नंदिनी अपनी होने वाली सास और ननद के साथ, बाजार में खरीदारी करने गई थी, तब उन्होंने उसे बताया - कि दीपक का इरादा उससे झूठ बोलना या धोखा देना नहीं था। वह चाहता था,'कि उसकी पत्नी के साथ ,जो उसका केस चल रहा है,वह समाप्त हो जाए। तब तुम्हें सम्पूर्ण सच्चाई बतायेगा। यह बात सुनकर नंदिनी ने अपनी होने वाली सास से पूछा -क्या आपको यह सब पहले से मालूम था ?
तब वो बोलीं - पहले तो मालूम नहीं था किंतु दीपक ने तुम्हारी 'हां' करने के पश्चात मुझे, यह सब बताया। उसका कोई और उद्देश्य नहीं था। उसकी मां ने स्पष्ट किया अभी वो अपनी बात कर ही रही थीं। तभी अचानक से नंदिनी को एक चेहरा दिखाई दिया। वह हैरान एकदम से अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई। और बाहर की तरफ तेजी से निकली।
उसकी इस हरकत से वे दोनों भी परेशान हो उठीं किन्तु उन्हें ज्यादा सोचने का मौका नहीं मिला ,नंदिनी शीघ्र ही वापस आ गयी।
दीपक की मम्मी ने पूछा -क्या हुआ ?
वापस बैठते हुए नंदिनी बोली- कुछ नहीं, मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरी एक सहेली इधर से निकल कर गई है।
कौन सी सहेली ?
मेरे साथ कॉलेज में थी, अब उसका यहां मन नहीं लग रहा था, तब बोली -अब हमने चलना चाहिए। चलते हुए भी वह अपने आसपास देख रही थी।
तुम्हारी सहेली इस तरह थोड़ी मिलेगी, यदि उसने तुम्हें देखा होता, तो रुक भी जाती। हो सकता है , उसने तुम्हें देखा ही नहीं इसलिए निकल गई।
हां, यही बात होगी। घर पहुंच कर भी नंदिनी की आंखों से वह चेहरा ओझल नहीं हो रहा था। मन ही मन सोच रही थी ,'ऐसा कैसे हो सकता है ? मैंने उसे देखा है, घर में भी किसी से कह भी नहीं सकती थी। अब उसका मन शादी की तैयारी में नहीं लग रहा था। मन में घुटन सी होने लगी। तब घरवालों से बोली - मैं अभी आई ,कहकर बाहर निकल गयी। वो अपने आस -पास ज़्यादातर पैदल ही निकलती थी। कोई आवश्यक कार्य हो तो साईकिल से जाती थी। आज उसने साईकिल निकाली और सड़क पर आ गयी।
साईकिल चलाते हुए वो प्रतीक की कोठी के सामने पहुंच गयी। कुछ देर तक खड़ी ,उस कोठी और उसके दरवाजे को देखती रही। तभी उसने अपनी साईकिल खड़ी की और अंदर जाने लगी।
मैडम !आप ये क्या कर रहीं हैं ?कहाँ जा रहीं हैं ?
क्या तुम मुझे जानते नहीं ? मैं नितिन से मिलना चाहती हूँ।
एक मिनट मैम ,मुझे अंदर बात करनी होगी।
तुम्हें ,तो सब मालूम है।
हाँ ,मैं जानता हूँ किन्तु बाबा की सुरक्षा के लिए ही ,मुझसे मना किया गया है ,बिना आज्ञा के किसी को भी अंदर न जाने दिया जाये फिर चाहे आप ही क्यों न हों ? कहकर वो अंदर फोन करने लगा।
तब नंदिनी ने कहा ,रहने दो ! अच्छा ये बताओ !क्या तुमने अपने छोटे साहब को देखा।
कौन साहब ? सोचते हुए उसने पूछा।
नितिन के पिता !
वो तो अभी जेल में हैं ,उसने बताया।
नहीं ,मैं उनकी बात नहीं कर रही। इस घर के छोटे बेटे प्रतीक की बात कर रही हूँ।
ये आप क्या मजाक करने यहां आईं हैं ,उनकी हत्या के अपराध में ही तो उनके भाई जेल में हैं।
नंदिनी जो बात जानना चाहती थी ,वो तो पता नहीं चल पाई ,बल्कि उस दरबान की हरकतों से उस पर उसे क्रोध आया और बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गयी। ये तो उनका नौकर है ,उनका दिया खाता है ,उनके ही गीत गाएगा।
पता नहीं ,किससे मिलना चाहती थी ?मुझे लगता है ,ये बोरा गयी है ,छोटे साहब, जबसे गए हैं ,तब से यहाँ आकर ऐसी ही हरक़तें करने लगी है,वो मन ही मन सोच रहा था।
नंदिनी वापस घर आई ,उसने बाज़ार में जो छवि देखी थी ,उसकी आँखों से दूर नहीं हो रही थी। यह मेरा भ्रम नहीं हो सकता। उसे ऐसा लग रहा था -काश ! कि वो अभी भी लौटकर आ जाये और आकर कहे !मैं तुम्हारे लिए वापस आ गया ,सोचकर उसकी आँखों से आंसू बह चले।
जब ज्यादा सहन न हुआ ,तो उसने नानी को फोन किया ,नानी से कहा - नानी , मैंने उसे देखा था।
तूने, किसे देखा था ?
