Rasiya [part 150]

 शाम को चलते समय, चतुर ने पूछा -मैडम ! आपने यहां किसी अध्यापिका को या किसी बच्चे को इधर-उधर भटकते हुए देखा था। 

नहीं तो, आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?

नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। 



कोई बात तो होगी, जो आप इस तरह से पूछ रहे हैं ,हालाँकि वो अंदर ही अंदर घबराई हुई भी थी। 

जब मैं हिसाब लगा रहा था, तो कुछ पैसे कम लग रहे थे , मुझे लगता है ,कोई बच्चा या कोई अध्यापिका इधर आई हो ,आपने देखा हो। 

यह कब की बात है ?अनजान बनते हुए शिल्पा ने पूछा। 

कल ही की बात है ,मेरे दोस्त का फोन आया था। तब मैं सब कुछ ऐसे ही छोड़कर, अचानक चला गया था। 

अच्छा, कितने पैसे कम हुए हैं ?

पैसे तो मैंने गिने नहीं थे, पर हां इतना अंदाजा अवश्य है ,हिसाब लगाकर देखा तो, दस -पंद्रह हज़ार तो अवश्य निकाले हैं। 

मुझे नहीं मालूम ? बड़ी ही सरलता से शिल्पा ने झूठ बोल दिया। वैसे यहाँ कोई भी चोरी क्यों करेगा ?उसे चोरी ही करनी होगी तो सारे पैसे ही लेगा ,बाक़ी के क्यों छोड़कर जायेगा ?

आपकी बात भी सही है। 

हो सकता है ,आपके गिनने में ही कोई गलती रही हो।

शिल्पा मन ही मन सोच रही थी, ऐसे इंसान के साथ ऐसा ही होना चाहिए। वह प्रतिदिन स्कूल में आती और अपनी कक्षा लेती और चली जाती। तब उसे एहसास हुआ कि अब उसे चतुर से कहना चाहिए कि मेरे पैसे वापस कर दे ! कहीं उसे मुझ पर शक न हो जाए, पहले तो 'मैं' उससे पैसे मांग रही थी और अब अचानक ही मैंने पैसे मांगने बंद कर दिये। सर !आपके पैसे इधर-उधर हुए हो तो... मैं नहीं जानती,वैसे आपके पैसे मिले या नहीं। 

नहीं ,मैंने जब आराम से सारा हिसाब लगाया, पैसे तो उठाये गए हैं ,चतुर ने विश्वास से कहा।  

सर ! ऐसे कैसे चलेगा ?

क्या मतलब ?मैं कुछ समझा नहीं। 

 मेरे पैसों का इंतजाम भी तो कीजिए ,मैंने अपनी सहेली से उधार लिए थे । 

हम्म्म्म ! मैं कुछ करता हूँ। पता नहीं ,क्या हो रहा है ?परेशान होते हुए चतुर ने कहा -पैसे तो गायब हुए हैं ? और किसने गायब किए हैं, यह पता नहीं चल पा रहा ।

 अब बिना देखे तो, किसी को हम कह भी नहीं सकते। सर !अब तो आपके पूरे पैसे आ गए होंगे ,उनमें से मेरे पैसे मुझे दे दीजिए। यह उसने जानबूझकर कहा। 

ठीक है, देखते हैं, कुछ इंतजाम करते हैं।

अगले दिन सभी शिक्षिकाओं को मंत्रणा के लिए बुलाया गया ,जब सभी इकट्ठा हो गयीं ,तब ये बात चतुर ने सभी शिक्षिकाओं से कही - मेरे ऑफिस से, मेरी मेज से, कुछ रूपये गायब हुए हैं। क्या आप लोग बता सकती हैं ?कौन हो सकता है ?

सर !हम तो इधर कम ही आते हैं ,'स्टाफ रूम '' में ही रहते हैं ,इधर तो ज़्यादातर आप और शिल्पा मैम ही रहती हैं। 

तुम्हारे कहने का क्या मतलब है ?कल आप लोगों ने मुझे अपनी कक्षा में ही देखा था या नहीं। 

देखिये !मैडम !जो हमें सही लगा बताया ,अब आप दोनों के जाने के बाद ,कोई आया हो तो हम नहीं जानते। कपिला ने स्पष्ट किया। 

अच्छा, अब आप लोग जा सकती हैं ,वैसे आप लोगों को कुछ भी पता चले तो बताइयेगा !हो सकता है ,कोई बच्चा ही इधर आया हो। 

सभी के जाने के पश्चात शिल्पा बोली - अब मैं भी चलती हूँ। अब शिल्पा का व्यवहार चतुर के प्रति बदल गया  था और चतुर का मन भी....उसका तो काम ही यही था ,किसी नई महिला के दर्द को महसूस कर ,उसके जख़्मों पर मरहम लगाना।अपनी लच्छेदार बातों में उसे फंसाना। 

