Dhlati sanjh

 कविता दिनभर काम में, लगी रहती थी , इस उम्मीद पर कि कल को बच्चे बड़े होंगे ,पति का साथ होगा , तो वह भी थोड़ा आराम कर लेगी। यही सोच कर वह दिन बिता रही थी। जब से वह इस घर में ब्याह कर आई  थी।  तभी से सास ने घर के सभी काम, उस पर छोड़ दिए थे। घर की इकलौती बहू होने के नाते, सास -ससुर की सेवा में, और पति का साथ पाने की जद्दोजहद में जीवन बिताने का प्रयास कर रही थी क्योकिं सास ने जो कह दिया वो'' पत्थर की लक़ीर''बन जाता था। उनके सामने ससुर और बेटा भी कुछ नहीं कह पाते थे। 

ऐसा नहीं है ,कि कविता काम करना नहीं चाहती थी किन्तु अकेली घर के काम के साथ -साथ रिश्तों की उलझनों को भी सुलझाने का प्रयास कर रही थी। अब अपना यही जीवन समझ कर ,कुछ समझौते किये ऐसे ही जीवन बिताने में उसने, अपनी भलाई समझी। ऐसा नहीं है कि उसके पति आत्मनिर्भर नहीं थे किंतु उस समय उनका वेतन काफी कम था और सास का दबदबा अधिक....


ऐसे समय में एक सुघड़ ,संस्कारी और पढ़ी-लिखी नारी होने के नाते, उसने अपने पति का साथ निभाया और सास ससुर की सेवा भी की,अब यही कर्त्तव्य समझकर उस घर को संभाल रही थी।  

समय बदलता रहा ,समय के साथ,-साथ ससुर भी चले गए और उम्र के एक पड़ाव पर जब वो सोच रही थी -अब तो कुछ दिन आराम से बीतेंगे। तब एक हादसे में पति भी नहीं रहे। उसके पास अब दो बेटों का ही सहारा था। अपने दो बेटों के साथ, वह अब इस उम्मीद से जीवन व्यतीत कर रही थी कि उनके घर बस जाएंगे और घर की जिम्मेदारियां बहुओं पर सौंपकर ,वो अब इस उम्र में कुछ दिन सुकून से बिता देंगी।तमाम उम्र 'पापड़ बेले हैं ''कम से कम बुढ़ापा तो शांति से बीते।

 क्या सोचा हुआ ?कभी पूरा हुआ है।  बहुत परिश्रम के पश्चात कविता ने अपने बेटों के लिए संस्कारी और पढ़ी-लिखी लड़कियां ढूंढी किन्तु वो अब ये बात भूल गयी थी ,कि समय बहुत तेजी से आगे बढ़ने के साथ -साथ बदल रहा है। उनकी नजरों के सामने दूसरी -तीसरी पीढ़ी आ गयी है और अब इस पीढ़ी के वो संस्कार और विचार नहीं रहे। जब उसने, अपने गृहस्थ जीवन से बाहर झाँका तो पता चला ,बाहर बहुत कुछ बदल चुका है। 

अब घर में दो -दो बहुएं आ गई हैं। पति भी अच्छी जमा -पूंजी छोड़कर गए थे। कविता के लिए तो अपने बेटे ही उसकी सम्पत्ति थे। यही सोचकर कविता ने अपनी सारी जमा पूंजी अपनी बहु -बेटों के विवाह में लगा दी  । ताकि उसने अपने जीवन में जो कमी महसूस की ,उसकी बहुएं वो कमी महसूस न करें। उसने सोचा था -सभी एक साथ प्रेम से रहेंगे, किंतु ऐसा नहीं हुआ। पहले तो बहुएं आपस में ही लड़ने लगीं। कौन कितना ज्यादा लाई ? किसका अधिकार घर पर ज्यादा है ?''अधिकार और कानून उन्हें सब पता था ,किन्तु कर्त्तव्य नहीं जानती थीं।''

 घर में काम करने के लिए कोई तैयार नहीं थी। कविता ने तो सोचा था ,जिस तरह मैं अपने परिवार को अपना समझ कर, काम करती थी, ऐसे ही मेरी बहुएं भी करेंगीं किंतु बहू ने काम करने से इनकार कर दिया ,उनके लिए तो ससुराल किसी 'पांच सितारा 'होटल से कम नहीं। मजबूरी में कविता ने रसोईया रख लिया ,घर के सभी कामों के लिए नौकर रख लिए गए। तब भी घर में सुकून नहीं था , कोई भी काम करने के लिए तैयार नहीं, कविता तो दो -दो बहुएं होने के बावजूद भी अकेली थी।

