वो भी क्या दिन थे ?
राम राम बहनों 🙏बहुत दिनों बाद याद किया।
क्या करें ? समय ही नहीं मिलता। मेरी तो नौकरी है, सुबह से शाम तक नौकरी के चक्कर में दिन गुजर जाते हैं। छुट्टी के समय , घर की साफ सफाई कपड़े, बच्चों का देखना ,इन सब में निकल जाता है इसलिए फुर्सत ही नहीं मिलती।
आज हमारी पार्टी में, कृतिका आई है ,सबने कृतिका की तरफ देखा ,किन्तु कृतिका कुछ उदास लग रही थी।
दीपा ने पूछा- कृतिका ! क्या बात है ?आज कुछ उदास लग रही हो।
हां, थोड़ी उदासी तो है।
इस उदासी का कारण ही तो पूछ रही हूं ,क्या भाईसाहब से झगड़ा हुआ ?
अजी !उनकी इतनी मज़ाल कहाँ ?जो मुझसे झगड़ने का जोख़िम उठायें ,कहते हुए ,उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई। तब बोली - क्या बताऊं ? बहनों ! उन दिनों को याद करती हूं तो मन थोड़ा परेशान हो जाता है।
मीनाक्षी बोली - तुम किन दिनों की बात कर रही हो ?
जब बाजार में बहुत हलचल और भीड़भाड़ होती थी। अब तो जैसे बाजार सूने पड़ गए हैं। बाजार में हमारा घूमना भी हो जाता था। सामान खरीदने के बहाने हम भी बाजार घूम आते थे ,किंतु आजकल तो कोई खरीदारी के लिए बाहर निकलता ही नहीं। सारा दिन बच्चे मोबाइल में लगे रहते हैं , ऑनलाइन सब सामान सर्च करते रहते हैं और ऑनलाइन ही, सामान मंगा भी लेते हैं।
कई बार तो,तस्वीर में देखकर उसका अंदाज़ा ही नहीं लग पाता कि सामान कैसा होगा ?यह वस्तु हमें कैसी मिलेगी ?अच्छे भी निकल जाते हैं और कई बार को निराशा ही हाथ लगती है। वापस भी करना पड़ता है।
नविता बोली - यह तो अच्छा ही है ,घर बैठे- बिठाये आपका काम हो जाता है।
वह बात तो ठीक है, किंतु अब तो हम जैसे घर में कैद होकर रह गए हैं। कितना अच्छा लगता था? जब हम ''करवा चौथ ''की खरीदारी करने के लिए इकट्ठा होकर जाती थीं। चूड़ी वाले से चूड़ी लेते थे बल्कि वह पहन भी दिया करता था और जब वह ₹20 की चूड़ी बताता था ,तो हम मोलभाव करने लग जाते थे। नहीं भैया ! 15 की लगा लो ! और मेरी एक सहेली तो सीधे बिल्कुल आधे दाम बोल देती थी 10 की लगा लो ! मोलभाव करते-करते तब वह सोलह -सत्रह पर आ जाते थे। चूड़ी ही क्यों ? सब्जी -भाजी वाला हो या फिर कपड़ों वाला ,सभी से मोलभाव करके अपनी इच्छा के दाम लगवाकर कितना सुकून मिलता था ?ऐसा लगता था जैसे हमने कोई महान काम कर दिया हो या फिर कोई किला जीता हो।
हंसकर पार्वती जी बोलीं -और वो दुकानदार भी मुस्कुराता होगा ,कितनी स्यानी बन रही ,उसने पहले ही दाम बढ़ाकर बताये होते थे।
ये तो हम भी जानते हैं ,अपनी जेब से कोई नहीं देता ,उसको भी तो अपने बच्चों का पेट भरना होता है। किन्तु कपड़ा अपने हाथों से छूकर देखना ,कोई कपड़ा पसंद आ जाये तो ज़िद हो जाती थी ,मुझे तो यही लेना है और भइया कम लगा लो ! अब तो ऑनलाइन में सामान 100 का हो या फिर 500 का, जो खरीदना है उसे चुन लो ! अब वो मजे वाली बात नहीं रही।
हां ,यह बात तो है, सब्जी वाले से भी हम सब्जी लेते थे ,तो कई बार तो धनिया और मिर्ची भी मुफ्त में मिल जाती थी किंतु अब तो वे लोग भी तो महंगे दाम बोलने लगे हैं और कह देते हैं - ऑनलाइन सामान मंगाओगी तो एक भी पैसा कम नहीं करोगी और यहां हमसे पैसा कम करने लगती हैं।
हां ,यह बात तो है ,उन दिनों में काफी अच्छा लगता था। मैं तो सामान की सूचि बनाकर ,सामान लाने के लिए अपनी बेटी को लेकर निकल जाती थी। परसों सामान लेकर आई थी, अब तो जैसे बाजार सूने हो गए हैं , काम धंधा ही नहीं चल रहा ,लोग कहते नजर आते हैं ,केतकी बोली।
तभी सोनाक्षी बोली -अब तुम्हें एहसास हुआ , तुम्हें पता है ,कितने व्यापार ठप्प हो गए हैं। मेरे पतिदेव तो दुकान पर जाते थे, और निराश होकर उदास वापस आ जाते थे। काम बहुत धीमा पड़ गया है। एक दिन तो हम दोनों में ही झगड़ा हो गया और मैंने कह दिया -इस दुकान को बंद ही कर दो !
