मोहिनी और भानु ,रत्न प्रताप से जानना चाहते हैं ,इस तस्वीर में ये तीसरी बच्ची कौन है ? किन्तु उनके इतना पूछने पर भी रत्न प्रताप चुप रहा ,उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
तभी मोहिनी ने, वो तस्वीर फिर से अपने हाथ में ले ली।उसकी नजर तस्वीर के कोने पर गई ,वहाँ बहुत हल्के अक्षरों में लिखा था—17.08.2001 उसे पढ़ते ही, तभी मोहिनी के सिर में अचानक तेज दर्द होने लगा ।और उसे एक दृश्य…बस एक पलभर के लिए दिखलाई दिया -लाल रोशनी ,धुआँ ,किसी बच्ची के रोने की आवाज़ और फिर किसी पुरुष की आवाज़—“इसे यहाँ से लेकर भागो!”
मोहिनी ने अपना सिर पकड़ लिया -“आह…”
भानु तुरंत उसके क़रीब आया और पूछा -“मोहिनी ! तुम ठीक हो।
“मुझे… कुछ याद आया,उसने कम शब्दों में ही उत्तर दिया।
“क्या?”
मोहिनी ने फिर से अपनी आँखें बंद कर लीं ,और बोली “एक बच्ची रो रही थी…उसकी साँसें तेज हो गईं और कोई उसे उठाकर ले जा रहा था।”
“कौन?”
मोहिनी ने आँखें खोलीं और बोली -उसका चेहरा नहीं दिखा ,फिर उसने अचानक कहा—लेकिन उसके हाथ में…वह रुक गई ,वह जैसे याद करने का प्रयास करते हुए।
“क्या?”
वही लाल अंगूठी थी ,उसकी बात सुनते ही कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।सबकी नजरें एक-दूसरे पर टिक गईं। मृणाल का चेहरा पीला पड़ चुका था।
रत्न प्रताप ने तुरंत कहा—“बस ”अब रहने दो ! दिमाग़ पर ज्यादा जोर देना उचित नहीं।
मोहिनी ने उसकी तरफ देखा और शंका से पूछा -“क्यों?”
“क्योंकि जितना याद करोगी, उतना ही खतरा और बढ़ेगा।”
“किसका खतरा?”रत्न प्रताप चुप रहा ,उसकी इस हरक़त से मोहनी परेशान हो उठी थी,वो उसके सामने जाकर खड़ी हो गयी और पूछा -खतरा ! मेरे लिए बढ़ेगा या फिर भानु के लिए ,तब भी रत्न प्रताप चुप रहा।फिर भी रत्न प्रताप की वही चुप्पी बनी रही। मोहिनी की आवाज़ धीमी हो गई ,या फिर उस बच्ची का?”
रत्न प्रताप ने पहली बार उसकी आँखों में सीधा देखा किन्तु उसके चेहरे पर ऐसा डर था ,जिसे मोहिनी ने पहली बार महसूस किया।“वह बच्ची…रत्न प्रताप ने धीरे से कहा ,जिसे तुमने अभी देखा है…वह रुक गया।वह जितनी तुम्हें दिखाई दे रही है, उससे कहीं ज्यादा पुरानी बात है।”
मोहिनी कुछ समझ नहीं पाई ,“क्या मतलब?”
रत्न प्रताप ने उत्तर देने के बजाय कमरे की दीवार की तरफ देखा ,फिर बोला—“यहाँ से चलो।”
“नहीं।”
मोहिनी ने साफ इंकार कर दिया ,अब नहीं भागेंगे ,उसने तस्वीर को अपनी मुट्ठी में कस लिया और बोली - मुझे आज ही जवाब चाहिए।”
भानु भी उसके पास आकर खड़ा हो गया ,मैं भी यहीं रहूँगा।”
रत्न प्रताप ने दोनों को देखा ,कुछ कहने ही वाला था कि…पीछे से बहुत हल्की आवाज़ आई। टिक…सबने पलटकर देखा। पुराना टेप रिकॉर्डर अपने आप चल पड़ा था। साया ने धीरे से कहा—“यह कैसे…”रिकॉर्डर से आवाज़ आने लगी। पहले सिर्फ खरखराहट ,फिर किसी महिला की आवाज़ !ऐसा लग रहा था ,बहुत दूर से आती हुई ,धीमी सी आवाज़ ! अगर कभी आवाज टूट गई फिर दोबारा आई—अगर कभी तीसरा बच्चा वापस आए…”मोहिनी की साँस रुक गई। मृणाल ने आँखें बंद कर लीं ,आवाज जारी रही—तो समझ लेना, कुछ सेकंड की खामोशी !फिर—हमारी सबसे बड़ी गलती अभी जिंदा है। टेप अचानक बंद हो गया।कमरे में कोई कुछ नहीं बोला।
भानु ने धीरे से पूछा—यह किसकी आवाज़ थी?”
रत्न प्रताप ने सिर उठाया ,उसकी आँखें सीधे मोहिनी पर थीं ,तुम्हारी माँ की...
माँ की आवाज.... कहकर जैसे वो पत्थर की हो गई ,समझ नहीं आता ,ये सब क्या हो रहा है ?
मृणाल ने तुरंत रत्न प्रताप की तरफ देखा ,और पूछा -क्या तुमने यह रिकॉर्डिंग कभी नहीं सुनी थी ?”
रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया।मोहिनी ने तस्वीर नीचे गिरा दी ,तो यह बच्ची…उसकी आवाज़ काँप रही थी , मेरी माँ उसे जानती थी?”
