Rasiya [part 157]

 चतुर का व्यवहार धीरे -धीरे आस -पड़ोस के लोगों में चर्चा का विषय तो बना, किन्तु कोई भी उसके मुँह पर कुछ नहीं बोलता,किसी को क्या जरूरत पड़ी है ? ऐसे लोगों से बचकर रहना ही उचित है। भई ,''कीचड़ में पत्थर मरोगे ,तो कुछ कीचड़ तो अपने ऊपर ही आएगा। ''ऐसे उदाहरण देकर बच निकलते। ये तो है ही, ऐसा ,एक बार जेल चला गया , अब तो इसे शर्म भी नहीं रही। आस- पड़ोस का कोई भी उससे या उसके परिवार से संबंध रखता ही नहीं। अब न ही आस- पड़ोस के बच्चे उसके स्कूल में जाते थे। 


देर -सवेर उसकी खबरें सुनने को मिल ही जाती थी, कुछ लोग बता रहे थे - जब कोई नई अध्यापिका विद्यालय में जाती है ,तो वो एकदम 'शरीफ 'बन जाता है, और 'बेचारा 'बन जाता है और सबसे यही कहता है - मुझे कभी प्यार नहीं मिला ,पत्नी अनपढ़ ,मूर्ख है ,वो अक्सर बीमार रहती है। नई अध्यापिका को लगता अब वो उसके विद्यालय में आ ही गयी है तो अपने तरीक़े से सब ठीक कर देगी किन्तु किसी को भी ,चतुर की आज्ञा के बिना ,कुछ भी नया करने की छूट नहीं होती। 

उस अध्यापिका को ,बहुत सम्मान मिलता है ,उसे इतना चढ़ा देता था कि गिरी तो होश भी न आये। 

क्या उसके विरुद्ध किसी ने कोई आवाज नहीं उठाई ? समीर को आश्चर्य हुआ। 

किले जैसा उसका विद्यालय बाहर से, कुछ नजर नहीं आता था ,कहने को शादीशुदा और तीन बच्चों का पिता था। आज की तरह आज से पच्चीस साल पहले ऐसे फोन भी तो नहीं होते थे ,ताकि उसकी कोई वीडियो बना ले  

जब वह अध्यापिका पूछती भी , सर !आप शादीशुदा हैं ,आपकी पत्नी है ,वो कैसी है ?

बस उसके विषय में ,सोचकर चेहरा लटका लेता ,वह तो अक्सर बीमार रहती है, उसकी दवाइयां चलती रहतीं हैं , मैं अब थक चुका हूं।घर देखूं ,या बच्चे या फिर ये स्कूल ,अब आप आ ही गयीं हैं ,तो सब संभाल ही लेंगी आप जैसी योग्य शिक्षिका पाकर हमारा विद्यालय धन्य हो गया। मेरी उम्र ही क्या थी ?जब मेरा विवाह हुआ था,मैं अभी तीस -बत्तीस से ज्यादा का नहीं हूँ किन्तु इन ज़िम्मेदारियों ने उम्र से पहले ही ,बूढ़ा बना दिया। 

नहीं सर ! ये आप क्या कह रहे हैं ? आप अभी भी जवान लगते हैं ,मुझे तो आश्चर्य हो रहा है। आप इतना सब सहन करते हुए भी.... बखूबी सभी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं। आप मुझे बताइये !मेरे लायक कोई काम हो तो मैं अवश्य करूंगी। नई आई ,लड़की रेवती ने चतुर से कहा। 

चतुर की ,पत्नी कस्तूरी को, अपने पति पर पूर्ण विश्वास था। वह जो भी कर रहा है अपने परिवार और अपने बच्चों के लिए कर रहा है इसलिए वह कोई रोक -टोक नहीं करती थी। हो सकता है ,उसने ,उसे भी ऐसी ही चिकनी -चुपड़ी बातों से बहला रखा हो। जो उसकी इन बातों में फँस जाए , उसका तो दिन बन जाता था, और जो नहीं फंसती थी, वो शीघ्र ही स्कूल छोड़कर चली जाती थी।

 एक दिन चतुर अपने दफ्तर में बैठा हुआ, उदास नजर आ रहा था, अध्यापिका ने पूछा -सर ! क्या हुआ ? आज कुछ उदास लग रहे हैं। 

हम्म्म व्यस्त होने का अभिनय करते हुए बोला -नहीं ,बस ऐसे ही जीवन की कुछ समस्याएं हैं। 

