आज उन्हें पुराने रेलवे स्टेशन पर पहुंचना था। सुबह पाँच बजे तक मोहिनी तैयार हो गयी थी। उसने वो तस्वीर, पीतल की सीटी और अस्पताल की रसीद एक छोटे बैग में रख ली थी।
विक्रम ने उन्हें रोककर कहा, “स्टेशन जाने से पहले मुझे, तुम दोनों को कुछ बताना है।”
मोहिनी ने ,उसकी ओर देखा ,“क्या अब भी कोई बात बाकी है ?विक्रम जी !”
विक्रम ने उसकी नाराज़गी को स्वीकार करते हुए सिर झुका लिया ,“हाँ, और इस बार मैं इसे छिपाना नहीं चाहता।”वह उन्हें हवेली के अध्ययन-कक्ष में ले गया, कमरे की अलमारी से उसने, एक पुरानी डायरी निकाली। उसके कवर पर कोई नाम नहीं था, लेकिन पहले पन्ने पर तारीख लिखी थी—20 अगस्त 2001।
तब उसने बताया -'यह डायरी मुझे कई साल पहले मिली थी, “मैंने इसे इसलिए छिपाकर रखा, क्योंकि इसमें ऐसे लोगों के नाम थे, जिनके बारे में परिवार में कभी बात नहीं की जाती थी।”
मोहिनी ने डायरी उसके हाथों से ले ली।“आपने इसे पहले क्यों नहीं दिखाया?”
“क्योंकि मुझे डर था कि इसमें लिखा हर नाम किसी नई मुसीबत को जन्म देगा, लेकिन अब समझता हूँ कि चुप रहने से मुसीबत खत्म नहीं होती।”
मोहिनी ने पहला पन्ना पलटा ,कुछ पंक्तियाँ पढ़ते ही उसकी उँगलियाँ रुक गईं।“18 अगस्त !आदेश सात बजकर चालीस मिनट पर मिला। बच्ची को स्टेशन से बाहर ले जाना था। लेकिन आखिरी क्षण में योजना बदल दी गई। एक बच्ची की जगह दो लोगों को अलग कर दिया गया। तीसरा व्यक्ति वहीं रह गया।”
मोहिनी ने पन्ना दोबारा पढ़ा।“एक बच्ची की जगह दो लोगों को अलग कर दिया गया… इसका क्या मतलब है?”
विक्रम ने कहा, “मैं भी यही समझने की कोशिश करता रहा, लेकिन अगला पन्ना फटा हुआ है। डायरी लिखने वाले ने बाकी जानकारी कहीं और रखी होगी।”
भानु ने डायरी की तारीख देखी ,उसे देखकर बोला -“यह डायरी घटना के दो दिन बाद लिखी गई है। क्या आपको पता है ,कि यह डायरी किसकी है?”विक्रम ने 'न 'में सिर हिलाया।“नाम नहीं है, लेकिन आखिरी पन्ने पर हस्ताक्षर हैं—‘M.V.’”
मोहिनी के मन में अस्पताल का वह रिकॉर्ड कौंध गया, जिसमें भी यही अक्षर थे।“M.V.,” उसने कहा, “क्या यह'' माधव वर्मा है?”
“हो सकता है,” विक्रम ने उत्तर दिया। “मगर हमें इसका प्रमाण चाहिए।”
मोहिनी ने अगला पन्ना पलटा। वहाँ केवल एक वाक्य लिखा था—“अगर मोहिनी को कभी सच बताना पड़े, तो उसे पहले यह बताना कि उसकी माँ ने उसे छोड़ा नहीं था।”मोहिनी का गला भर आया। “मृणाल…”उसने डायरी सीने से लगा ली। इतने वर्षों से वह अपने बचपन के बारे में अधूरी बातों के बीच जी रही थी। अब पहली बार उसे कोई लिखित संकेत मिला था कि उसकी माँ ने उसे जान-बूझकर नहीं छोड़ा था।
भानु ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे दिलासा दिया -“हम यह पता करेंगे कि मृणाल को तुमसे, किसने अलग किया था।”
मोहिनी ने अपने आँसू पोंछे और बोली -“नहीं, भानु ! हम यह भी पता करेंगे कि उस दिन मेरे साथ कौन था ? अगर उस तीसरे बच्चे ने सचमुच मुझसे कहा था कि'' मैं उसे न भूलूँ, तो मैं उसे ढूँढ़कर रहूँगी।”
विक्रम ने धीरे से कहा, “तब हमें देर नहीं करनी चाहिए। सात बजकर चालीस मिनट होने में अब दो घंटे से भी कम समय है।”
सुबह सात बजकर बीस मिनट पर ,उनकी गाड़ी' पुराने रेलवे स्टेशन 'के बाहर रुकी। शहर जागने लगा था। चाय की दुकानों पर भीड़ आरम्भ हो गयी थी, कुलियों की आवाज़ें गूँज रही थीं और प्लेटफॉर्म की ओर जाने वाले रास्ते पर यात्रियों का आना-जाना लगा था।लेकिन मोहिनी का ध्यान इन सब पर नहीं था।उसकी आँखें हर चेहरे में जैसे कुछ खोज रही थीं।“हमें किससे मिलना है?” उसने पूछा।
