न तुमने कुछ कहा, न मैंने ही.....
मौन ही मौन में, कुछ बातें हो गईं ।
कुछ वादे हुए ,कुछ क़समें हो गयीं।
ख़ामोश तुम भी थीं, ख़ामोश मैं भी था।
इन ख़ामोश नजरों से, इक रिश्ता हो गया।
बिन कहे ही, एक -दूजे को समझने लगे।
दूर रह , भांति परिंदों की ,तड़पने लगे।
कुसूर मेरा नहीं , तेरी -मेरी नज़रों का था।
नजरें तुम्हारी बोलतीं ,बोध इन नज़रों को था।
न जाने कब ? दूर रहकर भी, हम एक हो गए।
ख़ामोशियाँ बोलने लगीं ,एक -दूजे में खो गए।
सिलसिलों का दौर यूँ ही, चलता रहा।
मौन रहकर भी मौन'' वाक ''करता रहा।
' हया'' तुममें भी थी ,थोड़ी मुझमें भी थी।
झिझक तुममें भी थी ,थोड़ी मुझमें भी थी।
दो अनजाने' कहानी बन हम चमकने लगे।
कुछ न होकर भी ,बहुत कुछ हमारे मध्य में रहा।
तप्त जमीन पर साथ चलते रहे, बिन कहे ही, क़स्में हो गई।
मौन कब खाली रहा ?न कुछ शिक़वे हुए ,न शिकायतें रहीं ।
तप्त धूप में तुम छाया बन गए ',मैं 'बारिश बन बरसती रही।
न तुम मेरे हुए ,न मैं तुम्हारी , न बंधनों की ''बंदिशें '' ही रही।
न दायरे थे ,स्वच्छंद हम ,इक अनजान डोर संग ,हम बंधे रहे।
