बाहर दीपक के घर वाले बैठे हुए थे और वे चाहते थे ,'कि नंदिनी अपना जवाब सुनाएं।' उन्हें तो नंदिनी पहले से ही पसंद थी ,इसीलिए तो वो, उसके घर नंदिनी को देखने के लिए आए थे। किंतु नंदिनी के मन में दीपक के प्रति प्रेम तो था, किन्तु अब तक दीपक ने, उससे जो कुछ भी छुपाया ,उसके कारण वो रिश्ते को स्वीकारने में झिझक रही थी। कुछ प्रश्न थे, जो दीपक से पूछकर ,अपने आपको विश्वास दिलाना चाहती थी ,कि दीपक मुझसे प्रेम करता है और आगे से उससे इस तरह कुछ नहीं छुपायेगा।
किंतु नंदिनी की मम्मी ने उसे कहने का, कोई मौका ही नहीं दिया और वे नंदिनी से बोलीं -हमें ,उन्हें जवाब देना है। वो लड़के वाले हैं , कितने अच्छे लोग हैं, जो अब तक तुम्हारे जवाब की प्रतीक्षा में बैठे हैं। अपनी मम्मी की बात सुनकर नंदिनी परेशान होकर बोली -ठीक है ,आपके मन में जो आए, कह दीजिएगा।
बाहर जाकर उन्होंने कह दिया,' कि हमारी बेटी को दीपक पसंद है।'
उसे हमारा बेटा पसंद है तो एक बार आकर, हमसे तो मिले, दीपक की मम्मी ने आग्रह किया।
ठीक है, अभी बुलवाती हूं, कहते हुए वो अंदर नहीं गईं और बाहर से ही बैठे -बैठे नंदिनी को आवाज़ लगाई -नंदिनी ! यहां आओ ! देखो, तुम्हारी होने वाली सासू मां तुम्हें बुला रही हैं। वो जानती थीं , अगर वो अंदर गईं तो शायद नंदिनी बाहर आने से इनकार कर दे। इसलिए उन्होंने बाहर से ही आवाज़ लगाई -जिससे नंदिनी को इनकार करने का मौका भी नहीं मिला।
कुछ देर पश्चात, नंदिनी बाहर आती है, आओ ! बेटा, यहां बैठो ! दीपक उसका चेहरा देख रहा था, उसके चेहरे से लग नहीं रहा था, कि वह इस बात से प्रसन्न है। वह समझ रहा था ,अवश्य ही इसे, मेरे झूठ पर क्रोध आ रहा होगा। तब उसने सोचा,' कि मैं, इसे बाद में समझा लूंगा।
नंदिनी, दीपक की मम्मी के पास जाकर बैठ गई , तब उन्होंने अपनी बेटी की तरफ इशारा किया, और उनकी बेटी गाड़ी से, मिठाई, फल और कुछ सामान उठा लाई। उन्होंने वह सारा सामान नंदिनी की गोद में रखा और बोलीं - अब यह तुम्हारी बेटी, तब तक है, जब तक इन दोनों का विवाह नहीं हो जाता, तब तक आप इसे, अब हमारी अमानत समझकर रखिए !
' गोद भराई 'की रस्म होते ही ,तुरंत ही नंदिनी की मम्मी ने भी, अपने होने वाले दामाद का टीका कर दिया। यह सब देखकर नंदिनी को लग रहा था ,इतनी जल्दबाजी उचित नहीं है किंतु अब कुछ कह भी नहीं सकती थी।
उनके चले जाने के पश्चात नंदिनी ने कहा - इतने उतावलेपन की क्या आवश्यकता थी ? यह सब कार्य कुछ दिनों के पश्चात भी हो सकते थे।
कुछ दिनों में ही क्या हो जाता ? उसकी मम्मी ने पूछा -क्या कोई नई बात होनी थी ,जो अब तक कुछ नया नहीं हुआ ? अब क्या नया हो जाता ? जो कुछ हो रहा है, उसे होने दो ! बीच में अपनी नाक मत घुसेडो ! कहकर वो बाहर आई और अपने पति अस्थाना जी से बोलीं -आप शीघ्र से शीघ्र पंडित जी से मिलिए और विवाह का कब का मुहूर्त है ? पता लगाइए ! उससे पहले हमें विवाह की तैयारी भी तो करनी होगी।
नंदिनी यह सब देखकर चुप थी, न ही वह खुश थी और न ही उसे कोई दुख था। अभी 4 दिन ही बीते थे, तब दीपक का फोन आया और बोला -मम्मी ! तुम्हें अपने साथ बाजार ले जाना चाहती हैं, इसीलिए तैयार रहना।
तुम्हें अभी फुर्सत मिली है, इससे पहले फोन नहीं कर सकते थे। मुझे, तुमसे कुछ बात करनी थी।
