहले कुछ नहीं हुआ ,फिर उसने चाबी थोड़ा बाईं ओर घुमाई।क्लिक ! ताला खुल गया।दरवाज़े के पीछे एक छोटा कमरा था। भीतर पुराने कागज़ों की अलमारी, टूटी कुर्सी और दीवार पर टँगा एक जंग लगा बोर्ड था।
विक्रम ने अलमारी खोली, उसमें रेलवे कर्मचारियों का पुराना रजिस्टर रखा था।वह पन्ने पलटने लगा। 18 अगस्त 2001 की प्रविष्टि पर पहुँचते ही उसकी उँगली रुक गई ,“यह देखो !” कहते हुए उसने दोनों को अपने समीप बुलाया। रजिस्टर में लिखा था—“07:40 — एक महिला और एक नाबालिग को स्टेशन परिसर से बाहर ले जाया गया। अनुमति देने वाले अधिकारी के हस्ताक्षर: R.P.”
मोहिनी ने पन्ने पर झुककर देखा।“R.P.… यानि रत्न प्रताप ?
भानु की आँखों में गुस्सा उतर आया ,इसका मतलब वो उस दिन यहाँ था।”
तभी एक स्वर उभरा -या उसके नाम का इस्तेमाल किया गया था,” विक्रम ने कहा। “हमें हस्ताक्षर की जाँच करनी होगी।”
मोहिनी ने अगले पन्ने पर नज़र डाली, वहाँ एक और प्रविष्टि थी—“तीसरे बच्चे को निर्धारित व्यक्ति के हवाले नहीं किया गया। स्थानांतरण रोक दिया गया।”उसके नीचे किसी ने लाल स्याही से लिखा था—“राजवीर को सूचित न किया जाए।”
यह पढ़कर मोहिनी पीछे हट गई ,“इसका मतलब है कि राजवीर उस समय जीवित था। कम-से-कम कोई उसे सूचना देने से रोकना चाहता था।”
भानु ने गंभीर स्वर में कहा, “यह एक मजबूत संकेत है, लेकिन अभी अंतिम प्रमाण नहीं। हमें यह जानना होगा कि रजिस्टर किसने लिखा और उस समय ‘निर्धारित व्यक्ति’ कौन था ?”
तभी कमरे के बाहर किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। भानु तुरंत बाहर निकला।गलियारे में कोई नहीं था, लेकिन ज़मीन पर एक पुराना लिफाफा पड़ा था। उस पर लिखा था—मोहिनी के लिए—अगर वह कभी अपने असली परिवार तक पहुँच जाए।”लिफाफे के भीतर एक तस्वीर और छोटा-सा पत्र था।
तस्वीर में मृणाल एक नवजात बच्ची को गोद में लिए खड़ी थी। उसके पास एक आदमी था, जिसका चेहरा तस्वीर के किनारे से काट दिया गया था। पत्र में लिखा था—
“मोहिनी को बचाने के लिए ,उसे परिवार से अलग करना पड़ा ,लेकिन जिस व्यक्ति ने यह फैसला लिया, उसने एक बच्चे की पहचान बचाने के बदले ,दूसरे बच्चे का जीवन बदल दिया। अगर मोहिनी यह पत्र पढ़ रही है, तो समझो !कि तीसरा बच्चा अभी भी खतरे में है।”नीचे किसी के हस्ताक्षर नहीं थे।केवल एक अक्षर था—M. मोहिनी ने पत्र को सीने से लगा लिया। अब उसे समझ आने लगा था ,'कि उसकी माँ ने उसे छोड़ा नहीं था। किसी ने उसे बचाने के नाम पर अलग किया था ''लेकिन उसी निर्णय में एक दूसरे बच्चे की ज़िंदगी भी बदल गई थी और अब उस निर्णय में रत्न प्रताप का नाम सामने आ चुका था।
हवेली लौटते समय कार में, कोई कुछ नहीं बोल रहा था। मोहिनी खिड़की से बाहर देख रही थी। उसके मन में बार-बार वही तस्वीर घूम रही थी—मृणाल की गोद में नवजात बच्ची, पास खड़ा अज्ञात आदमी और पत्र में लिखी चेतावनी।भानु ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी -“मोहिनी ! एक बात पूछूँ?”
“पूछो ! ”
“अगर हमें पता चला, कि तुम्हें बचाने के लिए किसी दूसरे बच्चे को तुमसे अलग किया गया था, तो क्या तुम उस व्यक्ति को माफ़ कर पाओगी जिसने यह फैसला लिया?”
मोहिनी ने कुछ देर सोचा ,मैं नहीं जानती लेकिन मैं यह ज़रूर जानना चाहती हूँ कि उस बच्चे के साथ क्या हुआ ? अगर किसी ने मेरी सुरक्षा के नाम पर उसकी ज़िंदगी छीन ली, तो पता नहीं ,मैं अपने आपको क्षमा भी कर पाऊँगी या नहीं या किन्तु मेरे कारण किसी को ''जान से हाथ धोना पड़ा। ''ये मुझे अच्छा नहीं लगेगा इसलिए उसके बारे में जानने का मुझे अधिकार है कि आखिर वो कहाँ है ,उसके साथ क्या हुआ ?
भानु ने ,उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए सिर हिलाया और बोला -मैं हमेशा ,तुम्हारे साथ हूँ।”
मोहिनी ने उसकी ओर देखा और अपनी शंका ज़ाहिर की ,अगर यह सब तुम्हारे परिवार से जुड़ा निकला, तब तुम क्या करोगे ?”
भानु ने बिना झिझक कहा, “तब भी हम दोनों मिलकर, एक दूसरे का साथ देंगे। ”
उस उत्तर ने मोहिनी के मन में एक छोटी-सी शांति पैदा की। उनके रिश्ते की शुरुआत भले ही उलझे हुए हालात में हुई थी, लेकिन अब दोनों के मध्य एक नया विश्वास पनप रहा था—ऐसा विश्वास, जो सच सामने आने के बाद ही, अपनी असली परीक्षा से गुज़रने वाला था।