नहीं सर ! आप तो हमेशा चुस्त -दुरुस्त रहते हैं ,आपको इस तरह पहले कभी नहीं देखा ,उसने उसकी ख़ुशामद करते हुए कहा। 

मैं मानसिक रूप से बहुत ही परेशान हूं ,कमजोर हो गया हूं किन्तु आप यहाँ पढ़ाने आईं हैं ,अपने काम पर ध्यान दीजिये ! अब हर किसी के सामने अपनी समस्याएं लेकर तो नहीं बैठूंगा। 

 सर !कुछ तो बताइए, क्या हुआ है ? हम भी आपके अपने हैं ,जब आप, हमें अपना मानते हैं ,तो हमें भी आपकी परेशानी जानने का अधिकार है। 

जब तुम इतना कह ही रही हो ,तो बता देता हूँ ,वैसे अन्य किसी से ये सब मत कहना ,कुछ ख़ास लोगों को ही अपना समझकर बताता हूँ ,जैसे कि आप ! वो मुस्कुराई और मन ही मन सोचा ,सर !मुझे अपना ख़ास समझते हैं।

 तब वो बोला -होना क्या है ? मेरे घर वालों ने मेरी शादी जबरन कस्तूरी से कर दी थी । तब मैं पढ़ रहा था, उस समय मैं विवाह का मतलब भी नहीं समझ पाया था,उसकी आँखों में झाँका ,कहते हुए ,वो एकदम मासूम बन गया।   

उर्वशी,समीर से बोली - तब उस मासूम शिक्षिका ने अपने को ख़ास समझा ,मासूम बनकर उसकी मासूमियत लील गया। अब आप देख ही सकते हैं, कि इसकी आदत अभी भी नहीं बदली है। ये  अभी भी फोन के जरिए ,अन्य महिलाओं से संपर्क बनाता है ,उनसे बातें करता है। अनजाने ही,अब मैं भी इससे टकरा गई। 

समीर, उर्वशी की कहानी सुनकर बोला -ऐसा ही है ,वैसे यह चतुर बडा ही दिलचस्प आदमी है , इसकी कहानी अच्छी है, यह ग़ुर भी हर किसी में नहीं होता ,अब हमें ही देख लो ! हमसे तो आजतक एक भी नहीं पटी कहते हुए हंसा। तुमने वह कहावत सुनी है -''चोर चोरी से जाए ,हेरा फेरी से न जाए। ''

नहीं, आपने वह कहावत सुनी है -'' कि बंदर कितना भी बूढ़ा क्यों ना हो जाए ? गुलाटी मारना नहीं छोड़ता''

 अपना ये चतुर ऐसा ही है, पर सबसे अच्छी बात यह है, उसके जीवन में कितनी सुंदर लड़कियां आई है किंतु उसने कभी भी, अपनी पत्नी को और अपने परिवार को नहीं छोड़ा। यह सब उसके लिए मौज मस्ती का साधन था। 

हम्म्म !आप तो उसका समर्थन करेंगे ही , मर्द जो ठहरे !कहकर उर्वशी ने समीर पर तकिया फ़ेंक कर मारा। अरे !अरे !ये क्या कर रही हो ?मैं चतुर नहीं हूँ ,दोनों हंसने लगे। 

अब इस कहानी का यहीं अंत करती हूँ ,ये एक ''चतुर भार्गव ''की ही कहानी नहीं है ,न जाने कितने 'रसिया 'आज भी और पहले भी किसी न किसी के जीवन में प्रवेश कर जाते हैं ,कोई उनकी फितरत समझ जाता है ,कोई फंस जाता है। वैसे तो ज्यादातर मर्दों की हालत यही होती है। पहले पत्र चलते थे ,आजकल ''सोशल मिडिया'' है ,वैसे तो कान्हा का भी एक नाम 'रसिया 'था किन्तु उनका प्रेम दैहिक नहीं ,दैविक था। समय के साथ ''रसिया'' बदल जाते हैं। सबका तरीक़ा अलग रहा होता होगा ,कुछ अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए भी ऐसा करते हैं या फिर आदत से मज़बूर हो ऐसा करते हैं।जैसे कि 'चतुर भार्गव ' 

किसी के जीवन में एक हंसी झोंके की तरह भी आ जाते हैं ,और कई बार तुफां बन जाते हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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