कब इस रिश्ते की शुरुआत हुई और कब समाप्त होने की कग़ार पर आ गया ? ये तो शिल्पा भी ठीक से नहीं समझ पा रही थी। रिश्ते की शुरुआत तो बड़े जोर -शोर से हुई थी, किन्तु चतुर की चतुराई, शिल्पा को ज़्यादा दिनों तक अपने मोहपाश में बांधकर न रख सकी।
चतुर भी, अब उसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था ,अब तो वह कपिला के विषय में ही, ज्यादा चर्चा करता, उसकी प्रशंसा करता। शायद ,नए शिकार की तलाश में था।
मन ही मन शिल्पा ने सोच लिया था, मैं यहां से जाऊंगी तो... इसकी बीवी को सब कुछ बताकर जाउंगी। ताकि उसे भी तो पता चले ,उसका पति इस स्कूल की आड़ में क्या-क्या रंगरेलियां मनाता रहा है ? मैं भी इसको कहीं का नहीं छोडूंगी, अनेक विचार उसके मन में आते -जाते।
मासिक वेतन का समय आ गया था, तब चतुर ने, शिल्पा को एक महीने का वेतन दिया।
तब शिल्पा बोली -सर ! आप यह क्या कर रहे हैं ? मेरे बाकी के 20,000 भी तो आपको देने हैं।
वह तो आप पहले ही ले चुकी हैं, चतुर ने कहा।
यह आप क्या कह रहे हैं ,मैं तो आपसे अपने पैसे कब से मांग रही हूं ? आपने मुझे पैसे कब दिए ?
आप, मुझसे झूठ मत बोलिए ! यहां पर पैसे रखे हुए थे, उस कक्ष में कोई अध्यापिका नहीं आई ,फिर पैसे कहां गए ? जबकि वहां पर तुम और मैं ही आते -जाते हैं। कपिला जी ,ने भी ठीक ही कहा था -जब उस कक्ष में तुम और मैं ही ज़्यादातर जाते हैं तो फिर तीसरा कौन आ गया ?
ज़्यादातर जाते हैं, किन्तु अन्य अध्यापिकाओं को आने की मनाही तो नहीं है। मैं भी तो कक्षा में पढ़ा रही थी, आप सीधे -सीधे मुझ पर इल्जाम लगा रहे हैं ,शिल्पा ने कहा। हो सकता है, आपने ही इधर-उधर रख दिए हों।
हालांकि चतुर की बात अपनी जगह सही थी। शिल्पा ने भी सोचा था ,जब मुझे मेरे पैसे मिल जायेंगे ,तब उन्हें वापस करते हुए ,अपना बड़प्पन दिखलाऊँगी और इससे कहूंगी -'हर कोई तुम्हारी तरह बेईमान नहीं होता, किंतु इस समय वह अपने ऊपर चोरी का इल्जाम नहीं लगवा सकती थी। तब वो बोली - हो सकता है, स्कूल की मालकिन आपकी पत्नी कस्तूरी ने ही वो पैसे लिए हों ।
मैं उससे पहले ही पूछ चुका हूं, तुम क्या समझती हो ? मैं कुछ जानता नहीं, वो मेरी पत्नी है ,मुझसे बिना पूछे वो एक कदम भी इधर-उधर नहीं रखेगी। वो, मुझसे कुछ भी नहीं छुपाती। हर कोई आपकी तरह बिंदास नहीं होता कहते हुए वो मुस्कुराया।
उसकी मुस्कुराहट देखकर शिल्पा तिलमिला गयी ,उसे लगा ,जैसे उसने ,उसके मुँह पर थप्पड़ जड़ दिया हो आप, मेरा अपमान कर रहे हैं और साथ ही चोरी का इल्ज़ाम भी लगा रहे हैं।
तुम कुछ भी समझ लो !
तो फिर यह सजा मैं ही क्यों भुगतूं ? आपके पैसे भी तो कटने चाहिए ,हानि हो तो दोनों ही भुगतें,किन्तु चतुर ने शिल्पा की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
उसके इस व्यवहार से क्षुब्ध शिल्पा ने सोचा ,इसने मेरे नीड़ में आग लगाई है ,मैं भी इसे सुकून से अपने घर में नहीं रहने दूंगी। अब उसे लग रहा था ,अब यहाँ रहना उचित नहीं ,अब और बेइज्जती सहन नहीं होगी।
तब वो सीधी ,दूसरे रास्ते से निकलकर चतुर की बीवी के पास पहुंच गयी।
उसे देखकर ,कस्तूरी बोली -अरे ,मैडम !आप ,आज कैसे आना हुआ ? क्या वो स्कूल में नहीं हैं ?
