आज तो संयुक्ता का अपने पति से झगड़ा हो ही गया। वह कितने दिनों से उनसे कह रही थी, कि घर मरम्मत चाह रहा है। थोड़ी साफ सफाई भी हो जाएगी, टूट-फूट भी ठीक हो जाएगी , घर भी अच्छा लगेगा।
किन्तु वो हर बार इस बात को टाल जाते या फिर पतिदेव का यही कहना था - क्यों, इस तरह रहने में क्या बुराई है ? कोई हमें हमारे घर से नहीं निकालेगा। हम अच्छे से तो रह रहे हैं, बल्कि बहुत अच्छे से रह रहे हैं कम से काम उन लोगों को तो देखो ! जो हमसे गरीब हैं । अक्सर उसके पति उससे यह कहकर अपना पिंड छुड़ा लेते। ''अपने से नीचे लोगों को देखो ! जिनके पास रोजी- रोटी कमाने का ही जरिया ठीक से नहीं है।बेचारे !पल -पल कभी भूख और ज़िंदगी से लड़ते हैं।अपनी आवश्यकयताएँ इतनी मत बढ़ाओ !जो सुकून से न रह सको। ''
किंतु आज संयुक्ता ने पवन को उत्तर दे ही दिया और बोली - हम बहुत लोगों से बेहतर है ,ये मैं मानती हूँ किन्तु उन लोगों को देखो ! जो कितने अच्छे से जी रहे हैं ?क्या उन्हें सुकून नहीं है ?अरे इंसान कमाता ही किसलिए है ?ताकि वो अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके।
तब संयुक्ता आगे बोली - गरीबी में जीवनयापन करना उन लोगों की मजबूरी है, गरीबी में कोई नहीं जीना चाहता है। आप उन्हें पैसा दीजिए ! फिर देखो !वो अपना रहन -सहन, तौर -तरीक़ा कैसे बदलते हैं। ऐसी स्थिति में रहने में क्या उन्हें प्रसन्नता मिलती है ? हर कोई उन्नति करना चाहता है ,आगे बढ़ना चाहता है किंतु आप यह कहकर मुझे हर बार दबा देते हैं ,''कि अपने से नीचे वालों को देखो !''
मैं उन्हें क्यों देखूं ? वो मजबूरी में जी रहे हैं ,क्या वो इस तरह से रहना चाहते हैं ? किंतु हमारी तो कोई मजबूरी नहीं, फिर हम क्यों इस तरह से रह रहे हैं ? यदि हमें ईश्वर ने थोड़ा बहुत धन दिया है, कमाई का अच्छा साधन है तो फिर उसका उपयोग क्यों नहीं किया जाए ? जिसको नहीं मिल रहा उसकी तो विवशता है , और जिसको मिलते हुए भी ,वो उसका उपयोग नहीं कर रहा ,उसको आप क्या कहेंगे ? जो हमसे भी ऊपर हैं, वो भी अपने से ऊपर वाले को देखते हैं। अधिक लालसाओं से बचने के लिए ये एक अच्छा उदाहरण हो सकता है किन्तु यदि अपने से नीचे वालों को ही देखते रहे तो इंसान कभी उन्नति नहीं कर सकता।
हमेशा अपने से नीचे वालों को देखते रहेंगे और मन ही मन प्रसन्न होते रहेंगे कि हम उनसे बेहतर हैं तो इस तरह तो उन्हें कोई भी उन्नति नहीं कर पाएगा। विवशता का इलाज़ भी आगे बढ़ना ,परिश्रम करना ही है। अक्सर मेरे पापा भी मम्मी की इच्छाओं पर अंकुश लगाने के लिए यही कह देते थे ,'उन लोगों को देखो ,जो हमसे नीचे हैं। ''उन्होंने कभी ये नहीं कहा -उन्हें देखो ! जो अपने परिश्रम अथवा ज्ञान के माध्यम से कितनी उन्नति कर गए। अपने देश ,समाज ,परिवार का नाम आगे बढ़ाया।
आज संयुक्ता का जवाब सुनकर ,पवन चुप हो गया। जब संयुक्ता ने ही उससे पूछा - वो तो मजबूर हैं, फिर हम क्यों विवश हैं ? अक्सर यही कहकर पति अपनी पत्नियों को, समझा देते हैं, ज्यादातर परिवारों में यही सुनने को आया है, कितना ऊपर देखोगे ?जितना आगे बढ़ने की सोचोगे, जितनी अपेक्षाएं बढाओगे ! उतने ही परेशान रहोगे ! किंतु किसी ने यह नहीं कहा कि अपने से ऊपर वाले को देखो !और उन्नति का प्रयास करो ! आगे बढ़ो !जो है उस पर अभिमान मत करो ! और जो नहीं है, उसके लिए प्रयासरत रहो !
