Khamoshi

  न तुमने कुछ कहा, न मैंने ही..... 

 मौन ही मौन में, कुछ बातें हो गईं ।

कुछ वादे हुए ,कुछ क़समें हो गयीं। 

ख़ामोश तुम भी थीं, ख़ामोश मैं भी था। 

इन ख़ामोश नजरों से, इक रिश्ता हो गया।

 बिन कहे ही, एक -दूजे को समझने लगे।

 दूर रह , भांति परिंदों की ,तड़पने लगे।  


 कुसूर मेरा नहीं , तेरी -मेरी नज़रों का था।  

नजरें तुम्हारी बोलतीं ,बोध इन नज़रों को था।  

न जाने कब ? दूर रहकर भी, हम एक हो गए।

ख़ामोशियाँ बोलने लगीं ,एक -दूजे में खो गए।  

 सिलसिलों का दौर यूँ ही, चलता रहा। 

मौन रहकर भी मौन'' वाक ''करता रहा। 

' हया'' तुममें भी थी ,थोड़ी मुझमें भी थी। 

झिझक तुममें भी थी ,थोड़ी मुझमें भी थी। 

दो अनजाने' कहानी बन हम चमकने लगे। 

कुछ न होकर भी ,बहुत कुछ हमारे मध्य में रहा। 

तप्त जमीन पर साथ चलते रहे, बिन कहे ही, क़स्में हो गई। 

मौन कब खाली रहा ?न कुछ शिक़वे हुए ,न शिकायतें रहीं । 

 तप्त धूप में तुम छाया बन गए ',मैं 'बारिश बन बरसती रही। 

न तुम मेरे हुए ,न मैं तुम्हारी , न बंधनों की ''बंदिशें '' ही रही। 

न दायरे थे ,स्वच्छंद हम ,इक अनजान डोर संग ,हम बंधे रहे। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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