Shaitani sa.....22

 केतकी ,श्याम से मिलने जाती है ,वो उससे पहली बार नहीं मिल रही है किन्तु अभी तक वो श्याम के इतनी करीब भी नहीं आई कि उससे अकेले में खुलकर मिले। उसे श्याम से मिलना, उससे बातें करना ,अच्छा लगता है किन्तु श्याम जैसे ही उसके करीब आता है वो घबरा जाती है। आज भी जैसे ही श्याम ने, उसका हाथ पकड़ा वो घबरा गई और बोली -अच्छा, अभी मैं जाती हूं , कहते हुए जाने लगी, उसकी घबराहट देखकर श्याम मुस्कुरा दिया। तब वो कुछ गंभीर हो गया ,और बोला -लगता है ,तुम्हें ,मुझ पर विश्वास ही नहीं है ,तो मुझे  मिलने के लिए क्यों बुलाया था ?


केतकी को लगा ,कि उसका इस तरह जाना, श्याम को बुरा लग रहा है ,तब बोली -नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है ,वो तो भइया आये हुए हैं ,इसलिए जल्दी जाना है, विश्वास नहीं होता तो यहां नहीं आती। 

यहां तुम विश्वास से नहीं ,मेरे प्यार में आई हो ,किन्तु मुझसे दूर -दूर भी जा रही हो। जब किसी से प्यार करते हैं तो उस पर विश्वास भी करते हैं ,समझाने के लहज़े से श्याम बोला। उसके बार -बार कहने से केतकी को भी लगने लगा ,वो श्याम से प्यार करती है। 

नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है ,थोड़ा गांववालों का भी डर रहता है ,कोई इधर आ गया तो क्या होगा ?

इस तरह डरोगी ,तो प्यार नहीं कर पाओगी ,तुमने मुझे नहीं देखा, तुम्हारे प्यार के लिए ,मैं अपने गांव से यहाँ तक आ गया। प्यार करने वाले अपने प्यार के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं और तुम हो, कि मुझसे दूर -दूर भाग रही हो। 

श्याम की बातें सुनकर ,केतकी को लगा जैसे उसने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो ,तब श्याम से बोली -मुझे क्या करना होगा ?

ज्यादा कुछ नहीं ,एक बार मेरे सीने से लग जाओ ! मेरे दिल को राहत तो मिले कि तुम मेरी हो ,खुश होते हुए बोला। 

केतकी खड़ी होकर सोचने लगी ,तब बोला -इस तरह खड़ी होकर सोचती रहोगी तो कोई आ जायेगा ,जल्दी से मेरी बाँहों में आ जाओ ! कहते हुए उसने अपनी बाहें फैला दीं ,केतकी कुछ देर असमंजस की स्थिति में रही ,कभी अपने दुपट्टे को अंगुली में लपेटती ,कभी अपने हाथों को परस्पर संबल देती। उसने अपने आस -पास देखा ,तब केतकी उससे बोली -पहले अपनी आँखें बंद करो !

अच्छा ,ठीक है ,जल्दी करो !कहते हुए उसने अपनी आँखें बंद की ,जैसे ही उसने अपनी आँखें बंद की ,केतकी तेजी से दौड़कर उसके गले जा लगी ,जैसे ही वो उसके गले लगी। श्याम ने तुरंत उसे अपनी मज़बूत बाजुओं में भर लिया। केतकी के ह्रदय की धड़कनें तीव्र हो गयीं किन्तु अब श्याम की भुजाएं और कस गयीं। तब उसने पूछा - कैसा लग रहा है ? मैं तुम्हारी धड़कनें सुन सकता हूँ। यही तो प्यार है ,कहते हुए उसने केतकी का चेहरा ऊपर किया किन्तु शर्म के कारण ,उसकी नजरें झुक गयीं। तभी श्याम ने उसके अधरों पर अपनी छाप छोड़ दी। 

केतकी कसमसाई और तेजी से उसकी बाँहों के घेरे से बाहर आ गयी ,इस समय उसकी नजरें श्याम से नहीं मिल पा रहीं थीं , उसके मुख से शब्द  भी न निकल पा रहे थे। वो तुरंत ही घर जाने के लिए बिन कुछ कहे आगे बढ़ गयी। 

तब श्याम मुस्कुराया ,अच्छा यह तो बताओ ! अब फिर कब मिलने आना होगा ?किन्तु केतकी का गला सूख गया था ,उसके पास शब्द ही नहीं थे। वो आगे बढ़ती गयी ,श्याम उसके पीछे था। कुछ दूरी तक जाकर केतकी ने गहरी -गहरी सांसें लीं और अपने पीछे देखा, श्याम अभी भी ,उससे कुछ कदम की दूरी पर था। बिना उससे नजरें मिलाये वो बोली - अब तो भाभी आई हुई हैं, भाई चले जाएंगे। दो-तीन दिन की बात है तभी आना हो सकता है किंतु अंदर ही अंदर में घबरा रही थी ,कि अब उसे यहां से जल्दी से जल्दी निकल जाना चाहिए।

 केतकी जब घर पहुंची ,तो उसकी मां कह रही थी -इतना समय कहां लगा दिया ,कहां रह गई थी ?