 उसने अपनी बहुओं को समझाना चाहा -''मैं यहां कितने दिन की हूं , न जाने कब बुलावा आ जाए ?'ढ़लती सांझ 'है। मैं सोचती हूं -अब यह घर -परिवार तुम्हारा है, मैंने तो इसे अकेले संभाला था। तुम्हें मिलकर इसे संभालना है ,किंतु इन बातों से बहुओं पर कोई फ़र्क पड़ता नजर नहीं आया। अपने-अपने कमरे में पड़ी रहतीं। घर में नौकरों के रहते और इज्ज़त की ख़ातिर चुपचाप सब सहन करती।   

एक दिन रसोइये की तबियत बिगड़ गयी और उसने छुट्टी ले ली किन्तु दोनों ने अपना -अपना खाना बाहर से मंगवा लिया। सास की तबियत या भोजन का किसी को भी ख़्याल नहीं था। कविता ने सोचा ,कोई तो पहल करेगी किन्तु ऐसा नहीं हुआ। तब हार -थककर कविता स्वयं ही खाना बनाने लगी। वो सोच रही थी -हमने सारा जीवन सास -ससुर की सेवा में बिताया। पति और सास के अनुशासन में रहे ,किसी को कहने का मौका नहीं दिया किन्तु इन लोगों को तो तनिक भी मेरी फ़िक्र नहीं कि सास भूखी होगी ,उसके लिए कुछ बना दें। मरने के पश्चात श्राद्ध में छप्पन भोग बनाएंगे किन्तु जीते जी आकर ये भी नहीं पूछा -मम्मी जी आप भूखी होंगी, आप क्या खाएंगी ?

ये मेरे लिए क्या बनाएंगी ?जब अपने लिए ही नहीं बनाया ,यह सोचकर कविता ने अपने मन को समझाया। तब उसने एक निर्णय लिया और सोचने लगी - मैंने शायद बहुओं को कुछ ज्यादा ही छूट दे दी है ,यही सोचकर कि ये भी किसी के घर की बेटियाँ हैं। कभी मेरे, किसी व्यवहार से, इनका दिल न दुखे, किन्तु इन्हें किसी की भावनाओं से कोई लेना देना ही नहीं। कोई भी अपने कमरे से बाहर निकलकर नहीं आई। मन में तो आया था कि मैं भी सब कुछ छोड़-छाड़कर चली जाऊं ,किंतु एक मोह था जो उसे रोके हुए था ,'यदि वह भी ऐसा ही करेगी तो यह घर बिखर जाएगा।''

 अपने उन दिनों को याद करने लगी, जब  कभी सोचती थी, कि ढलती उम्र में तो मुझे आराम मिलेगा किन्तु ऐसा न हुआ।'' इंसान तन से तो काम करके भी इतना नहीं थकता है जितना मन की व्यथाओं से थकने लगता है।

 अगले दिन कविता ने अपने दोनों बेटों और बहुओं को अपने पास बुलाया। जब वो लोग उसके सामने उपस्थित हुए ,तब वो बोली - देखो ! मेरा कितना अच्छा हँसता -खेलता परिवार है ,दोनों बहुएं पढ़ी -लिखी हैं और बेटे भी क़ाबिल हैं। अब मुझे और क्या चाहिए ? मैंने इस घर को संवारने में ,अपने बच्चों की परवरिश में अपनी सम्पूर्ण ज़िंदगी ख़पा दी। अपनी कमी करके सोचा-' मेरे बच्चों को कोई कमी न हो 'किन्तु अब मुझे लगता है। मेरे बच्चे यहाँ रहकर खुश नहीं हैं। एक गहरी स्वांस लेते हुए बोली -मैंने सोचा था ,सब मिलजुलकर यहां साथ रहेंगे। ये घर बसा रहेगा ,ये घर तुम्हारे पापा और मैंने बड़े परिश्रम से एक -एक पाई जोड़कर बनवाया है किन्तु तुम लोगों को इस घर से वो सुख नहीं मिल पाया जिसकी तुम्हें चाहत थी। इसीलिए मैंने अब निर्णय लिया है। तुम दोनों अपने -अपने परिवार के साथ जा सकते हो ,जहाँ तुम्हें ख़ुशी मिले ,मेरे लिए तो तुम्हारी ख़ुशी ही सर्वोपरि है। 

मम्मी ! ऐसे में हम कहाँ जायेंगे ?घबराकर दोनों बेटे बोले -आपका ख़्याल कौन रखेगा ?

इतनी बड़ी दुनिया है ,कहीं भी जा सकते हो ,इस मोह के कारण मैं तुम लोगों की बेड़ी नहीं बनूंगी। रही बात मेरे ख़्याल की ,अभी भी कौन रख रहा है ? मुझे जरा बताओ ! दो दिनों से हरिराम बिमार है, तुममें से किसने पूछा -मम्मी, आपने खाना खाया या नहीं। अभी इतनी बूढी भी नहीं हुई हूँ ,जैसे आज बनाकर खाया है ,वैसे ही आगे भी खा सकती हूँ। हरिराम हमेशा बिमार नहीं रहेगा ,कहकर कविता उठी और अपने कमरे में चली गयी। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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