मैंने प्रतीक को बाजार में देखा था।
तू क्या पगला गई है, इतने दिनों पश्चात, क्या कोई मरकर जिंदा होगा। इस बात को 3 साल हो गए हैं ,आज तक तो दिखाई नहीं दिया अब कैसे दिखेगा ?यह भी तो हो सकता है, कोई उसका हमशक्ल हो। ऐसे दुनिया में कई लोग होते हैं जिन,की शक्ल एक दूसरे से मिलती है। हो सकता है ,तुझे उसकी याद आ रही हो और तुझे भ्रम हुआ हो, नानी ने उसे समझाया।
हां,शायद आप सही कह रही हैं।
अच्छा ,ये बता,उसे और किस किसने देखा ?
और किसी ने नहीं ,मैं जब दीपक की मम्मी के साथ बाजार गयी थी ,तभी मैंने उसे देखा।
वो जीता -जागता इंसान होता, तो सभी को दिखता।
नानी ,आप क्या बेफिज़ूल की बातें कर रहीं हैं ? उसकी मैंने भी सिर्फ़ एक झलक देखी थी ,झुँझलाकर नंदिनी बोली।
तभी तो कह रही हूँ ,तेरा भ्रम होगा। उसका भाई अभी भी अपने किये का दंड जेल में भुगत रहा है। वो जिन्दा होता ,तो उसका भाई जेल में क्या कर रहा है ?
ह्म्म्मम्म सोचते हुए नंदिनी ने हुंकार भरी। अच्छा ,ये बात तूने अपनी माँ को बताई।
नहीं ,नानी उन्हें बताकर क्या अपने सिर में दर्द करना है ?
अच्छा ,मेरी बेटी की बातों से तेरे सिर में दर्द होता है ,नानी की आवाज में क्रोध की झलक थी।
नंदिनी के चेहरे पर अचानक मुस्कान आ गयी और बोली -नहीं ,नानी !ऐसी बात नहीं है ,वे मेरी बात सुनती नहीं ,न ही समझती हैं ,जैसे आप मुझे समझती हैं।
अच्छा ,बुला उसे 'मैं 'उसे समझाती हूँ।
अभी बुलाती हूँ ,किन्तु आप उनसे उस विषय में कोई बात नहीं करेंगी ,पहले वायदा कीजिये !
ठीक है ,वादा किया ,अब उसे बुला तो सही....तभी नंदिनी ने अपनी मम्मी को आवाज लगाई -मम्मी !नानी बुला रहीं हैं।
अभी आई ,उन्होंने दूर से ही जबाब दिया।
अच्छा ,नानी ! मम्मी आने वालीं हैं ,मेरी बात ध्यान रखियेगा।
कौन सी बात ?पीछे से उसकी मम्मी ने पूछा।
कोई नहीं वो मेरी और नानी की बात है ,लीजिये !नानी फोन पर हैं।
हैलो !मम्मी !नमस्ते !
हाँ ,खुश रहो !सब काम ठीक से हो गया।
हाँ ,अब तैयारी में ही जुटी हूँ ,बहुत दिनों से इसी प्रतीक्षा में थी। आखिर अब वो दिन आ ही गया। अब मेरी ज़िम्मेदारी पूर्ण होगी।
हाँ ,वो बात तो सही है किंतु कभी -कभार इसकी नजर भी उतार दिया कर....
क्यों ,क्या कुछ हुआ है ?
नहीं ,ऐसे ही बता रही हूँ ,उसका मन थोड़ा बेचैन सा रहता है।
क्या आपसे कुछ कह रही थी ?
बता तो रही हूँ ,कुछ नहीं कहा ,कितने सवाल -जबाब करने लगी है ?जितना कहा है उतना कर... नंदिनी सही कह रही थी ,तू कुछ ज्यादा ही चिक..चिक... करने लगी है।
क्या ,आपसे ऐसा नंदिनी ने कहा ?
अब नानी को लगा ,उनसे गलती हो गयी तब बोलीं -तुझसे जितना कहा है ,उतना कर... अब उससे कुछ पूछने मत लग जाना। ऐसी बातें करो !जहाँ उसे अपना सुंदर भविष्य नजर आये और बाक़ी मैं दीपक को समझा दूंगी। कहकर नानी ने फोन रख दिया।