तुम्हें तो कोई फिक्र है ही नहीं, इंतजाम करने गई थी, ताकि मेरी भाभी गर्मी में न सो सके। 

अब क्या करके आ रही है ?माँ ने परेशान होते हुए पूछा। 

चेतराम !चाचा से बात करके आ रही हूँ अब उनके यहां से तार आ जायेगा और तब तक डला रहेगा जब तक भाभी यहां रहेगी। 

केतकी बात सुनकर चिंतामणि बहुत खुश हुई और मनीष से बोली - देख ! इसीलिए मैं इस लड़की को इतना मानती हूं जो काम तूने लड़का होकर नहीं किया और कह रहा था -''बहु ऐसे ही रह लेगी और यह काम करके भी आ गई। इसलिए तो उसके पापा इसको अपनी बेटी नहीं बेटा मानते हैं वरना चेतराम तो तार डालना तो दूर ,बात करना भी उचित नहीं समझता ,बड़ा ही अहंकारी है।  

ऐसा तूने क्या जादू किया? जो चेतराम मान गया, मुस्कुराते हुए उन्होंने केतकी से पूछा। 

वह चाचा की और मेरी आपस की बात है, आपको फल खाने से मतलब है या पेड़ गिनने से.... कहकर वो अपने कमरे में चली गयी। वहां आईने के सामने खड़े होकर अपने आपको निहारा। आंख -नाक और फिर होंठ !वो सब क्या था ?कैसी सिहरन ,कैसा स्पर्श ?उसने अपनी आँखें मूंद लीं। होठों को गोल किया फिर अंदर दबाया ,उस स्पर्श को महसूस कर उसने अपने आपको ,अपनी ही बांहों में भर लिया। हालाँकि श्याम ने उससे सिर्फ गले मिलने का वायदा किया था किन्तु वो ये सब कर जायेगा ,उसने सोचा भी नहीं था। 

केतकी को ,श्याम से नाराज़ होना चाहिए था किन्तु उसके दिन में तो जैसे सुगंधित कलियाँ चटकने लगीं। गहरी -गहरी स्वाँसे लेते हुए ,उस अनुभूति को अपने अंदर उतार लेना  चाहती थी। वो तो भला हो ,चेतराम चाचा का  जो उसे रास्ते में ही मिल गए और केतकी को कहीं जाना ही नहीं पड़ा। जब उनसे कहा , भाभी आई हुई हैं ,कुछ दिनों के  लिए तार डलवा देना। 

अच्छा ,मनीष की बहु आई है , इंतजाम करवा देंगे ,तू चिंता मत करना ! 

तभी नीचे से भाई की आवाज़ आई ,केतकी ! कहाँ है ? मम्मी बुला रहीं हैं। 

भाई की आवाज ने जैसे उसकी तन्द्रा को तोडा ,वो तो श्याम के ख्यालों में डूबी थी। तेजी से उठी और बाहर  आकर बोली -भाई !अभी आई। 

माँ के साथ काम करवाकर वो फिर से विभा के कक्ष में चली गई। विवाह करके जब से विभा यहाँ आई थी तो तुरंत ही माँ ने, भाई के साथ उन्हें भेज दिया था। विभा अपने पति के साथ नौकरी पर चली गई थी । अब  तक उसे अकेले में रहने की आदत बन चुकी है।  उसे बार-बार इस तरह केतकी का उसके कमरे में आना अच्छा नहीं लग रहा था किंतु औपचारिकता वश वह मुस्कराकर रह जाती। हालांकि केतकी अत्यंत प्रसन्न थी कि उसकी भाभी ,हम सभी के साथ वहां रहने आई हैं।  किंतु विभा  को केतकी का इस तरह बार-बार आना ,उसके आराम में ख़लल डाल रहा था। 

 तब उसने केतकी से पूछा - क्या आप इसी तरह घूमती रहती हैं ,क्या पढ़ती- लिखती नहीं है ?


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post