Kiski dulhan [part 68]

मोहिनी  ने ,रणवीर से ,तस्वीर को  अपने हाथों में लिया और उसे ध्यान से देखने लगी। पहला बच्चा—भानु ,दूसरी—वह खुद ,तीसरा बच्चा तस्वीर में थोड़ा पीछे खड़ा था,उसका चेहरा बाकी दोनों की तुलना में धुंधला था ,लेकिन उसके दाएँ हाथ की छोटी उँगली पर एक गहरा निशान दिखाई दे रहा था। उसे देखकर मोहिनी की आँखें आश्चर्य से फैल गईं और बोली -ये  निशान…”

भानु ने तुरंत पूछा -“क्या हुआ ?


अपनी अनंत सोच पर जोर डालते हुए ,मैंने यह निशान पहले भी कहीं देखा है।”

“कहाँ?”

मोहिनी याद करने का प्रयास कर रही थी। एक कमरा ,खिड़की के पास खड़ा कोई व्यक्ति ,उसका हाथ मोहिनी  की ओर बढ़ा हुआ ,छोटी उँगली पर गहरा निशान और फिर वही आवाज—अगर तुम मुझे पहचान गईं, तो वे तुम्हें फिर से, मुझसे दूर कर देंगे।”मोहिनी  ने तस्वीर नीचे कर दी और बोली - मैंने उस व्यक्ति का हाथ देखा था, मुझे उसका चेहरा याद क्यों नहीं आ रहा ? उसकी छोटी उँगली पर ऐसा ही निशान था।”

भानु ने उस तस्वीर को फिर से देखा ,क्या वह व्यक्ति तीसरा बच्चा हो सकता है ?”

“शायद ”

या कोई ऐसा व्यक्ति जो तीसरे बच्चे को जानता था?”मोहिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि पहली बार उसे महसूस हुआ कि वह केवल अपनी यादों पर भरोसा करके ही आगे नहीं बढ़ सकती थी।उसे किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उन घटनाओं का गवाह रहा हो, लेकिन परिवार के झूठ से दूर हो।तभी उसे गोपाल याद आया और उसने पूछा -“गोपाल कहाँ है?”

रणवीर ने इधर-उधर देखा और बोला -वो तो अभी यहीं था। 

मोहिनी ने पूछा, “अभी यहीं था ,तो फिर कहाँ गया? किसी के पास कोई जवाब नहीं था।

 सभी उस तस्वीर और तीसरे बच्चे की पहेली को सुलझाने में जो लगे हुए थे। मुख्य दरवाजा भी खुला हुआ था किन्तु गोपाल वहाँ भी नहीं था और उसके साथ वह पुराना 'पहचान-पत्र 'भी गायब था।

रणवीर ने तुरंत मुख्य दरवाजे की ओर कदम बढ़ाए।

“रणवीर ! तुम बाहर जाकर देखो ! रूद्र ! तुम पिछले रास्ते की जाँच करो ! भानु ने उनसे कहा। 

दोनों अलग-अलग दिशाओं में चले गए। मोहिनी भी उनके पीछे जाना चाहती थी, लेकिन तभी रत्न प्रताप ने आगे बढ़कर उसे रोक लिया, तुम्हें गोपाल के पीछे नहीं जाना चाहिए।”

मोहिनी ने उनकी ओर देखा ,“क्यों?”

क्योंकि वह तुम्हें उस जगह ले जा सकता है, जहाँ जाना तुम्हारे लिए खतरनाक होगा।”

या फिर वह मुझे उस जगह ले जा सकता है, जहाँ जाने से आप सब, मुझे रोकते आए हैं ,ऐसा भी तो हो सकता है। रत्न प्रताप ने कोई जवाब नहीं दिया। मोहिनी ने उनका हाथ हटाया और मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ गई ,लेकिन तभी दरवाजे के पास पहुँचते ही उसे फर्श पर एक कागज दिखलाई दिया।वह शायद गोपाल की जेब से गिरा था।

मोहिनी ने उस कागज़ को उठा लिया।उस पर एक पता लिखा था—पुराना सिविल अस्पताल, अभिलेख कक्ष !नीचे तारीख थी—19 अगस्त 2001।

मोहिनी ने कागज भानु को दिखाया, जो अब वापस आ चुका था। गोपाल ,यहाँ क्यों जाना चाहता है ?”

भानु ने पता पढ़ा ,और अंदाजा लगाते हुए बोला - शायद उसे लगता है ,कि अस्पताल के रिकॉर्ड में कुछ ऐसा है जो हवेली के रिकॉर्ड में नहीं है।”

क्या हम वहाँ जा सकते हैं ?”