मैं जानता हूं ,तुम क्या कहना चाहती हो ? मैं तुम्हें सब बताना चाहता था, किंतु तुमने उस दिन के पश्चात मौका ही नहीं दिया। बीमार होकर घर वापस आ गई ,तुम्हें थोड़ा सा तो मुझ पर भरोसा रखना चाहिए था।
भरोसा रख कर क्या करना था ? इतने दिनों में जो सच्चाई तुम ना बता सके ,वह 2 दिन में कैसे बता देते ? उस दिन मैंने पूछा भी था ,'कि वह कौन थी ? 'मेरी बीवी है 'कहकर चले गए ! तुम नहीं जानते ,उस दिन मैं कितनी मौत मरी हूं। यह भी तो कह सकते थे - कि मेरी तलाकशुदा बीवी थी या हमारा तलाक होनेवाला है।
तभी तो कह रहा हूँ - मैं, तुम्हें सब कुछ बता देना चाहता था, तुम्हारे जो भी प्रश्न थे ,उनका जबाब देना चाहता था किंतु तुमने मौका ही नहीं दिया। मैं, तुम्हें देखने के लिए, नानी के पास भी गया था किंतु नानी ने भी मुझे डांट दिया। वो तो अच्छा हुआ, मैंने उन्हें समझा दिया और उन्हें बात समझ में आ गई।
नानी ने भी मुझे कुछ नहीं बताया ,एक बार भी जिक्र नहीं किया।
कैसे करती ?जब मैंने , उनसे बताने के लिए मना किया था ?
क्या यह तुम्हारा सरप्राइज था ? यदि इस बीच मुझे कुछ हो जाता या मैं कुछ कर लेती ,तब क्या होता ?
ऐसा कुछ नहीं होता, मुझे, तुम्हारे पल-पल की खबर रहती थी। मैं ,तुम्हें खुश देखना चाहता था।
मेरे मन में अनेक प्रश्न छोड़कर..... मैं कैसे खुश रह सकती थी ?
अब तो तुम्हें सब कुछ पता चल गया, फिर इतनी नाराज क्यों हो ?
पता तो चल गया, किंतु अजीब सी बेचैनी है , मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठता है ,कि यह सच्चाई तुम पहले भी बता सकते थे। तभी उसे अपनी मम्मी की बात स्मरण हो आई ,उन्होंने कहा था-' किसी बात को इतना रबड़ की तरह लंबा नहीं खींचना है। उन्हें पता चल गया, तो डांट के सिवा मुझे कुछ नहीं मिलेगा। यह सोचकर बोलीं - अच्छा ,बताओ ! तुम्हारी मम्मी कब आ रही है ?
आज या कल में पहुंच जाएंगीं।
ठीक है ,कहकर नंदिनी ने फोन रख दिया। मन ही मन सोच रही थी, हालांकि मुझसे, दीपक ने पहले यह सब कुछ नहीं बताया, किंतु उसने कुछ छुपाया भी नहीं, हो सकता है, वह तलाक की प्रतीक्षा में ही था, कि तभी वह आगे बढ़ेगा। तलाक़ की बात को छुपा भी सकता था ,इस तरह अपने मन को समझाने लगी।
साड़ियों की दुकान में, नंदिनी उसकी होने वाली सास और ननद तीनों साथ में बैठी थीं। उन्होंने खूब सारी खरीददारी की, धीरे-धीरे नंदिनी का मन भी उत्साहित होने लगा। बाहर आकर उन्होंने कॉफी पी।
कॉफी पीते हुए, बातचीत करते हुए, नंदिनी ने अपनी सास से पूछा -दीपक का विवाह कब हुआ था ? क्या कारण रहा ? जो उसकी पहली पत्नी से उसका तलाक हो गया। वह उसके साथ रहना नहीं चाहती थी, अलग नौकरी करके रह रही थी, अपने परिवार को का पालन पोषण भी वही करती थी। हमने सोचा, नौकरी के कारण परेशानी है, इसी कारण दूर रह रही है किंतु धीरे-धीरे उसकी हकीकत सामने आने लगी , वहीं पर उसका कोई दोस्त था, उसके साथ रहने लगी थी।
एक दिन दीपक ने, उसे पकड़ लिया। तब उसने स्पष्ट रूप से कह दिया -'कि मुझे ,तुमसे तलाक चाहिए। इधर तुम्हारी मुलाकात, दीपक से हुई थी। उन दिनों उसका केस चल रहा था,वह चाहता था कि किसी तरह से ये केस निपट जाए ,तब 'वो' तुमसे बात करता।'