स्कूल में ही है ,आज मासिक वेतन का समय था ,बच्चों की छुट्टी भी जल्दी हो गई थी ,इसीलिए सोचा थोड़ी देर के लिए तुम्हारे साथ बैठ जाऊं तो मैं तुमसे मिलने आ गई।
आ ही गई हैं , तो बैठ जाइए !वैसे सभी को उनसे ही काम होता है। मुझसे मिलने की किसी को फुरसत ही कहाँ हैं ?उसके मन का दर्द था या फिर व्यंग्य ! वो समझ नहीं पाई। कस्तूरी ने ऐसा जतलाया, जैसे उसे शिल्पा के आने पर कोई विशेष प्रसन्नता नहीं हुई। तब वो बोली -आपका मासिक वेतन तो मिल गया होगा ।
मिल तो गया है, किंतु तुम्हारे पति के जो पैसे गायब हुए थे ,उन्होंने वो पैसे मेरे वेतन से ही काट लिए हैं ,उसने शिकायत भरे लहज़े में कहा। मैंने तो तुम्हारे कहने पर ही उनकी सहायता की थी और अब उन्होंने मेरे ,पैसे मुझे ही वापस नहीं दिए। नुकसान उनका हुआ है, तो मैं भरपाई क्यों करूं ?
देखिए ,बहन जी ! यह स्कूल का मामला है ,वही सब देखते हैं मैं उनके मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करती हूं। वो तो मुझे ही डांट देंगे, 'स्कूल तुम चला रही हो या मैं ,'इसीलिए मुझसे कहने का कोई लाभ नहीं है। कस्तूरी ने स्पष्ट सटीकता से जवाब दिया। मुझसे ,भला आपको क्या काम हो सकता है ,कहते हुए कस्तूरी ने शिल्पा को पानी दिया।
पानी का गिलास हाथ में लेते हुए ,बोली -सोचा ,आज तुमसे मिलती चलूँ।
क्यों ?बहनजी !आज क्या कोई विशेष बात है ?
कस्तूरी की बातों से लग रहा था ,जैसे वो बार -बार उस पर व्यंग्य कर रही है ,तब वो बोली -कुछ ख़ास तो नहीं है ,वैसे आज तुम्हारे पतिदेव ने मुझे नाराज़ कर दिया।
कस्तूरी ने ,शिल्पा को गहरी नजरों से देखा ,जैसे उसके अंदर झाँकने का प्रयास कर रही हो ,तब बोली -उन्होंने ऐसा क्या कर दिया ?वो तो ऐसे नहीं हैं ,कोई उनसे रूठ जाये।
शिल्पा को कुछ सूझ नहीं रहा था ,कि किस तरह से वो बात की शुरुआत करे ?तब वो बोली -उस दिन सर !कितने परेशान थे ?और तुम भी कह रहीं थीं ,'कि बहन जी ! ही हमारी समस्या का समाधान कर सकती हैं।' तुम्हारे विश्वास को मैंने सही साबित किया और तुम्हारे पति की समस्या का समाधान करते हुए ,अपना वेतन भी नहीं लिया जबकि मेरे पति को पैसों की बहुत ज़रूरत थी। तब भी मैंने उनकी सहायता की। ऐसे समय में कोई तुम्हारे काम आये ,कम बड़ी बात नहीं होती ,कहकर वो कुछ देर चुप रही ,वो कस्तूरी की प्रतिक्रिया जानना चाहती थी।
मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूँ ,कहते हुए रसोईघर में गयी और चाय बनाकर ले आई। लीजिये !चाय पीजिये। तब बोली -ये बात, तो आप सही कह रहीं हैं ,ऐसे समय में जब कोई रिश्तेदार भी अपने साथ खड़ा नहीं होता ,आप साथ खड़ी थीं।
कस्तूरी का समर्थन पा शिल्पा आगे बोली - मैं ,तुम लोगों के विद्यालय में पढ़ाती ही नहीं ,वरन हम अच्छे पड़ोसी भी हैं। इस स्कूल को भी अपना स्कूल समझ मैंने पढ़ाया है। हो सकता है ,कल मैं तुम्हारे स्कूल में रहूं या न रहूं किन्तु अच्छे पड़ोसी बनकर तो हम रह ही सकते हैं।
बहनजी !ये बात आप सही कह रहीं हैं ,वैसे मुझे तो अपने घर के कामों से ही समय नहीं मिलता। आज तक मुझे अपने किसी भी पड़ोसी का नहीं पता। कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई।वैसे कभी मन करता है ,तो स्कूल में आप जैसी पढ़ी- लिखी आती हैं ,उनसे मिल लेती हूँ। वैसे आप ऐसा क्यों कह रही हैं ? क्या आप यहां से जा रहीं हैं ?
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