अब शिल्पा का दर्द उसे महसूस नहीं होता, किन्तु शिल्पा की भावनाएं चतुर से जुड़ चुकी थीं ,जो अब आहत हुई हैं। किन्तु ये रिश्ता समाज की नजर में न आये ,इसके लिए वो दोनों ही सतर्क थे। चतुर का असली चेहरा कहें या झूठी हमदर्दी उसे समझ आने लगी थी। अब तो शिल्पा उस समय के लिए पछता रही थी। जब उन नाजुक़ पलों में वो चतुर की झोली में जा गिरी थी। 

अब तो उसे प्रवीण के लिए भी अफ़सोस हो रहा था। सालों के रिश्ते को उसने क्षणिक भावुकता में खो दिया।अब पहले जैसा सम्मान उसकी नजरों में नजर नहीं आता और न ही चतुर की आँखों में.... इतने सालों  में उसका  प्रवीण से कभी इतना झगड़ा और बहस नहीं हुई थी। दोनों एक -दूसरे का सम्मान करते और एक -दूसरे के काम की क़द्र करते थे, किन्तु इन दिनों दोनों  के जीवन में बहुत हलचल मची। यहां आने के कारण झगड़े भी हुए। 

न जाने उसे कैसे लगने लगा ?वो इस परिवार के कार्यों से मुक्त हो, कुछ अलग करना चाहती है। मैंने भी कुछ गलत नहीं सोचा था। हर किसी की इच्छा होती है ,अपने सपनों को जीने की....जब मुझे ये अवसर मिला तो मेरी इच्छा भी जाग्रत हुई, किन्तु मुझे बाहरी दुनिया का अनुभव नहीं था। बाहर ऐसे भी लोग मिलते हैं। इतनी बच्ची भी नहीं हूँ, न जाने कैसे चतुर की बातों से बहक गयी ? कहीं न कहीं उसने मेरी कमजोरी को पकड़ा और उसका लाभ उठाया। वैसे प्रवीण भी मेरे इस निर्णय को प्रेम से समझते लड़ने की बजाय मुझे प्यार से समझाते या फिर सहयोग करते तो हो सकता है ,मैं कमज़ोर न पड़ती और ये लाभ न उठाता। 

 तब एक दिन चतुर ने शिल्पा को बुलाया और एक बच्चे की कॉपी दिखाते हुए बोला -मैडम ! आप क्या पढ़ा रहीं हैं ? देखिए ! इस बच्चे के कितने कम नंबर हैं ? बच्चे के माता-पिता ने शिकायत की है। 

मैं तो पूरा ध्यान रखती हूं किंतु यदि बच्चा ही याद करके नहीं आ रहा है ,तो उसमें 'मैं 'क्या कर सकती हूं ?क्या अन्य बच्चे नहीं पढ़ रहे हैं ?एक ही बच्चे को अलग से थोड़े ही पढ़ाया जा सकता है। 

उस पर ज्यादा ध्यान दीजिए , यह हमारे स्कूल की प्रतिष्ठा का सवाल है। कल को कोई भी हमारे, स्कूल में अपने बच्चों को नहीं भेजेगा,ये स्कूल तो बंद ही हो जायेगा।  देखिए !कपिला जी की कक्षा के बच्चे कितने अच्छे नंबर ला रहे हैं ? अन्य बच्चों को भी बहुत अच्छा से पढ़ा रही हैं। आप न जाने क्या कर रही है ?

 सर !यदि आपको यह लगता है कि मैं ठीक से नहीं पढ़ा पा रही हूं, तो इस महीने मेरा पूरा हिसाब कर दीजिएगा  ! मैं चली जाउंगी ,आप मेरी जगह कपिला जी को ही दे दीजिये ,ईर्ष्या और क्रोध में शिल्पा बोली। 

ये कोई तरीका नहीं है।  आप, मुझसे ऐसे बात करें ,गलती की है तो मानिये !कहकर चतुर वहां से उठकर चला गया। 

जबकि शिल्पा सोच रही थी ,चतुर के मन में मेरे प्रति तनिक भी कोई भावना होगी तो वो मुझसे पहले की तरह ही कहेगा -आप ऐसा क्यों कह रहीं हैं ? ये आपका ही स्कूल है ,आप कितना परिश्रम करती हैं ? किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। 

 अब तो शिल्पा भी चतुर से कटने लगी थी ,उसके व्यवहार से आहत हो ,उससे दूर हो गयी थी। उसकी पत्नी तो थी नहीं ,जो उस पर अधिकार जतलाती। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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