“हाँ, लेकिन उससे पहले हमें यह पता करना होगा, कि गोपाल वहाँ हमसे पहले पहुँचा है या नहीं।”

मोहिनी ने कहा, हम इस इंतजार में बैठे तो नहीं रह सकते।”

भानु ने, उसे ध्यान से देखा ,मैं तुम्हें रोक नहीं रहा हूँ ,लेकिन हम बिना तैयारी के भी तो नहीं जा सकते।”

ठीक है, हम साथ चलेंगे।”

भानु ने कागज अपनी जेब में रखा।

उसी समय रूद्र भी वापस आ गया और उसने बताया -गोपाल नहीं मिला ,पीछे का रास्ता खाली है।”

रणवीर भी वापस लौट आया। मुख्य सड़क पर एक गाड़ी खड़ी थी। उसके ड्राइवर ने बताया -कि एक बूढ़ा आदमी कुछ देर पहले उसमें बैठा था।”

अब गाड़ी कहाँ गई?”भानु ने पूछा।

पुराने अस्पताल की तरफ गयी है ।”

मोहिनी ने तुरंत कहा, “हमें भी वहीं जाना चाहिए।”

रत्न प्रताप ने इस बार उन्हें नहीं रोका ,उन्होंने सिर्फ इतना कहा—अगर वहाँ तुम्हें कोई ऐसा रिकॉर्ड मिले जिसमें मोहिनी का नाम हो, तो उसे ध्यान से पढ़ना ,क्योंकि हो सकता है कि उस अस्पताल में मोहिनी का जन्म दर्ज ही न हो।”

मोहिनी वहीं रुक गई ,क्या मतलब?”

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा ,तुम्हारे जन्म का जो प्रमाणपत्र तुम्हारे परिवार के पास है, उसमें अस्पताल का नाम अलग है।”

मोहिनी की आँखों में अविश्वास उतर आया इसका अर्थ है ,आपको यह बात पहले से ही पता थी?”

“हाँ।”

और आपने ,मुझे यह बात भी पहले कभी नहीं बताई ?”

रत्न प्रताप ने धीमे स्वर में कहा—क्योंकि तुम्हें पालने वाले लोग, तुम्हें अपनी बेटी मानते थे। मैं तुम्हारे बचपन को और उलझाना नहीं चाहता था।”

मोहिनी ने कठोर स्वर में कहा - “आपने मेरा बचपन नहीं बचाया।  आपने ,मुझे अपने ही जीवन से अनजान रखा।”कहकर वो भानु के साथ बाहर निकल गई लेकिन उसके मन में अब एक नया सवाल था।अगर उसके जन्म का प्रमाणपत्र झूठा था, तो क्या वह परिवार, जिसे वह अपना परिवार समझती आई थी, वास्तव में उसका परिवार था भी या नहीं?

दोपहर के लगभग एक बजे के करीब वे पुराने सिविल अस्पताल पहुँचे।अस्पताल अब पहले जैसा नहीं था। उसका एक हिस्सा नए भवन के रूप में बदल चुका था, लेकिन पीछे की पुरानी इमारत में अभिलेख कक्ष अब भी मौजूद था।भानु ने वहाँ के प्रशासनिक अधिकारी से मिलने की अनुमति माँगी।कुछ देर पश्चात उन्हें एक वरिष्ठ कर्मचारी के पास ले जाया गया, जिसने पुराने रिकॉर्ड सँभाल रखे थे।

भानु ने 17 और 18 अगस्त 2001 की तारीखों का उल्लेख किया।कर्मचारी ने पुरानी सूची देखी।इन तारीखों के रिकॉर्ड बहुत सीमित हैं। उस समय कुछ दस्तावेज दूसरी शाखा में भेजे गए थे।”

मोहिनी ने पूछा, “कौन-सी शाखा?”

 पुराने 'प्रसूति विभाग ''में भेजे गए हैं। 

क्या हम उन्हें देख सकते हैं?”

कर्मचारी ने कुछ देर सोचा, फिर उन्हें पीछे के कमरे में ले गया।

वहाँ पुरानी अलमारियों में ढ़ेर सारी फाइलें रखी थीं। कुछ के कवर फट चुके थे, कुछ पर तारीखें धुंधली थीं।

रणवीर ने 2001 की फाइलें निकालनी शुरू कीं। मोहिनी ने एक रजिस्टर खोला।कई नामों के मध्य उसकी नजर एक प्रविष्टि पर ठहर गई।18 अगस्त 2001 — महिला मरीज: मृणाल ! उसके आगे का विवरण कुछ इस प्रकार लिखा था, लेकिन नाम के नीचे लाल स्याही से एक टिप्पणी दर्ज थी—“मरीज के साथ आया शिशु रिकॉर्ड से हटाया जाए।”मोहिनी  की उँगलियाँ वहीं ठहर गईं। भानु ! यह देखो !”

भानु उसके पास आया ,उसने टिप्पणी पढ़ी और तुरंत कर्मचारी की ओर मुड़ा।“इसका क्या मतलब है?”

कर्मचारी ने चश्मा ठीक किया।यह सामान्य प्रविष्टि नहीं है, ऐसे मामलों में आमतौर पर कारण दर्ज किया जाता है।”

मोहिनी ने पूछा, “क्या इस रिकॉर्ड में कोई और पन्ना है?”

कर्मचारी ने रजिस्टर के पीछे देखा,वहाँ एक पन्ना आधा फटा हुआ था। उसके नीचे किसी दूसरे दस्तावेज का कोना दिखाई दे रहा था।

भानु ने सावधानी से उसे बाहर निकाला ,वह एक छोटी-सी पर्ची थी।उस पर लिखा था—“शिशु को दूसरे नाम से दर्ज किया गया ,वास्तविक पहचान की पुष्टि लंबित।”नीचे हस्ताक्षर थे। M.V.मोहिनी ने पर्ची को देखा और बोली - फिर वही अक्षर।”

भानु ने कहा, “M.V. कौन था ? माधव वर्मा? या फिर कोई और?”


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post