तब बोले - यही तो हमारी रोजी -रोटी है ,क्या करेंगे ? तब मैंने एक स्कूल में नौकरी की तब जाकर हमारी गृह्स्थी की गाड़ी थोड़ा आगे बढ़ी।
हां, यह बात तो है, जब हम सामान खरीदने जाते थे ,तो एक -दो सहेली से ,या पड़ोसन से भी मुलाकात हो जाती थी बातों ही बातों में टहलते हुए ,अपने घर आ जाते थे, कितना अच्छा लगता था ?पहले रोज़गार के कारण गांव छूटे ,शहरों में रहकर कम से कम अड़ोस -पड़ोस में तो मेलजोल रहता था किन्तु अब तो जैसे घरों में बंद होकर रह गए हैं।
अब किया भी, क्या जा सकता है ? लोगों की सोच बदल रही है, उनका रहन-सहन बदल रहा है। उन्हें उसी में खुशी मिलती है। वैसे एक बात बताऊं ,अब देखने के लिए नए-नए सामान मिल जाते हैं, सस्ता लेना हो या महंगा ,तुम्हारी अपनी पसंद ..... तुम्हें अब समय बर्बाद नहीं करना पड़ेगा। उस समय को अब किसी और कार्य में लगा सकती हो। हम नौकरी वाली महिलाओं के लिए तो ये अच्छा ही हो गया ,नविता बोली -अब तुम्हारे नौकरी पर रहते हुए भी, समय पर तुम्हारा सामान ,तुम्हारे घर पहुंच जाएगा।
इससे सुविधा भी तो हुई है। दुकान में हम इतना सामान देख नहीं पाते थे, जितना हम अब इस छोटे से मोबाइल में देख लेते हैं। आपने यह बात सही कही है, इसमें हमें देखने के लिए बहुत तरह के सामान देखने को मिल जाते हैं ,केतकी बोली।
वैसे यह बात भी है, दुकानदार एक बार सामान दे देता था, फिर वापस नहीं करता था,बहुत झिक -झिक करता था।
नहीं ऐसा नहीं है , कुछ दुकानदार तो अच्छे होते हैं , जिनसे हमारे व्यवहारिक संबंध अच्छे हो जाते थे और हम हर बार ही उसकी दुकान पर जाते थे किंतु कई दुकानदार तो ऐसे रुखे व्यवहार के होते थे कि उनसे सामान लेने के बाद कई बार हमें पछताना पड़ जाता था।किन्तु ऑनलाइन ये अच्छा है सामान पसंद न आये तो बदल भी जाता है और पैसे भी वापस हो जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो तब ज्यादा परेशानी की बात होती।
बहनों ! तुम सभी की बातें सुनकर लगा ,'हर चीज में किसी में लाभ है, किसी में हानि है। यह तो लाभ -हानि तो चलता ही रहेगा। लेकिन अब समाज एक नई दिशा की ओर बढ़ रहा है। आजकल के बच्चे,आनेवाली नई पीढ़ी, उसकी एक अपनी अलग सोच है। हमारे लिए तो यह अच्छा है, हमने वह समय भी देखा ,जब दुकानों पर सामान खरीदने जाते थे और दस -बीस रुपए के लिए तो क्या पैसों के लिए भी, झगड़ा करते थे। किंतु आज के समय का भी हमें आनंद लेना चाहिए।
किस तरह से घर बैठे ही,सामान समय पर आ जाता है ? अब हमारी उम्र भी तो हो चली है और घर बैठे सामान आ जाता है ,बच्चे घर पर नहीं है तो आप ऑनलाइन खाने का भी सामान मंगा कर अपना पेट भर सकते हैं। जैसे-जैसे समाज में व्यस्ता बढ़ती जा रही है, वैसे ही वैसे सुविधाएँ भी बढ़ती जा रही हैं, इसलिए आज की यह मीटिंग हम यहीं खत्म करते हैं। अगले विषय के साथ फिर मिलेंगे।
आपको हमारा यह कार्यक्रम कैसा लगा ? हम बहनों की चुगली जो खरीददारी पर आधारित थी ,हमारे सुझाव हमारी बातचीत कैसी लगी ?आप भी अपने सुझाव अवश्य दीजिएगा ,धन्यवाद 🙏