भानु ने फोन पर आया संदेश ,उसे दिखाया,“संदेश में किसी का नाम नहीं है, सिर्फ समय और जगह है।”
विक्रम ने स्टेशन के पुराने नक्शे की एक प्रति निकाली, वह उसे पिछले रिकॉर्ड से हासिल कर चुका था।
“2001 में प्लेटफॉर्म नंबर तीन के पीछे एक पुराना निकास हुआ करता था, अब उसे बंद कर दिया गया है। रत्न प्रताप ने विशेष रूप से उसी प्लेटफॉर्म पर न जाने को कहा था।”
मोहिनी ने तुरंत उसकी ओर देखा और बोली -अब तो हम वहीं जाएँगे।”
“पहले आसपास देख लेते हैं,”सावधानी पूर्वक भानु ने कहा। “अगर कोई हमें देख रहा है, तो उसे यह पता नहीं चलना चाहिए कि हम उसकी चेतावनी के बावजूद सीधे वहीं पहुँच रहे हैं।”तीनों अलग-अलग दिशाओं में चलने लगे, लेकिन एक-दूसरे की नज़र से दूर नहीं हुए।
सात बजकर पैंतीस मिनट पर मोहिनी को चाय की दुकान के पास एक बूढ़ा आदमी दिखलाई दिया। उसके हाथ में लकड़ी की छड़ी थी, और गले में पुराना पहचान-पत्र लटका था। वह लगातार मोहिनी की ओर देख रहा था। मोहिनी उसके पास पहुँची और उससे पूछा -“क्या आप मुझे जानते हैं?”
बूढ़े ने उत्तर देने के बजाय, उसके हाथ में पकड़ी तस्वीर की ओर देखा और पूछा -यह तस्वीर तुम्हें कहाँ मिली?”
मोहिनी चौंक गई ,और बोली -“हवेली में, क्या आप इस तस्वीर को पहचानते हैं ?”
बूढ़े ने आसपास देखा और धीमे स्वर में कहा, “इसे यहाँ मत दिखाओ ! कुछ लोग आज भी, उस दिन की बात सुनना नहीं चाहते।आप उधर आइये !उधर चलकर बात करते हैं। वो चाय की दुकान से उठकर थोड़ा आगे गया।
उसके पीछे चलती, मोहिनी ने पूछा -आप कौन हैं?”
एक भीड़ वाले स्थान से अलग खड़े होकर बोला -“मेरा नाम 'हरिनारायण' है, मैं उस समय स्टेशन पर काम करता था। मोहिनी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा,उसने हिम्मत करके पूछा -“18 अगस्त 2001 को क्या हुआ था?”
हरिनारायण ने अपनी छड़ी को कसकर पकड़ लिया।“उस सुबह एक आदमी, तीन बच्चों को लेकर स्टेशन आया था, लेकिन बच्चों को ट्रेन में बैठाने से पहले, वहाँ दूसरा आदमी पहुँच गया। दोनों में झगड़ा हुआ, फिर एक बच्ची गायब हो गई।”
“गायब हो गई? कैसे?”
“उसे प्लेटफॉर्म के पीछे बने पुराने निकास से बाहर ले जाया गया। मैंने देखा था, लेकिन मैं कुछ कर नहीं पाया।”
मोहिनी ने तस्वीर आगे कर दी ,उस तस्वीर को दिखाकर पूछा -क्या इनमें से कोई बच्चा उस दिन वहाँ था?”
बूढ़े ने तस्वीर को ध्यान से देखा, उसकी उँगली बीच में खड़े बच्चे पर रुक गई। इस बच्चे को मैंने देखा था, इसकी कलाई पर लाल फीता था।”
मोहिनी की साँस जैसे अटक गई ,उसने पूछा - “क्या आपको इसका नाम पता है?”
हरिनारायण ने होंठ खोले ही थे, कि पीछे से किसी ने उसका नाम पुकारा -“हरिनारायण!” बूढ़ा एकदम काँप उठा। प्लेटफॉर्म की ओर से काले कोट में एक आदमी उनकी तरफ बढ़ रहा था। उसके दाहिने हाथ में लाल पत्थर की अंगूठी चमक रही थी।
ये तो वही अंगूठी......ये वही व्यक्ति था , जो पहले भी हवेली में मोहिनी की चाबी के बारे में पूछ चुका था।
भानु ने, दूर से उसे देख लिया, वह तेजी से मोहिनी की ओर बढ़ा, लेकिन अंगूठी वाला आदमी पहले ही बूढ़े के पास पहुँच चुका था। तुमसे कितनी बार कहा है ,कि पुरानी बातें भूल जाओ,” उसने हरिनारायण से कहा।'हरिनारायण' ने डरते हुए सिर झुका लिया। मोहिनी उसके सामने आ खड़ी हुई ,आप इसे क्यों डरा रहे हैं? इसे उस दिन के बारे में बताने दीजिए।”