मृणाल ने धीरे से कहा—“हाँ।”
मोहिनी ने उसकी ओर देखा ,“कितना जानती थी ?”
मृणाल की आँखों में आँसू आ गए ,इतना कि उसे बचाने के लिए वह रुक गई ,तुम्हें ,उससे अलग करना पड़ा।”
मोहिनी का चेहरा सफेद पड़ गया ,“मुझसे अलग ?”
मृणाल ने सिर झुका लिया ,“हाँ।”
भानु ने तुरंत पूछा—“लेकिन क्यों?”
मृणाल ने उसकी तरफ देखा ,“क्योंकि उस रात तीन बच्चे थे।”
भानु की आँखें फैल गईं ,“तीन?”
“हाँ”मृणाल की आवाज़ काँप रही थी।“तुम…उसने मोहिनी की ओर देखा ,“वह बच्ची…फिर भानु की तरफ और एक और।”
मोहिनी ने फुसफुसाकर पूछा—तीसरा कौन था?
मृणाल ने अपने होंठ खोले लेकिन शब्द बाहर नहीं आए ,उसी क्षण ऊपर कहीं से भारी आवाज़ आई—धड़ाम! सभी चौंक गए।
रत्न प्रताप ने तुरंत कहा—कोई ऊपर है।”
भानु ने मोहिनी का हाथ पकड़ा और आदेश दिया -तुम मेरे पीछे रहो ,लेकिन मोहिनी ने भी उसका हाथ नहीं छोड़ा।
“नहीं ,वह बोली - इस बार हम दोनों साथ चलेंगे।”
भानु ने कुछ पल उसे देखा ,फिर सिर हिला दिया ,दोनों ऊपर जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़े। साया, रत्न प्रताप और मृणाल भी उनके पीछे चल पड़े लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि कमरे के अंधेरे कोने में…एक छोटी-सी परछाईं अब भी खड़ी थी ,वही बच्ची !जिसके हाथ में पीतल की सीटी थी और लाल अंगूठी में जड़ा पत्थर ,हल्की रोशनी में चमक रहा था। उसने बहुत धीमे से सीटी बजाई ,फूँऽऽ…ऊपर जाते हुए मोहिनी अचानक रुक गई ,उसने पीछे देखा ,कोई नहीं था ,लेकिन उसके कानों में एक बच्ची की आवाज़ साफ सुनाई दी—“मोहिनी दीदी… इस बार मुझे छोड़कर मत जाना।”मोहिनी का दिल जोरों से धड़क उठा।वह वापस नीचे जाने लगी।
तभी भानु ने उसका हाथ पकड़ लिया ,“कहाँ जा रही हो?”
मोहिनी ने उसकी ओर देखा,उसकी आँखों में डर नहीं था।इस बार उनमें एक अजीब-सा विश्वास था।“वह मुझे बुला रही है।”
भानु ने पूछा—“कौन?”
मोहिनी ने, सीढ़ियों के अंधेरे को देखा और धीरे से कहा—“वही… जिसे हम सबने मरा हुआ समझ लिया था। उसी क्षण…ऊपर की मंजिल से किसी आदमी की आवाज़ आई—“मोहिनी !”सभी ठिठक गए।आवाज़ जानी-पहचानी थी ,लेकिन…वह आवाज़ किसी जीवित आदमी की नहीं लग रही थी।
भानु ने ऊपर देखा।
रत्न प्रताप के चेहरे का खून सूख गया और साया ने सिर्फ एक शब्द कहा—“M.V.”सीढ़ियों के ऊपर अंधेरे में एक परछाईं खड़ी थी और उसके हाथ में…वही लाल पत्थर वाली अंगूठी थी।
सीढ़ियों के ऊपर खड़ी परछाईं बिल्कुल स्थिर थी ,न वह आगे बढ़ रही थी…न ही पीछे हट रही थी।बस अंधेरे में खड़ी थी और उसकी उंगली में जड़ा लाल पत्थर मंद रोशनी में चमक रहा था। मोहिनी की नजर उस अंगूठी पर टिक गई ,उसके भीतर जैसे कुछ टूटकर जागा ,एक पुरानी याद !एक बच्ची…!धुएँ से भरा कमरा…और किसी का हाथ, जिसमें बिल्कुल ऐसी ही लाल अंगूठी थी।
मोहिनी का सिर घूमने लगा ,भानु ने तुरंत उसे संभाल लिया ,घबराकर कहा “मोहिनी !”
उसने, भानु की ओर देखा और बोली - मैं ठीक हूँ।”
“तुम्हारा चेहरा बता रहा है, कि तुम ठीक नहीं हो,भानु ने चिंतित स्वर में कहा ,साथ ही उसकी आँखें सीढ़ियों के ऊपर जमी हुईं थीं।
रत्न प्रताप ने अचानक फुसफुसाकर कहा—“पीछे हटो।”
भानु ने उसकी तरफ देखा और पूछा -“आप डर क्यों रहे हैं?”
रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया।ऊपर खड़ी परछाईं ने आखिरकार एक कदम आगे बढ़ाया।लकड़ी की सीढ़ी चरमराई।चर्र…
मोहिनी का दिल धड़क उठा ,दूसरा कदम ! चर्र…अब उसका चेहरा थोड़ा दिखाई देने लगा था ,लंबा कद ,गहरा कोट ,सफेद होते बाल और चेहरे पर वही शांत, ठंडी नजरें।मोहिनी ने साँस रोक ली।
“M.V…भानु के मुँह से नाम निकला।
